दूसरे विश्व युद्ध की वो नायिकाएँ जिनके बारे में पता नहीं होगा

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- Author, मार्क शी
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
आपके कभी ये सोचा है कि युद्ध के दौरान हीरो कैसे काम करते हैं? आप सोचते होंगे कि ये ऐसे पुरुष और महिलाएं होते हैं जो कि युद्ध में बहादुरी के साथ लड़े होंगे.
ऐसे में इस साल दूसरे विश्व युद्ध की 75वीं सालगिरह पर हम उन आठ महिलाओं के बारे में बता रहे हैं जिन्होंने अपनी बहादुरी और उपलब्धियों से इस विनाशकारी युद्ध में लड़ रहे लाखों दूसरे लोगों के मुक़ाबले एक अलग मिसाल पेश की. दूसरा विश्व युद्ध यूरोप में 8 मई को ख़त्म हुआ था.
चेंग बेनहुआः मौत को मुस्कुरा कर गले लगाने वाली

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चेंग बेनहुआ एक विरोध की नायिका थीं. वह 1937 में जापान के चीन पर आक्रमण करने के दौरान जापानियों से लड़ी थीं.
संगीन से छलनी किए जाने से ठीक पहले ली गई उनकी एक तस्वीर निर्भय विरोध की एक आइकॉनिक मिसाल बन गई.
उनकी यह तस्वीर एक जापानी फ़ोटोग्राफ़र ने खींची थी. इस फ़ोटोग्राफ़र ने चेंग के अंतिम क्षणों को दर्ज किया है. लड़ाई लड़ते हुए चेंग पकड़ी गईं और फिर उन्हें कैद में डाल दिया गया.
जिन लोगों ने उन्हें पकड़ा था उन्होंने उनके साथ कई दफ़ा गैंगरेप किया, लेकिन वे उन्हें अंतिम सांस तक डिगा नहीं पाए.
इस तस्वीर में वह मौत के सामने भी मुस्कुराती हुई दिखाई दे रही हैं. वह अपनी बाहें मोड़कर अपनी छाती से लगाए हुए हैं. उनका सिर उठा हुआ है और वह बेफिक्र अंदाज़ में कैमरे की लेंस की ओर देख रही हैं.
उनका यही पोज़ नानजिंग में उनकी पांच मीटर की प्रतिमा में उकेरा गया है. नानजिंग खुद एक दूसरे विश्व युद्ध में सबसे बुरे नरसंहार का गवाह रहा है.
यहां तीन लाख से ज़्यादा चीनी पुरुष और महिलाओं को जापानियों ने बुरी तरह से क़त्लेआम किया था.
1938 में जब चेंग की हत्या की गई तब वह महज 24 साल की थीं. इसके एक साल बाद यह युद्ध यूरोप पहुंच गया.
चाइनीज़ हिस्टोरियन और म्यूजियम डायरेक्टर फ़ैन ज़ियानचुआन ने 2013 में पीपुल्स डेली को बताया था कि चेंग बेनहुआ इस भीषण युद्ध में मारे गए लाखों लोगों में सबसे ज़बरदस्त शख्सियत थीं. उन्होंने सबसे ज़्यादा छाप छोड़ी और वह सबसे ज़्यादा सम्मान की हक़दार हैं.
नूर इनायत ख़ानः एक जासूस राजकुमारी
एक भारतीय राजकुमारी और एक ब्रिटिश जासूस के रूप में नूर इनायत ख़ान मैसूर के 18वीं सदी के मुस्लिम शासक टीपू सुल्तान की वंशज थीं.
उनके पिता एक भारतीय थे जो कि एक सूफ़ी शिक्षक थे. जबकि उनकी मां अमरीकी थीं. उनका जन्म मॉस्को में हुआ और उनकी पढ़ाई पेरिस के सोरबॉन में हुई थी.
उन्हें कई भाषाओं की जानकारी थी और उनकी यही ख़ासियत ब्रिटिश स्पेशल ऑपरेशंस एक्जिक्यूटिव (एसओई) को उनके पास तक ले आई. एसओई अंडरकवर एजेंट्स थे जो कि कब्जे वाले फ्रांस में काम कर रहे थे.
ये एजेंट्स फ्रांस के उस हिस्से में नाज़ियों की गतिविधियों को रोकने, तोड़फोड़ करने और अस्थिरता पैदा करने में लगे थे. साथ ही ये विरोध करने वाले फ्रांसीसियों के साथ रिश्ते बना रहे थे और नाज़ी सैनिकों की आवाजाही की खुफ़िया जानकारियां जुटा रहे थे.

