क्या दुनिया में कभी क्लाउड स्टोरेज की किल्लत हो सकती है?- दुनिया जहान

जो फ़िल्में, फ़ोटो या वीडियो आप कंप्यूटर पर देखते हैं वो सभी डेटा सेंटर के सर्वरों पर स्टोर की जाती हैं.

इन डेटा सर्वरों और सेंटरों को क्लाउड स्टोरेज कहा जाता है. यहां स्टोर किया गया डेटा इंटरनेट के ज़रिए आपके मोबाइल फ़ोन या कंप्यूटर तक पहुंचता है.

इसी तरह आपका डेटा भी इन क्लाउड स्टोरेज में रखा जाता है और जब आप चाहें उसे आपको उपलब्ध कराया जाता है.

आम लोग हों या बड़ी कंपनियां और संस्थाएं, अपना डेटा इन क्लाउड स्टोरेज पर स्टोर करती हैं. कंपनियों का आधे से ज़्यादा डेटा इन क्लाउड सर्वरों पर स्टोर होता है और अब कंपनियों की इन पर निर्भरता बढ़ती जा रही है.

जब आपके मोबाइल स्टोरेज में मेमरी स्पेस भर जाती है तो आप इसे क्लाउड में एक शुल्क दे कर स्टोर कर सकते हैं और जब चाहें उसे इंटरनेट के ज़रिये इस्तेमाल कर सकते हैं.

लेकिन 25 जनवरी को माइक्रोसॉफ़्ट कंपनी की कई क्लाउड सेवाएं दुनिया भर में नब्बे मिनट तक के लिए ठप हो गई थीं. इससे दुनिया भर की कंपनियों, संस्थाओं और इसके ग्राहकों में अफ़रातफ़री फैल गई.

बाद में पता चला कि यह एक क्लाउड डेटा सर्वर में आई ख़राबी की वजह से हुआ था. मगर कई लोग यह भी सोचने लगे कि क्या जिस तरह से हमारे कंप्यूटरों में मेमरी स्पेस भर जाता है, तो क्या उसी तरह क्लाउड स्टोरेज पर भी स्टोरेज की किल्लत हो सकती है?

इस हफ़्ते हम इसी सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश करेंगे.

क्लाउड स्टोरेज क्या है?

क्लाउड स्टोरेज के बारे में विस्तार से समझने के लिए हमने बात की ओला शावनिंग से जो टेक्नोलॉजी कंपनी आयएसजी की सलाहकार हैं.

वो कहती हैं, "जब मैं अपने मोबाइल फ़ोन या टैबलेट पर, पिक्चर पर क्लिक कर के वो फ़ोटो देखती हूं जो मेरे फ़ोन में सेव है तब मुझे पता भी नहीं होता कि वो दरअसल किसी दूरदराज़ के क्लाउड से इंटरनेट के ज़रिये मेरे फ़ोन पर पहुंच रही है."

1980 के दशक में जब हम कंप्यूटर इस्तेमाल करते थे तो हम अपने डेटा को फ़्ल़ॉपी डिस्क और दूसरे स्टोरेज उपकरणों पर सेव करते थे और बाद में अपने कंप्यूटर पर ही स्टोर करने लगे थे.

लेकिन 1990 के दशक में इंटरनेट आने के बाद टेक्नोलॉजी और विकसित हुई और लोगों ने अपना डेटा अपने कंप्यूटर के बजाय दूसरी बाहरी जगहों पर स्टोर करना शुरू कर दिया.

ओला शावनिंग कहती हैं कि इंटरनेट की वजह से हम अपने टेबल पर रखे कंप्यूटर को अन्य जगहों पर मौजूद डेटा सेंटरों से जोड़ने में समर्थ हो गए थे और वास्तव में यही क्लाउड है जो एक तरह से इंटरनेट की ही सुविधा है जिसके ज़रिए कई उपकरणों के बीच डेटा का आदान-प्रदान संभव हो गया है.

