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जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली तेज़ रफ़्तार दौड़ती ज़िंदगी का शहर है. बदलते भारत की राजधानी है. पैसा, ऐश्वर्य, संसाधन, रौनक और इनके बीच बेतहाशा भागती ज़िंदगी का शहर. पर इसी दिल्ली का एक चेहरा रूमानियत का है, सूफ़ियत का है. अदब, इंसानियत, इबादत और संगीत का है. ये शहर दरगाहों का भी शहर है. चिश्तियों, औलियाओं की दरगाहें... जहाँ सुलगते लोबान और महकते केवड़े के बीच इतिहास एक दूसरे ही दौर और दुनिया की कहानी कहता नज़र आता है. आधुनिक दिल्ली से ज़रा हटकर जब हम संकरी-तंग गलियों वाले निज़ामुद्दीन इलाके में पहुँचते हैं तो माहौल बदल जाता है. अगरबत्तियों, इत्रों, फूलों और मुग़लई खाने की ख़ुशबू से तबीयत ख़ुश हो जाती है. यहीं इन्हीं तंग गलियों से गुज़रते हुए एक रास्ता हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह की ओर भी जाता है. हज़रत निज़ामु्द्दीन, सूफ़ी परंपरा के एक महान संत. जिनकी दरगाह पर हज़ारों लोग रोज़ देश और दुनिया से मत्था टेकने आते हैं. पर दरगाह के आसपास रहनेवाले लोगों, दर्शन करने के लिए आने वालों, और दरगाह के परिसर के आसपास दरगाह से जुड़ी चीज़ें बेचनेवालों से जब निज़ामुद्दीन औलिया के बारे में और कुछ जानना चाहा, तो जवाब निराश करने वाले थे. सूफ़ी परंपरा के जिस महान औलिया के पास लोग अपने काम बनाने आते हैं, दरअसल, उसके बारे में अधिकतर लोगों को जानकारी कम ही है. परंपरा के पड़ाव भारत में... या बेहतर है कि इसे यहाँ मैं दक्षिण एशिया कहूँ, सूफ़ी परंपरा की शुरुआत होती है सूफ़ी संत मोइनुद्दीन चिश्ती से.
इतिहासकार बताते हैं कि मोइनुद्दीन चिश्ती मध्य एशिया से लंबा सफ़र तय करके इस इलाके में पहुँचे थे. उन्होंने ही दक्षिण एशिया में सूफ़ी परंपरा की नींव रखी. इसे आगे बढ़ाने का काम किया बाबा कुतबदीन औलिया ने. कुतबदीन औलिया से यह परंपरा पहुँची हज़रत फ़रीदुद्दीन मसऊद रहमतुल्ला के पास. गंजशकर वाले बाबा फ़रीद का दरबार आज के पाकिस्तान में है. इन्हीं के शिष्य और भारत में सूफ़ी परंपरा के चौथे सोपान यानी चौथी पीढ़ी के सूफ़ी हैं हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया साहब. मध्य एशिया के बुखारा इलाके से निज़ामुद्दीन औलिया के पिता अपनी पत्नी के साथ भारत में दाखिल हुए. उन्होंने इस्लाम का उस दौर का मरकज़ माने जाने वाले बदायुं इलाके में अपना घर बसाया. यह बात तब की है जब 12वीं सदी ख़त्म हो रही थी और 13वीं शताब्दी में इतिहास दाखिल हो रहा था. यहीं, इसी आज के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बदायुं इलाके में अब से 794 बरस पहले हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का जन्म हुआ. हज़रत निज़ामुद्दीन ने बाबा फ़रीद को अपना गुरू माना और उन्हीं की इजाज़त से सूफ़ी परंपरा को मज़बूत करने के लिए और सूफ़ी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए दिल्ली को अपना केंद्र बनाया. मैं इस दरगाह से अपरिचित तो कतई नहीं हूं. अक्सर यहाँ आता रहा हूं. कभी कव्वाली, सूफ़ी कलामों ने मुझे यहाँ खींचा है तो कभी लोगों की आस्था और विश्वास ने बरबस आश्चर्यचकित करते हुए मुझे यहाँ बुला लिया है. क्या राजा, क्या फ़कीर... निज़ामुद्दीन औलिया की अपनी कोई संतान नहीं थी, पर उनकी बहनों और उस वक्त के स्थापित सूफ़ियों की पीढ़ियाँ पिछले लगभग आठ सौ बरसों से इस दरगाह का कामकाज देखती, संभालती आई हैं.