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नूर इनायत एक रेडियो ऑपरेटर के तौर पर काम करती थीं. ख़तरनाक काम में लगीं वह पहली महिला थीं. कोई उनके बारे में पता न लगा ले इसके लिए वह लगातार अपनी लोकेशन बदलती रहती थीं.
आख़िरकार उन्हें नाज़ी पुलिस गेस्टापो ने पकड़ लिया. उनके साथ पूछताछ की गई और उन्हें प्रताड़ित किया गया.
कई दफ़ा उन्होंने भगाने की कोशिश की. एक बार तो वह छतों पर होती हुई कैद से निकलने में तकरीबन कामयाब हो गई थीं.
भागने की उनकी हर कोशिश के बुरे नतीजे हुए. उन्हें ज़्यादा सख़्त कै़द और कड़ी पूछताछ का सामना करना पड़ा. लेकिन, ऐसा माना जाता है कि उन्होंने हार नहीं मानी और नाज़ियों को कोई भी अहम सूचना मुहैया नहीं कराई.
जर्मन लोग केवल उनका कोड नाम मैडेलीन ही जान पाए थे. यहां तक कि उन्हें यह तक नहीं पता था कि वह भारतीय हैं.
सितंबर 1944 में इनायत ख़ान और तीन अन्य महिला एसओई एजेंट्स को दाचाऊ कॉन्सनट्रेशन कैंप में भेज दिया गया. 13 सितंबर को उन्हें गोली मार दी गई.
अपने साहस के लिए इनायत ख़ान को मृत्योपरांत ब्रिटिश जॉर्ज क्रॉस और गोल्ड स्टार वाले फ्रेंस क्रोइक्स डे गुएरे सम्मान से नवाज़ा गया.
उनकी यादगार में लंदन के गोर्डन स्क्वैयर गार्डंस में एक मकबरा भी बनाया गया है.
श्रवणी बासु ने स्पाई प्रिंसेस, द लाइफ ऑफ़ नूर इनायत ख़ान नाम से एक किताब लिखी है. बासु ने बीबीसी को बताया, "नूर इनायत ख़ान आज भी प्रेरणा देती हैं. वह न केवल अपनी असाधारण वीरता के लिए याद की जाती हैं, बल्कि वह जिन सिद्धांतों के लिए लड़ीं उनके लिए भी उन्हें याद किया जाता रहेगा."
बासु के मुताबिक, "हालांकि, वह सूफ़ी थीं और अहिंसा में भरोसा करती थीं, लेकिन उन्होंने फ़ासिज़्म के ख़िलाफ़ लड़ाई में अपने जीवन का सर्वोच्च बलिदान दिया."
लुडमिला पावलीचेंकोः लेडी डेथ
लुडमिला पावलीचेंको इतिहास की सबसे कामयाब स्नाइपर्स में से एक हैं. 1941 में सोवियत यूनियन पर नाज़ियों ने हमला दिया. इसके बाद लुडमिला युद्ध में कूद गईं. उनके नाम 309 जर्मन सैनिकों को अपनी राइफल से मार गिराने का ख़िताब है.
उनकी गोली का शिकार होने वाले दुश्मन सैनिकों में दर्जनों ऐसे थे जो खुद भी स्नाइपर थे. चूहे-बिल्ली की लुकाछिपी के खेल में लुडमिला ने इन्हें मौत की नींद सुला दिया. सेवास्तापोल और ओडेसा की जंग में लुडमिला की ख्याति ऐसी फैली कि लोग उन्हें लेडी डेथ के नाम से बुलाने लगे.
नाज़ी स्नाइपर कभी उन्हें निशाना नहीं बना पाए. लेकिन, लुडमिला एक मोर्टार के फायर से घायल हो गईं. हालांकि, वह इस चोट से उबर गईं, लेकिन उन्हें फ्रंटलाइन से हटा लिया गया. उन्हें ऐसे काम में लगा दिया गया जहां वह अपनी ख्याति का इस्तेमाल सोवियत यूनियन के युद्ध के प्रयासों के लिए समर्थन जुटाने में कर सकें.

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रेड आर्मी की पोस्टर गर्ल के तौर पर उन्होंने कई देशों की यात्राएं कीं. इसी सिलसिले में वह अमरीकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूज़वेल्ट से भी मिलीं.
हालांकि, उन्हें गोल्ड स्टार ऑफ़ द हीरो ऑफ़ द सोवियत यूनियन का सम्मान दिया गया, लेकिन बाद में उनकी उपलब्धियों को इतिहास से निकाल दिया गया.
