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मंगलवार, 30 अक्तूबर, 2007 को 22:38 GMT तक के समाचार
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क्या कहती है सूफ़ी शायर रूमी की बांसुरी

मौलाना रूमी
रूमी के बाद उनके शागिर्दों ने मौलवी परंपरा चलाई
आज हम जब किसी से उसकी शैक्षणिक योग्यता के बारे में पूछते हैं तो जवाब में सुनने को मिलता है बीए, एमए, बीएससी, एमफ़िल, पीएचडी, वग़ैरह...

लेकिन भारत में ही एक दौर ऐसा था जब इस सवाल के जवाब में लोग कहते थे, हमने रूमी को पढ़ा है, सादी को पढ़ा है, हाफ़िज़ को पढ़ा है, ख़य्याम को पढ़ा है यानी इन सारे लोगों को पढ़ना अपने आप में एक डिग्री हुआ करती थी.

इस साल दुनिया भर में रूमी की 800वीं सालगिरह बड़े धूम धाम से मनाई जा रही है जिस की शुरुआत तुर्की के शहर क़ौनिया से हुई और विश्व भर में इस सिलसिले में कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है.

अफ़ग़ानिस्तान के शहर बल्ख़ में पैदा होने वाल 13वीं शताब्दी के सूफ़ी कवि के बारे कहा जाता है:

मौलवी हरगिज़ न शुद मौलाए रूम
ता ग़ुलामे-शम्श तब्रेज़ी न शुद

यानी रूमी का उस समय तक रोम वासियों के दिलों पर राज क़ायम नहीं हुआ था जब तक कि वह सूफ़ी शम्स तबरेज़ के भक्त नहीं बने.

रूमी की किताब
रूमी के दीवान में पचास हज़ार शेर हैं

रूमी ने अपनी कविता संग्रह का नाम अपने पीर शम्श तबरेज़ के नाम पर दीवाने-शम्स तबरेज़ रखा है जिस में पचास हज़ार शेर हैं.

उनकी दूसरी किताब है मसनवी मौलवी मानवी जिसे मसनवी मौलाना रूम के नाम से भी जाना जाता है. इसमें 27 हज़ार से भी अधिक शेर हैं. लेकिन यह किताब अधूरी रह गई और उन्होंने लिखवाना बंद कर दिया.

जब उनसे कहा गया कि इसे पूरा करवा दें तो उन्होंने कहा कि जिस सुराख़ से प्रकाश आता था वह बंद हो गया है और यह कहानी वह पूरा करेगा जिसके दिल में वही प्रकाश ज्वलित होगा जो मेरे दिल में है.

किताब की तलाश में

रूमी पर किताब की तलाश में मैं उत्तरप्रदेश के मुज़फ़रनगर ज़िले के कांधला पहुंचा जहां मुझे एक निजी पुस्तकालय में रूमी की मसनवी का वह नुसख़ा मिला जिसे मुफ़्ती इलाही बख़्श ने लगभग दो सौ वर्ष पहले पूरा किया था.

यह पुस्तकालय कांधला के मोहल्ला मौलवियान में स्थित है जिसका नाम शायद मौलाना रूमी से प्रभावित है. मुफ़्ती इलाही बख़्श वहीं के रहने वाले थे और आज भी उनका मज़ार वहीं स्थित है.

मुफ़्ती इलाही बख़्श के ख़ानदान के मौलाना राशिद कांधलवी ने मसनवी पूरा करने का क़िस्सा बताते हुए कहा कि मुफ़्ती इलाही बख़्श अपनी बेटी की ससुराल गए हुए थे जहां वह एक मस्जिद में ठहरते थे, वहीं उन्होंने ख़्वाब देखा जिसमें मौलाना रूमी ने उनसे मसनवी पूरा करने के लिए कहा जिसके बाद उन्होंने मसनवी को पूरा किया.

रूमी की सालगिरह
यूनिसको 2007 को रूमी-वर्ष के रूप में मना रहा है

मुफ़्ती इलाही बख़्श का भी वही कहना था जो रूमी का कहना था कि वह नहीं लिख रहे हैं बल्कि उनसे लिखवाया जा रहा है. यानी ग़ालिब के अनुसार, आते हैं ग़ैब से ये मज़ामीं ख़्याल में.

मुफ़्ती इलाही बख़्श के काव्य के बारे में कहा जाता है कि वह पूरी तरह उसी शैली को दर्शाता है जिस में मौलाना ने लिखा था.

रूमी की लोकप्रियता

रूमी की लोकप्रियता को बताते हुए मौलाना राशिद कांधलवी ने कहा की सूफ़ियों की जितना भी परंपरा है वहां रूमी की मसनवी को पढ़ा जाता है जिससे दिल पर ख़ास असर पड़ता है और पढ़ने वाला आध्यात्मिक दुनिया में पहुंच जाता.

यह किताब आत्मा के ईश्वर से जुदा होने के बारे में है जिसे बांसुरी के रोने से बयान किया गया है.

रूमी का कहना है कि सुनो बांसुरी क्या कहती है वह अपनी जुदाई की शिकायत बयान करती है. मसनवी में क़िस्से के ज़रिए इस्लाम धर्म की बहुत सी बारीक बातों को समझाने की कोशिश है.

एक शायर ने मसनवी का मूल्यांकन करते हुए लिखा है:

मसनवी-ए-मोलवी-ए-मानवी
हस्त क़ुरआँ दर ज़बाने-पहलवी

यानी मसनवी मौलवी मानवी दर असल फ़ारसी भाषा में लिखी गई क़ुरान है. लेकिन ख़ुद रूमी का कहना है कि इसमें क़ुरान और हदीस की बातें है.

मौलाना राशिद ने कहा कि इसे लोग रोज़ाना पढ़ते थे और जो पूरी मसनवी ठीक ढ़ंग से पढ़ ले वह जीवन के रहस्य से वाक़िफ़ हो जाएगा.

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