बीबीसी संवाददाता, नॉर्वे में एक विशाल भूमिगत डेटा सेंटर पहुंचे. उन्होंने बताया, "यहां काफ़ी गर्मी है क्योंकि यहां 40 डेटा सर्वर लगे हुए हैं जिनसे यह गर्मी पैदा हो रही है और निचले हिस्से में ऐसे हज़ारों डेटा सर्वर काम कर रहे हैं."

कंपनियों ने अपने डेटा सर्वर ऐसी जगहों पर लगाना शुरू कर दिया जहां ज़मीन सस्ती थी. उन्होंने विशाल डेटा सेंटर बना लिए और पाया कि इतनी स्टोरेज क्षमता बन गई है जितनी की उन्हें ज़रूरत नहीं है.

क्लाउड स्टोरेज की शुरूआत कैसे हुई?

ओला शावनिंग इस बारे में कहती हैं, "इन कंपनियों ने सोचा क्यों ना इस अतिरिक्त स्टोरज को दूसरी कंपनियों को बेचा या किराये पर दे दिया जाए. इन कंपनियों ने अपने डेटा स्टोरेज को जब बेचना या किराए पर देना शुरू किया तो वहीं से क्लाउड स्टोरेज की शुरूआत हुई."

"ये कंपनिया क्लाउड स्टोरेज प्रोवाइडर या हाइपर स्केलर कहलाती हैं. ये कंपनियां दुनिया भर में विशाल डेटा सेंटर बना कर अपने डेटा स्पेस दूसरी कंपनियों, संस्थाओं और आम लोगों को भी किराये पर देती हैं."

पहली बड़ी हाइपर स्केलर कंपनी थी अमेज़ॉन, जिसने 2006 में अमेज़ॉन वेब सर्विसेज़ शुरू की. जल्द ही कई दूसरी टेक कंपनियों ने भी अपनी क्लाउड सर्विस बना ली.

अब क्लाउड सर्विस का बाज़ार सालाना 500 अरब डॉलर का है. अनुमान है कि आने वाले दस सालों में यह आठ गुना बढ़ जाएगा.

ओला शावनिंग के अनुसार, "शुरू में नहीं पता होता कि आने वाले समय में हमें कितने कंप्यूटिंग पॉवर या डेटा स्टोरेज की ज़रूरत होगी. मैं चाहती हूं कि मैं इस क्षमता को कम समय में ज़रूरत के हिसाब से बढ़ा सकूं."

"अगर मुझे अपने घर या दफ़्तर में इस क्षमता को बढ़ाना पड़ जाए तो उसके लिए शक्तिशाली कंप्यूटर उपकरण ख़रीदने पड़ेंगे, सॉफ्टवेयर और स्टोरेज उपकरण ख़रीद कर लगाने होंगे जिसमें समय लगेगा."

"लेकिन अगर मैं हाइपर स्केलर या क्लाउड का इस्तेमाल करती हूं तो मुझे भारी निवेश करने की ज़रूरत नहीं है. साथ ही मैं उतने ही स्पेस और कंप्यूटिंग पावर के लिए पैसे खर्च करूंगी जितने की मुझे ज़रूरत है. यह किफ़ायती और लचीला तरीका है."

क्लाउड कंपनियां

माइक्रोसॉफ़्ट, गूगल और अमेज़ॉन यह तीन प्रमुख क्लाउड कंप्यूटिंग और स्टोरेज कंपनियां हैं और दुनिया भर की कुल क्लाउड आय का 75 प्रतिशत हिस्सा इनकी जेब में जाता है मगर इनमें अमेजॉन सबसे बड़ी है क्योंकि क्लाउड मार्केट का एक तिहाई हिस्सा अकेले उसके पास है.

अगर आप को याद हो, तो अमेजॉन ने 1995 में इंटरनेट के ज़रिए किताबें बेचने से शुरुआत की लेकिन बाद में उसका विस्तार हुआ और अमेजॉन ने कई तरह के उत्पाद बेचना शुरू कर दिया.

इस काम के लिए उसने बड़े डेटा सेंटर बनाए और बाद में इन डेटा सेंटरों के अतिरिक्त स्पेस दूसरी कंपनियों को बेचना या किराए पर देना शुरू कर दिया.