जेंडर इक्वैलिटी एक्टिविस्ट और ब्रॉडकास्टर इरयाना स्वाविंस्का ने बीबीसी को बताया, "यह आश्चर्यजनक है कि एक असाधारण क्षमताओं वाली महिला स्नाइपर को उनकी मौत के बाद उचित सम्मान नहीं दिया गया."
वह बताती हैं, "लेकिन, दूसरे विश्व युद्ध के बारे में सोवियत संघ का नजरिया केवल अपने बहादुर पुरुष सैनिकों तक सीमित रहा. सोचिए किस तरह से युद्ध नायकों के नाम पर बने सारे मकबरे पुरुष सैनिकों के हैं. इस पूरे नैरेटिव में महिलाएं कहीं नहीं दिखाई देतीं."
नैंसी वेकः द व्हाइट माउस
कई मायनों में उनकी शख्सियत बेहद विराट थी. नैंसी वेक की छवि एक भयंकर लड़ाके की थी. साथ ही उन्हें एक जबरदस्त तरीके से फ़्लर्ट करने वाली और दारू पीने वाली औरत के तौर पर भी जाना जाता है. नाज़ियों से उनकी दुश्मनी मशहूर है.
वह न्यूज़ीलैंड में जन्मीं. लेकिन, उनका पालन-पोषण ऑस्ट्रेलिया में हुआ. 16 साल की उम्र में नैंसी स्कूल से भाग गईं और फ्रांस में बतौर पत्रकार काम करने लगीं. माना जाता है कि उन्होंने यह नौकरी पाने के लिए झूठ बोला कि वह मिस्र के इतिहास के बारे में बहुत कुछ जानतीं हैं और इस बारे में लिखना चाहती हैं.
वहां उन्हें फ्रेंच कारोबारी हेनरी फिओक्का मिले. दोनों लोगों ने शादी कर ली. 1939 में जब जर्मनों ने फ्रांस पर हमला किया तब वे मर्सिले में रह रही थीं.

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वेक फ्रांसीसी प्रतिरोध के साथ जुड़ गईं और उन्होंने सहयोगी वायुसैनिकों को स्पेन में सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने में मदद दी.
जब 1942 में उनके नेटवर्क को धोखा दिया गया और उनकी जानकारियां जर्मनों को दी गईं तो वह स्पेन होते हुए ब्रिटेन भाग गईं.
फिओक्का फ्रांस में ही छूट गए थे और उन्हें पकड़ लिया गया. नाज़ियों ने उन्हें टॉर्चर किया और उन्हें मार दिया. वेक फ्रांस वापस पहुंच गईं और उन्होंने ब्रिटिश स्पेशल ऑपरेशंस एग्जिक्यूटिव (एसओई) एजेंट्स के साथ काम करना शुरू कर दिया.
इस दौरान वह कई ख़तरनाक मिशनों में शामिल हुईं. माना जाता है कि उन्होंने एक बार केवल हाथों से ही एक जर्मन संतरी को मार दिया था.
1990 के दशक में एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने बताया, "उन्होंने एसओई में मुझे यह जूडो-चॉप स्किल सिखाई थी. मैंने इसकी खूब प्रैक्टिस की थी. लेकिन, मैंने पहली बार ही इसका इस्तेमाल जंग में किया और एक बार में ही वह संतरी मारा गया."
जंग में बेहद अहम सहयोगी देशों के रेडियो कोड्स खो जाने के बाद उन्होंने 500 किमी की दूरी साइकिल से तय करके दुश्मन के इलाके में घुसकर इसके रिप्लेसमेंट लाने का फैसला किया.
उन्होंने कहा था कि उन्होंने यह काम महज तीन दिन में कर दिखाया था.
वह तैयार होकर जर्मनियों के साथ डेटिंग पर जाती थीं ताकि उनकी जानकारियां हासिल कर सकें.
एक ऑस्ट्रेलियाई न्यूज़पेपर को उन्होंने बताया था, "थोड़ा सा पाउडर और रास्ते में थोड़ी सी शराब पीकर मैं जर्मन पोस्ट्स से गुजरती थी और उनसे पूछती थी कि क्या वे मेरी तलाशी लेना चाहेंगे. हे भगवान, मैं कितना फ्लर्ट करती थी."
उनकी बायोग्राफ़ी लिखने वाले पीटर फिट्ज़सिमोन्स बताते हैं कि वे कई दफ़ा जर्मनों के चंगुल में आते-आते बची थीं.
उनकी बचने की कला से ही जर्मन उन्हें व्हाइट माउस कहकर बुलाते थे. उनकी बायोग्राफी का भी यही नाम है.