इनकी आज की पीढ़ियों में से एक गद्दीनशीन फ़िदा निज़ामी साहब से मैंने अपनी आज की जिज्ञासा को दोहरा दिया. यानी सुल्तानों, राजाओं के दौर से लेकर आज तक यहाँ इतनी रौनक कैसे क़ायम है, लोग यहाँ क्योंकर आते हैं.क्या दौर था वो... फ़िदा बताते हैं, "आज के माहौल में भी हज़ारों, लाखों लोग यहाँ रोज़ आते हैं. उन्हें कुछ मिलता है तभी आते हैं. वरना बिना कुछ हासिल हुए लोग अपने पुरखों की मज़ारों पर भी नहीं जाते. जो लोग अपने लिए जीते हैं, वो ख़त्म हो जाते हैं. बाबर, हुमांयु, अकबर, शाहजहाँ... कितने ही बादशाह, राजा आए पर इनकी मज़ारों पर आज जाइए तो एक तरह का डर भी लगता है. यहाँ आने वाले को डर नहीं, सहारा मिलता है." कहा जाता है कि भारत में सूफ़ी परंपरा सबसे ज़्यादा हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के दौर में ही फली-फूली. इन्होंने भाईचारे, प्रेम और इंसानियत का संदेश लोगों को दिया. भेदभाव, जाति-मजहब का फ़र्क इनके दरबार में नहीं होता था. क्या राजा और क्या फ़कीर... बल्कि इस मामले में फ़कीर और ग़रीब उनके दिल और दरबार में ज़्यादा जगह पाते थे. इल्म, लंगर और मौसिकी निज़ामुद्दीन औलिया के दौर की तीन बातें सबसे ख़ास थीं. पहला ज़ोर था इल्म पर. हज़ारों विद्यार्थी और सैकड़ों प्रोफ़ेसर.
दूसरी ख़ास बात थी लंगर... हज़ारों लोग रोज़ इस लंगर में खाना खाते थे. कितनों का पेट और ज़िंदगी इसी से चल-पल रही थी. और तीसरी चीज़ थी महफ़िले समा.. संगीत के ज़रिए मन की शुद्धता और प्यार का पैग़ाम, साथ साथ सुरों की सीढ़ी चढ़कर अपने आराध्य तक पहुँचने की कोशिश... दरगाह पर पीढ़ियों से गाते आए परिवारों की आज की कड़ी हैं ग़ुलाम हुसैन नियाज़ी...फ़िल्मों में गाने के बाद भी गुल़ाम हुसैन को सुकून तभी मिलता है जब सामने हज़रत निज़ामुद्दीन हों और वो गा रहे हों.. गुलाम नियाज़ी कहते हैं, "हमारे पूर्वज हज़रत निज़ामुद्दीन के ज़माने से इस दरबार में गाते आ रहे हैं. ये आज के समय की हाथों में रूमाल बांधकर और चमकीली टोपियाँ पहनकर गाई जाने वाली कव्वाली नहीं रही यहाँ. यहाँ कव्वाली इबादत का एक ज़रिया है." अभी ग़ुलाम नियाज़ी साहब से कुछ बातचीत करके हम आगे बढ़े ही थे कि हमारी मुलाक़ात हो गई साहिबज़ादा गद्दीनशीन सैय्यद गौहर अली निज़ामी से. और फिर सुल्तानी मस्जिद के एक हिस्से में बैठकर बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया. सैय्यद गौहर निज़ामी बताते हैं कि पहले यानी निज़ामुद्दीन औलिया साहब के वक़्त में दरगाह साहब का दायरा इन तंग गलियों और भीड़ भरे छोटे से अहाते तक सिमटा हुआ न था. कई मीलों की ज़मीन थी दरगाह के पास. दक्षिण दिल्ली का एक दूर तक फ़ैला हिस्सा इसी दरगाह की ज़मीन है जिसपर हुकूमतें काबिज होती गईं और अब उनका वापस मिलना नामुमकिन ही है. वो कहते हैं, "अलग अलग दौर में कई हुकूमतों के पास दरगाह की ज़मीन और संपदा जाती रही. ज़रूरतमंदों के लिए दरबार खुला रहता था इसलिए भी चीज़ें लोगों में बाँटी जाती रहीं. हुमांयु का जिस जगह मक़बरा है, वहाँ दरअसल, निज़ामुद्दीन औलिया के लिए घर बना हुआ था. 1947 में बंटवारे के बाद बेसहारा हुए लोगों को भी दरगाह की ज़मीनों पर बसाया गया. आज अगर उनसे ज़मीन मांगी जाए तो कोई वापस नहीं करेगा."
