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सोमवार, 01 अक्तूबर, 2007 को 12:13 GMT तक के समाचार
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आज भी गाए जा रहे हैं रूमी के छंद

रूमी (सौजन्य:हैदर हतेमी)
रूमी ने सूफी परंपरा को लोकप्रिय बनाया
पिछले कई सालों से अमरीका में जो कवि सबसे लोकप्रिय रहे हैं वह हैं पुराने समय के एक मुस्लिम कवि मौलाना जलालुद्दीन रूमी.

अफ़ग़ानिस्तान में 13वीं शताब्दी में हुए सूफ़ी कवि रूमी की शायरी का अनुवाद अमरीका में बहुत लोकप्रिय हैं और मैडोना जैसी पॉप गायिका ने उनके शेरों को अपने गीतों में भी इस्तेमाल किया है.

रविवार को रूमी के जन्म की 800वीं सालगिरह थी. रूमी मध्य एशिया में बल्ख नामक जगह पर पैदा हुए थे जो अब अफ़ग़ानिस्तान में है.

अमरीका के लोगों को रूमी के छंदों में प्यार की ताकत के प्रति प्रदर्शित कृतज्ञता और संगीत और नृत्य में आध्यात्मिकता खोजने की कोशिश बहुत पसंद आती है.

हालांकि कुछ विद्वानों का मानना है कि रूमी दो इंसानों के बीच प्यार की बात नहीं करते वो तो इंसान और भगवान के बीच के प्यार की बात करते हैं.

रूमी की पहचान

 जब कोई धार्मिक विषयों का जानकार मसनवी पढ़ता है तो वो उसमें धार्मिकता के तत्व ढूँढता है. जब कोई समाजशास्त्री उसे पढ़ता है तो सोचता है कि रूमी कितना विद्वान समाजशास्त्री था. जब कोई पश्चिम का आदमी मसनवी पढ़ता है तो वो रूमी को मानवता की भावना से भरा पाता है
अब्दुल क़ादिर मिस्बाह, सांस्कृतिक मामलों के जानकार

रूमी के देश पहुँच मैंने यह जानना चाहा कि अपने देश में उनकी कितनी पहचान बची रह गई.

आपको याद ही होगा कि तालेबान शासन के दौरान अफ़ग़ानिस्तान में संगीत पर प्रतिबंध लगा दिया गया था.

एक युवा पुरातत्वविद रज़ा हुसैनी मुझे एक टूटे-फूटे मदरसे जैसी जगह पर ले गए. ऐसा माना जाता है कि रूमी के पिता यहीं पढ़ाया करते थे और रूमी ने यहीं से पढ़ाई की थी.

इस इलाक़े में रूमी से पहले भी सूफ़ीवाद प्रचलित था और आज भी शहर के इस हिस्से के मदरसे में सूफ़ी गीत और प्रार्थनाएँ गाईं जाती हैं.

लेकिन रज़ा हुसैनी यह नहीं बता पाते कि सूफी गीत-संगीत दूसरे हिस्सों में कितना मशहूर है.

जब रूमी अपनी युवावस्था में ही थे तभी मंगोल आक्रमणकारियों ने बल्ख़ पर हमला किया.

रूमी अपने परिवार के साथ कोन्या जाकर बस गए जो अब तुर्की में है.

अपने क़रीबी दोस्त शम्स-ए-तबरेज़ की हत्या के बाद वो सालों तक उदास और परेशान रहे लेकिन बाद में अपनी महानतम साहित्यिक कृति मसनवी लिखी.

यह किताब आत्मा के ईश्वर से अलग होने और उनके आपसी मिलन के बारे में बताती है.

बल्ख़ प्रांत की सरकार में सांस्कृतिक मामलों के एक विशेषज्ञ अब्दुल कादिर मिस्बाह का कहना है कि रूमी की शायरी में सहिष्णुता और प्यार देखने को मिलता है और उनके शेरों में एक शाश्वत अपील है.

परंपरा

मदरसा जिसमें रूमी पढ़े थे
आज भी इस मदरसे को बहुत से लोग देखने आते हैं

मिस्बाह कहते हैं, "आदमी चाहे पूरब का हो या पश्चिम का वो रूमी के शेरों को महसूस कर सकता है."

"जब कोई धार्मिक विषयों का जानकार मसनवी पढ़ता है तो वो उसमें धार्मिकता के तत्व ढूँढता है. जब कोई समाजशास्त्री उसे पढ़ता है तो सोचता है कि रूमी कितना विद्वान समाजशास्त्री था. जब कोई पश्चिम का आदमी मसनवी पढ़ता है तो वो रूमी को मानवता की भावना से भरा पाता है."

आज सूफी परंपरा अफ़ग़ानिस्तान में नहीं दिखाई देती है. लेकिन पुरातत्वविद हुसैनी की मदद से मैंने सूफी संगीतकारों के एक समूह को खोज निकाला.

मज़ार-ए-शरीफ़ शहर में मिले ये सूफी संगीतकार रूमी की शायरी से बहुत प्यार करते हैं.

रूमी को बाँसुरी बहुत अच्छी लगती थी.

मैं रूमी के बारे में जानकारी रखने वाले प्रोफेसर अब्दुलाह रोहेन नाम के एक आदमी से मिला. उनका कहना था कि हाल में रूमी के बारे में लोगों की जानकारी में कमी आई है.

उन्होंने बताया, "चालीस साल पहले लोगों की आर्थिक स्थिति अच्छी थी. लोग गर्मियों में काम करते और खाना इकट्ठा करते थे और ठंड के मौसम में बैठकर खाते थे. इसलिए ठंड में लोग खाली होते थे. वो मस्जिद में इकट्ठा होते थे और रूमी के गीत गाते थे."

प्यार का संदेश

उन्होंने बताया, "पिछले 10 से 15 सालों में लोगों की आर्थिक स्थिति ख़राब हुई है. इसलिए वो रूमी से दूर हो गए हैं."

अब्दुलाह रोहेन का कहना था, "अफ़ग़ानिस्तान में कम्युनिस्टों का शासन आने के बाद से भी रूमी की छंदों की लोकप्रियता कम हुई क्योंकि वो इसे पुरातनपंथी मानते थे. उसके बाद तालेबान ने सूफ़ी संस्कृति को कुचलने की कोशिश की. लेकिन अब यह फिर से जगह बना रहा है."

रूमी के बहुत से पश्चिमी प्रशंसकों ने उनके संदेश को धर्मनिरपेक्ष बताने की कोशिश भी की है.

प्रोफेसर रोहेन का मानना है कि वो पहले धार्मिक थे.

मैंने उनसे रूमी के संदेश को संक्षेप में बताने के लिए कहा तो उन्होंने कहा, "रूमी कहते हैं- अगर आसमान प्यार नहीं करता तो वो इतना साफ दिखाई नहीं दे सकता. अगर सूरज प्यार नहीं करता तो वो हमें प्रकाश नहीं दे सकता. अगर नदियों को प्यार नहीं है तो वो प्रवाह में नहीं आ सकतीं. यदि धरती को प्यार नहीं है तो कुछ भी प्रगति नहीं हो सकती."

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