वेक को युद्ध के बाद कई अवॉर्ड्स मिले. उनकी मौत लंदन में 7 अगस्त 2011 में 98 साल की उम्र में हुई. उन्होंने इच्छा जताई थी कि उनकी अस्थियां फ्रांस में बिखेर दी जाएं.
जेन वायलेः रिपोर्टर, जासूस और राजनेता
जेन वायले का जन्म रिपब्लिक ऑफ़ कॉन्गो में हुआ था. लेकिन जब वह बच्ची थीं तभी वह पेरिस आ गई थीं. दूसरे विश्व युद्ध के शुरू होने के वक्त वह वहां पर एक जर्नलिस्ट के तौर पर काम कर रही थीं.
वायले ने पेरिस छोड़ दिया और फ्रांसीसी प्रतिरोध के साथ बतौर सीक्रेट एजेंट जुड़ गईं. वह फ्रांस के दक्षिणी हिस्से में काम कर रही थीं. उस वक्त तक यह इलाका जर्मनों के कब्जे में नहीं आया था. यहां विची की कठपुतली सरकार थी.
वह नाज़ी सैनिकों की आवाजाही के बारे में खुफ़िया जानकारी जुटाती थीं और इसे सहयोगी देशों को बढ़ा दिया करती थीं.
दुश्मनों ने उन्हें जनवरी 1943 में पकड़ लिया और उन पर देशद्रोह के आरोप लगाए गए.
उनके राज़ हालांकि किसी को पता नहीं थे क्योंकि उन्होंने अपने डेटा को कोड में इस तरह से तब्दील कर दिया था कि इसे पढ़ पाना नामुमकिन था.
वायले को पहले कॉन्सनट्रेशन कैंप में भेजा गया और उसके बाद उन्हें मर्सिले की महिलाओं की जेल में डाल दिया गया. लेकिन, वह या तो वहां से भाग निकलीं या फिर उन्हें रिहा कर दिया गया और इस तरह से वह जंग के बाद जीवित बच गईं.
उन्हें 1947 में फ्रांसीसी सीनेट का सदस्य चुना गया था.
हेडी लामारः हॉलिवुड की सबसे चमकदार खूबसूरती

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हेडी लामार का जन्म ऑस्ट्रिया में हुआ था. सिनेमा में उनका शानदार करियर था और इससे ही उन्हें शोहरत मिली थी. वह हॉलिवुड का चमकता सितारा थीं और उनके छह पति थे.
जन्म के वक्त उनका नाम हेडविग ईवा मारिया कीस्लर रखा गया था. वह एक रईस यहूदी परिवार में पैदा हुई थीं. उनका जन्म ऑस्ट्रिया के वियना में हुआ था.
सबसे पहले उन्होंने एक हथियारों के डीलर उद्योगपति से शादी की थी. वह उनके तब शुरू ही हुए एक्टिंग करियर से खुश नहीं थे और उन्होंने उन्हें अपने दोस्तों और सहयोगियों के लिए मेजबान बनने का मौका दिया. उनके दोस्तों में कई नाज़ी भी शामिल थे.
लामार इस काम में टिक नहीं सकीं और गुपचुप तरीके से भागकर पहले पेरिस और फिर लंदन पहुंच गईं.
यहां उनकी मुलाकात लीजेंडरी लुइस बी. मेयर से हुई जो कि एमजीएम स्टूडियोज के हेड थे.
उन्होंने उन्हें हॉलिवुड में आने का ऑफर दिया और उन्हें दुनिया की सबसे खूबसूरत महिला के तौर पर प्रचारित किया.
30 से अधिक फिल्मों के जरिए उनकी सफलता ने उन्हें मशहूर कर दिया था. लेकिन, उन्हें असली ख्याति उन्हें उनके इनवेंटर होने की वजह से मिली. इसी वजह से उन्हें इस लिस्ट में शामिल किया गया है.
लामार ने मित्र देशों के लिए एक गाइडेंस सिस्टम डिवेलप किया था. यह गाइडेंस सिस्टम टॉरपीडो के लिए था. फ्रीक्वेंसी को स्विच करने के जरिए दुश्मन उन टॉरपीडो को जाम न कर पाएं इसके लिए उन्होंने इस गाइडेंस सिस्टम को ईजाद किया था.
उनकी खोजों के तत्वों को आज के ब्लूटूथ और वाईफाई टेक्नोलॉजी में देखा जा सकता है.
म्या यीः तलवार और ज़हर वाली योद्धा

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म्या यी का संघर्ष दूसरे विश्व युद्ध में जापानियों के बर्मा पर हमला करने से पहले ही शुरू हो गया था.