लॉरेल रूमा जो एमआईटी टेक्नॉलॉजी रिव्यू की संपादक हैं, वे कहती हैं, "जैसे-जैसे अमेजॉन बड़ी होने लगी उसने उपभोक्ता सामग्री के साथ साथ कंप्यूटिंग और क्लाउड स्टोरेज, दूसरी कंपनियों को बेचना शुरू कर दिया."

"उसकी सफलता को देख कर दूसरी कंपनियां भी उसका अनुसरण करना चाहती थीं और अमेजॉन ने उन्हें इस पैमाने पर कंप्यूटिंग और डेटा स्टोरेज देना शुरू किया कि वह अमेजॉन का एक प्रमुख कारोबार बनता चला गया."

गूगल भी पीछे नहीं

"सिलिकॉन वैली की दूसरी कंपनियां जैसे कि गूगल भी पीछे नहीं रही. गूगल हमेशा से ही क्लाउड सर्विस मार्केट में अच्छी पकड़ रखती थी. उसी तरह माइक्रोसॉफ़्ट भी ईमेल और दूसरी ऑनलाइन सेवाएं दे रही थी तो कई कंपनियों ने स्वाभाविक तौर पर क्लाउड स्टोरेज और कंप्यूटिंग के लिए माइक्रोसॉफ़्ट का रुख़ किया."

लॉरेल रूमा ने यह भी कहा कि टेक्नोलॉजी और दूरसंचार क्षेत्र के ढांचों में व्यापक स्तर पर विकास हुआ है जिसकी वजह से क्लाउड कंप्यूटिंग और स्टोरेज में भी तेज़ी आई है.

उनके अनुसार, "अब चूंकि कई लोग अधिकांश काम ऑनलाइन करते हैं जिसकी वजह से इस क्षेत्र में तेज़ी के साथ वृद्धि देखी गई है. लेकिन इसके लिए ढांचे बनाने में निवेश और कई संसाधनों की ज़रूरत रही है. तो क्या अधिक विकसित देशों में यह विकास अधिक हुआ है और क्या उन्हें इसमें अधिक सफलता मिली है?"

लॉरेल रूमा के मुताबिक़, जिन देशों ने दूरसंचार टेक्नोलॉजी और शिक्षा के क्षेत्र को विकसित किया है या जहां इस पर काम करने वाले प्रशिक्षित लोग बड़ी संख्या में हैं वहां विकास पर इससे निश्चित तौर पर फ़र्क पड़ा है.

वो कहती हैं, "टेक्नोलॉजी में जो सरकारें अधिक निवेश करेंगी और उसका इस्तेमाल करेंगी, वहां का समाज भी इसमें अधिक प्रशिक्षित बनेगा."

अब कंपनियों के लिए अपनी कंप्यूटिंग की क्षमता बढ़ाना, पहले के मुकाबले बहुत ही आसान हो गया है और उतना ही किफ़ायती भी.

लेकिन एक सवाल बेहद महत्वपूर्ण है जो डेटा ये कंपनियां क्लाउड पर स्टोर करती हैं क्या वो हमेशा आसानी से उपलब्ध रहेगा? क्या वो हमेशा सुरक्षित रहेगा?

सुरक्षा है अहम सवाल

क्लाउड डेटा स्टोरेज के साथ डेटा की सुरक्षा के मसलों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

इस बारे में हमारे तीसरे एक्सपर्ट बिल बुकेनन जो एडिनबरा नेपियर यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर साइंस के प्रोफ़ेसर हैं, वे कहते हैं कि हमें वही डेटा क्लाउड स्टोरेज में रखना चाहिए जिसकी ज़रूरत हो. और ऐसा भी नहीं है कि हम किसी भी क्लाउड में अपना डेटा स्टोर कर लें. डेटा के इस्तेमाल को लेकर कई देशों के अपने कानून हैं.

साल 2018 में डेटा प्राइवेसी के बारे में यूरोपीय संघ द्वारा बनाया गया जीडीपीआर (GDPR) कानून काफ़ी कड़ा है और इसने तय किया है कि यूरोप और यूरोप के बाहर कंपनियां किस प्रकार सामान्य लोगों का निजी डेटा इस्तेमाल कर सकती हैं.