हज़रत निज़ामुद्दीन का ज़िक्र हो और हम हज़रत ख़ुसरो की बात न करें तो पूरा किया-धरा मिट्टी में मिल जाएगा. यह कोई मान्यता का मसला नहीं है बल्कि दोनों नाम एक दूसरे से इतने जुड़े हुए हैं कि एक के बिना दूसरा अधूरा ही रहेगा. हज़रत निज़ामुद्दीन के सबसे क़रीब थे हज़रत अमीर ख़ुसरो. कई भाषाओं के जानकार, फ़ारसी और हिंदी के महान शायर, कवि, लेखक, विचारक. निज़ामुद्दीन औलिया और सूफ़ी संतों की बातों को लयबद्ध शब्दों में बांधकर ख़ुसरो ने सूफ़ियों के फ़लसफ़े को दूर-दूर तक पहुँचाया. यह सिलसिला आज भी जारी है. सैय्यद फ़िदा निज़ामी बताते हैं कि दोनों का लगाव इस क़दर था कि निज़ामुद्दीन औलिया साहब ने एकबार यह तक कह दिया था कि अगर शरीयत की इजाज़त होती तो दोनों साथ होते. बताया जाता है कि निज़ामुद्दीन औलिया का जब अंतिम वक्त आया तो उन्होंने जानबूझकर ख़ुसरो को ख़ुद से दूर किसी काम पर भेज दिया. ख़ुसरो लौटे तो लगभग छह महीने बीत चुके थे. तब हज़रत निज़ामुद्दीन के मज़ार के पास बैठकर ख़ुसरो ने अपना आखिरी शेर लिखा— गोरी सौवैं सेज पर, मुख पर डारै केस, इसी शेर को लिखकर ख़ुसरो ने भी यह संसार छोड़ दिया. आज ख़ुसरो के मज़ार भी हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के दरबार परिसर में ही मौजूद है और मान्यता है कि हज़रत ख़ुसरो को सलाम किए बिना हज़रत निज़ामुद्दीन के दरबार में माथा टेकना अधूरा है. तो क्या सूफ़ी संतों की महान परंपरा आज भी उतनी ही मज़बूती और गहराई से क़ायम है. क्या सूफ़ियों का संदेश और विचारधारा को आगे ले जाने वाली पीढ़ी अभी भी हैं. हैं, तो किस तरह आगे जा रहा है सिलसिला...
और इस पूरे संदर्भ में कहाँ है वो आम आदमी जिसकी बात सुफ़ियों ने सबसे ज़्यादा और पूरज़ोर कही. साहिबज़ादा गौहर निज़ामी इस सवाल पर फ़रमाते हैं कि सूफ़ियत ढल जाने या क़ायम न रह पाने जैसी बात नहीं है. थोड़े भटकाव आते हैं पर परंपरा को आगे ले जा रहे लोग कुछ भटके भी तो साथ नहीं छोड़ते. हाँ, लोगों को लेकर उनकी चिंता तगड़ी थी. उनका आकलन था कि 90 प्रतिशत लोग ऐसे ही हैं जिनका मकसद है दरगाह पर आना और अपनी ज़रूरत के हिसाब से मुराद मान्यता दरबार में रखना. ऐसे लोग कम हैं जो वाकई इन सूफ़ी संतों की बातों, विचारधारा, दर्शन को समझकर आगे बढ़ना चाहते हैं. सूफ़ियों का दायरा किसी भी मजहब के दायरे से ऊपर उठकर होता है. पर इतिहास में सूफ़ियों की इस परंपरा की जड़ें इस्लाम से ही पैदा होती दिखती हैं. ऐसे में यह सवाल भी उठता ही है कि इस्लाम की पहचान सूफ़ियों की महान परंपरा की जगह आज एक कट्टरपंथी, कठोर और रूढ़िवादी मुसलमान की क्यों बन गई है. फिर सूफ़ियों की इतनी सच्ची और खरी बातें क्यों इस्लाम और दुनिया को दिशा नहीं दे पा रही हैं. गौहर निज़ामी इस बात से सहमत नहीं हैं कि आज सूफ़ियों का दायरा धार्मिक कट्टरवादियों के आगे कमज़ोर और छोटा हो गया है और इस मसले को कुछ इस तरह समझाते हैं, "कट्टरपंथियों का दायरा कभी भी हमारे से बड़ा नहीं हो सकता. वो केवल अधकचरेपन के साथ इस्लाम को खींचकर आगे चलने की कोशिश कर रहे हैं. दरगाहों पर तो सारे मजहब, मान्यता के लोग आते हैं. हज़रत निज़ामुद्दीन अपने ज़माने के सबसे ज़्यादा पढ़े-लिखे लोगों में थे. उन्होंने इस्लाम और कई और मसलों पर पढ़ा, समझा और फिर लोगों को सही रास्ता दिखाया." बात हज़रत निज़ामुद्दीन की हो, कबीर की या नानक देव की...इन सूफ़ियों–संतों का मकसद संगमरमर की तरह साफ़ रहा है. मकसद, कि भले ही दौर बदले, माहौल बदले, राजा बदले, सियासत बदली... पर इन सबके बीच इंसान इंसान तो बना ही रहे. मकसद, कि मोहब्बत और भाईचारा किसी भी मजहब या पंथ की आत्मा बने ताकि दुआ के लिए उठने वाले हाथ कभी किसी को नुकसान न पहुँचा पाएं. मकसद, कि सूफ़ी रहे न रहे, उसके काम और कहे के ज़रिए वो कोशिश तो क़ायम रहे जिसके दम पर विश्वास स्वार्थ और सीमाओं से जीतता जाता है....
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