वह देश की स्वतंत्रता के लिए कट्टरता से लड़ने वालों में थीं और ब्रिटिश औपनिवेशवाद का विरोध कर रही थीं.
वह दूसरे विश्व युद्ध में प्रतिरोध करने वाली ताकतों के साथ जुड़ गईं और उनके हाथ में हमेशा तलवार रहती थी. साथ ही उनके पास ज़हर की एक बोतल भी रहती थी.
1944 में वह पैदल ही दुश्मन के इलाके में जा पहुंचीं. वह उस वक्त ब्रिटेन के अधीन भारत में पहुंच गईं और वहां से उन्होंने जापानियों के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी.
उन्होंने अपने घावों पर अपनी धोती की पट्टियां बांध लीं और उन्होंने खुद को पुरुषों की मदद से ले जाने से इनकार कर दिया.
भारत में उन्होंने पूरे बर्मा में जापानियों के खिलाफ तैयार किए गए पर्चे फिंकवाने में मदद दी. इन पर्चों में कहा गया था कि जापानी शासन कितना बुरा है और वे बर्मा के लोगों के साथ कितना बुरा व्यवहार कर रहे हैं.
हालांकि, उन्होंने अपने पति के साथ अपने पहले बच्चे के जन्म के बाद बर्मा वापस लौटने का फैसला किया, और उन्हें एक पैराशूटिस्ट के तौर पर ट्रेनिंग भी दी गई, लेकिन आखिर वक्त में उन्होंने अपनी सीट एक अन्य फाइटर के लिए छोड़ दी.
वह 1945 में जंग खत्म होने के बाद ही बर्मा वापस लौट पाईं.
इसके बाद भी उनकी जंग जारी रही. वह स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ती रहीं और उसके बाद उनकी जंग देश के मिलिटरी शासन के खिलाफ शुरू हो गई.
रसूना सैदः एक शेरनी

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रसूना सैद इस लिस्ट में एक अपवाद हैं क्योंकि युद्ध के दौरान वह दुश्मन देशों के साथ कम से कम मामूली तौर से ही मिली हुई थीं.
वह इंडोनेशिया के स्वतंत्रता के संघर्ष का एक बड़ा चेहरा थीं. उनके दुश्मनों में जापानी नहीं थे, बल्कि इंडोनेशिया के डच उपनिवेशवादी थे.
सैद बेहद कम उम्र में ही राजनीतिक रूप से सक्रिय हो गई थीं और उन्होंने इंडोनेशियाई मुस्लिम एसोसिएशन नाम से एक राजनीतिक पार्टी बना ली थी. पेरमी नाम का यह दल उन्होंने अपनी उम्र के बीसवें दशक की शुरुआत में ही बना लिया था. यह संगठन उनके मजहब और राष्ट्रीयता पर आधारित था.
वह जबरदस्त तरीके से भाषण देती थीं. उनकी एक बायोग्राफी में कहा गया है कि वह जब बोलती थीं तो दिन में जैसे बिजलियां कड़कती थीं. डट कॉलोनियल अधिकारियों की आलोचना करने का उनका साहस ही वह वजह था जिससे उनका नाम शेरनी पड़ गया था.
डच अफ़सर अक्सर उनके भाषणों को बीच में ही रुकवा देते थे और एक बार तो उन्हें पकड़कर 14 महीने के लिए जेल में डाल दिया गया.
जब जापानियों ने 1942 में आर्चिपेलागो पर हमला किया तो सैद एक जापान समर्थक संगठन से जुड़ गईं, लेकिन उन्होंने इसका इस्तेमाल अपनी स्वतंत्रता की गतिविधियों को चलाने के लिए किया.
इंडोनेशिया के मामले में जापानियों की हार के बाद भी जंग नहीं थमी. डच अधिकारियों ने फिर से अपना शासन मजबूत करने की कोशिश की.
पहले उन्होंने इसके लिए ब्रिटिश मदद ली, और इससे चार साल का लंबा खूनी संघर्ष शुरू हो गया.
आखिरकार जब डच लोगों ने 1949 में इंडोनेशिया की स्वतंत्रता को मान्यता दी तभी जाकर यह जंग खत्म हो पाई.
इस जंग में सैद की भूमिका को बखूबी याद किया जाता है. इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता की एक मुख्य सड़क का नाम उनपर रखा गया है.
वह लैंगिक समानता और महिलाओं की शिक्षा की बड़ी समर्थक थीं. रसूना सैद इंडोनेशिया की उन कुछ महिलाओं में शामिल हैं जिन्हें नेशनल हीरो का दर्जा हासिल है.
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