बिल बुकेनन कहते हैं, "दुनिया भर में डेटा सेंटर बने हुए हैं जो उस क्षेत्र के डेटा प्राइवेसी कानूनों का पालन भी करते हैं, लेकिन किसी एक क्षेत्र के लोगों का डेटा किसी दूसरे क्षेत्र की कंपनियों या लोगों के हाथ लगने का ख़तरा रहता है. इसका दुरुपयोग हो सकता है."

इसका मतलब हुआ कि एक विशिष्ट क्षेत्र के लोगों का डेटा उसी क्षेत्र में स्टोर होना चाहिए लेकन ज़रूरी नहीं कि ऐसा करने से भी समस्या का समाधान हो जाएगा.

साल 2021 के आख़िरी महीनों में अमेजॉन वेब सर्विस कई बार कुछ समय के लिए ठप होती रही. 7 दिसंबर को वर्जीनिया में एक सॉफ्टवेयर में समस्या की वजह से अमेजॉन की वेब सर्विस ठप हो गई थी.

रिपोर्टों के अनुसार कई जगहों पर अमेजॉन की डिलीवरी सर्विस ही ठप नहीं हुई बल्कि डिज़्नी एंटरटेनमेंट और नेटफ़्लिक्स जैसी कई वेबसाइट भी ठप हो गई थीं.

तब अमेजॉन ने कहा था कि वो अपने डेटा सेंटरों में सैकड़ों अरब डॉलर का निवेश करेगी.

दूसरा सवाल यह है कि जहां डेटा एक जगह से दूसरी जगह भेजा जाता है तो इस दौरान वो किन देशों से गुज़रता है? क्या वो इस दौरान ग़लत लोगों के हाथ लग सकता है?

बिल बुकेनन का मानना है कि यह बिल्कुल हो सकता है और ऐसा होने के बाद इसका पता चलने में काफ़ी समय लग जाता है.

उनके अनुसार, "इंटरनेट स्वायत्त तरीके से काम करता है. जब इंटरनेट बनाया गया तब यहां तक नहीं सोचा गया था. अगर आज इंटरनेट बनाया जाता तो उसका स्वरूप काफ़ी अलग होता."

बिल बुकेनन कहते हैं जैसे-जैसे क्लाउड का इस्तेमाल बढ़ रहा है और डेटा अपनी मूल जगह के बजाय दूरदराज़ के डेटा सेंटर में स्टोर होने लगा है तो ज़रूरत पड़ने पर उसके फ़ौरन उपलब्ध ना होने का जोख़िम भी बढ़ गया है.

इन ख़तरों के बारे मे बिल बुकेनन कहते हैं, "अब हम सुरक्षा की दृष्टि से बेहद अहम डेटा भी सार्वजानिक क्लाउड में स्टोर करने लगे हैं. जैसे कि विमानों के नियंत्रण संबंधी डेटा, या सैनिक संस्थाओं का डेटा. यह ख़तरनाक हो सकता है, हवाई जहाज़ आसमान से गिर सकते हैं, लोग मर सकते हैं."

"ऑपरेशन रुक सकते हैं. इसलिए संस्थाओं को सोचना होगा कि अगर वो इस तरह का संवेदनशील डेटा सार्वजनिक क्लाउड में स्टोर कर रहे हैं तो इसके क्या परिणाम हो सकते हैं और उससे निपटने के उपायों के बारे में सोचना होगा."

दूसरा, बिल बुकेनन यह भी कहते हैं "यह भी सोचना होगा कि अगर अमेजॉन जैसी डेटा स्टोरेज कंपनी ठप हो जाती हैं तो उसके डेटा सेंटर का डेटा दूसरी जगह कैसे ट्रांसफर होगा. विश्व की दो तिहाई से ज्यादा अर्थव्यवस्था डिजिटाइज़्ड हो चुकी है और डेटा लगातार बेशुमार बढ़ता जा रहा है."

अगर ईमेल की ही बात की जाए तो प्रतिदिन लगभग तीन सौ अरब ईमेल भेजे जाते हैं. यह सब डिज़िटल तो है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि पर्यावरण पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता.

क्या क्लाउड पर्यावरण के लिए अच्छा है?

एमा फ़िट्जेराल्ड स्वीडन की लूंड यूनिवर्सिटी में आइटी और इलेक्ट्रिक नेटवर्क की प्रोफ़ेसर हैं. उनका कहना है कि दुनिया में होने वाले कुल कार्बन उत्सर्जन का तीन प्रतिशत उत्सर्जन क्लाउड कंप्यूटिंग और स्टोरेज की वजह से होता है और इसकी तुलना व्यावसायिक विमानन से होने वाले कार्बन उत्सर्जन से की जा सकती है.

बीबीसी से बात करते हुए एमा फ़िट्जेराल्ड ने कहा, "कंप्यूटर बिजली पर चलते हैं और गर्मी भी पैदा करते हैं. दूसरे गर्म वातावरण में वो ख़राब हो सकते हैं इसलिए उन्हें ठंडा रखने की ज़रूरत होती है. इसके लिए ज़रूरी बिजली और कूलिंग के लिए ज़रूरी ऊर्जा का हिसाब लगाया जाए तो यह पर्यावरण पर असर डालते हैं."

दूसरा, बिजली सप्लाई बंद होने की स्थिति में इन डेटा सेंटरों को चालू रखने के लिए बैकअप व्यवस्था की ज़रूरत होती है और यह बैकअप बिजली जनरेटरों से आती है, जो डीज़ल पर चलते हैं.

एमा फ़िट्जेराल्ड कहती हैं, "डेटा सेंटर को निरंतर चालू रखना ज़रूरी है और इसके लिए ज़रूरी बैकअप व्यवस्था मूल बिजली के स्रोतों के मुकाबले पर्यावरण के लिए अधिक नुकसानदेह होती है."

डेटा सेंटर कंपनियां भी चाहती हैं कि उनका बिजली का बिल कम रहे और इसके लिए वो कदम उठाते हैं. मिसाल के तौर पर सोशल मीडिया कंपनी फ़ेसबुक ने अपने डेटा सेंटर उत्तरी स्वीडन में लगाए हैं.

एमा फ़िट्जेराल्ड ने बताया, "वहां मौसम पूरे साल ठंडा रहता है और कूलिंग के लिए लगभग कोई खर्च नहीं आता और डेटा सेंटर से पैदा होने वाली गर्मी को ऊर्जा में बदल कर इलाके के घरों को बिजली दी जाती है."

"यह एक अच्छा तरीका है कंप्यूटरों में इस्तेमाल होने वाली उर्जा को रिनिवेबल एनर्जी में बदलने का. वरना यह कंपनियां बड़े और बेहतर डेटा सेंटर तो बना लेंगी लेकिन उसका पर्यावरण पर बुरा असर पड़ता रहेगा."

इस दौरान दुनिया में डेटा स्टोरेज की मांग तो बढ़ती ही जा रही है. वीडियो फ़ाइलों का बढ़ता इस्तेमाल इसका एक बड़ा कारण है. वहीं ऑगमेंटेड रियलिटी कंटेंट में वृद्धि से डेटा स्टोरेज की ज़रूरत और बढ़ेगी.

अब लौटते हैं कि क्या कभी क्लाउड स्टोरेज की किल्लत पैदा हो सकती है? फ़िलहाल तो लगता है कि जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी और विकसित होगी उसका आकार भी छोटा होता जाएगा.

तो कमी ज़मीन या उपकरणों की नहीं होगी और ज़रूरत के अनुसार, बड़े डेटा सेंटर बनते रहेंगे. मगर चिंता यह है कि इसके लिए आवश्यक ऊर्जा का पर्यावरण पर निश्चित ही असर पड़ेगा.

एमा फ़िट्जेराल्ड कहती हैं, "इस चिंता को सुलझाने के लिए सभी को और ख़ास तौर पर बड़ी कंपनियों को अपनी स्टोरेज और कंप्यूटिंग की ज़रूरतों के बारे में सोचना होगा उसे नियंत्रित रखने के तरीके खोजने होंगे ताकि पर्यावरण पर इसका भार कम पड़े."

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