|
'कोई देश युद्ध नहीं चाहता, पर युद्ध हो तो..' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
'हम युद्ध नहीं चाहते. कोई भी युद्ध नहीं चाहता पर युद्ध की स्थिति पैदा हो जाए तो हमारी आंखों में आंसू नहीं, चेहरे पर मुस्कान होती है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है पर इसराइल ऐसा करने को मजबूर है...' यह उदगार हैं इसराइली नाटक 'द डेज़ ऑफ़ एडल' के मुख्यपात्र सेमुअल हजेस का. दिल्ली में इन दिनों चल रहे 11वें अंतरराष्ट्रीय भारत रंग महोत्सव में दुनियाभर से आए नाटकों के बीच एक प्रस्तुति इसराइल से भी थी. इसाक बेनाबू के निर्देशन में भारत आया यह नाटक इसराइल में ख़ासा पसंद किया जाता है. कहानी एक ऐसे अरब व्यक्ति की है जो मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं है और उस हालत में ख़ुद को यहूदी मानता है. कलाकार सेमुअल कहते हैं कि नाटक इसराइल के लोगों की ज़िंदगियों का सच है. यह इसराइल के आम लोगों की कहानी है...कैसे यहूदी और अरबी लोग एक दूसरे के साथ, एक दूसरे से प्रभावित होते हुए और प्रभावित करते हुए रहते हैं. वो कहते हैं, "यह हमारे घरों के पड़ोस की कहानी है जिसे हम दुनिया की नज़र से नहीं, राजनीति और सियासी नज़र से नहीं, मानवीयता की नज़र से देख रहे हैं." इसराइल का यह नाटक भारत में ऐसे वक्त में हो रहा है जब इसराइल की सेना ग़ज़ा पट्टी में फ़लस्तीनियों के ख़िलाफ़ बड़ा सैनिक अभियान चला रही है. इसराइल इसे हमास के हमलों का जवाब बता रहा है और जवाबी कार्रवाई में ग़ज़ा क्षेत्र में 900 से ज़्यादा लोगों की जानें जा चुकी हैं. युद्ध और शांति नाटक मानवीय भावना और संवेदनशीलता, मानवता के संदर्भों को समेटे हुए भारत आया तो हमने युद्ध के हालात में इन बातों की प्रासंगिकता को भी छेड़ा. भारत में इसराइल के राजदूत मार्क सोफ़र इस बाबत कहते हैं, "ग़ज़ा में जो कुछ हो रहा है वो दुखद है. वहाँ वाकई संकट की स्थिति है और हम अपेक्षा करते हैं कि जल्द से जल्द वहाँ सामान्य स्थितियाँ बहाल होंगी. पर साथ ही हम यह भी सोच रहे हैं कि भारत अपनी सुरक्षा के लिए क्या कर रहा है क्योंकि भीतरी और बाहरी स्तर पर चरमपंथ की चुनौती भारत झेल रहा है." पर नाटक के कलाकार सेमुअल एक और पक्ष की ओर इशारा करते हैं. वो कहते हैं, "फ़लस्तीनी लड़ाकों ने आठ बरसों से हमारे घरों पर बमबारी जारी रखी है. उसकी चर्चा आप क्यों नहीं करते. मेरे माँ-पिता उस इलाके में रहते हैं जहाँ आए दिन हमले होते रहते हैं." तो क्या कारण है कि समूह ऐसे नाटक के साथ आया जो युद्ध के बाद और समाज के भीतर की स्थितियों को भी कुरेदता है? इस पर वो बताते हैं, "यह बहुत इसराइली किस्म का नाटक है. हम जब भारत आए तो सोचा कि भारत को शेक्सपियर की कहानी दिखाने के बजाय वो दिखाया जाए जो इसराइल का सच है. वहाँ रोज़ घट रहा है." इसराइली राजदूत मार्क कहते हैं, "जो समाज युद्ध और संघर्ष की स्थितियों में रहने के लिए विवश होते हैं, वहाँ लोगों के बीच मानसिक चुनौतियाँ, बीमारियाँ पैदा होती ही हैं. यह केवल इसराइल नहीं, पूरी दुनिया का सच है." भारत और इसराइल भारत में इसराइल के इस नाटक से दो महीने पहले की ही घटना है जब चरमपंथी हमलों में एक इसराइली सांस्कृतिक केंद्र निशाना बनाया गया था. मुंबई में 26 नवंबर को हुए हमलों में चरमपंथी जिन जगहों पर घुसे और अपना निशाना बनाया, उनमें मुंबई स्थित यहूदियों का सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र नरीमन हाउस भी था. ऐसे में जब इसराइल का यह समूह भारत के लिए रवाना हुआ तो क्या चरमपंथ का सवाल और सुरक्षा की चिंता उनके दिमाग में नहीं कौंधी? यह पूछने पर समूह के लोग कहते हैं कि एक बार सवाल ज़रूर उठा था पर 'हम भारत को बहुत पसंद करते हैं और चरमपंथ से डरते नहीं कि अपने क़दम रोक दें.' वे कहते हैं कि भारत में तो हर कोने में यहूदी पाए जाते हैं. सेमुअल कहते हैं, "चरमपंथ की समस्या इसराइली लगातार झेल रहे हैं. येरुसलम में हमले होते रहते हैं, आम इसराइली भी मारे जाते हैं. ऐसा ही भारत में भी हो रहा है. हम इसीलिए भारत के लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हैं क्योंकि चरमपंथ के चलते यहाँ भी लोगों ने अपनों को खोया है. पर साफ़ कर दूं कि चरमपंथ वो आखिरी चीज़ है इस दुनिया में जो हमें रोक सकती है." और क्या मुंबई के हमलों के बाद भारत में इसराइली केंद्र की सुरक्षा को लेकर गंभीरता बरती जा रही है, क्या इसके लिए और कड़े इंतज़ाम हो रहे हैं? यह पूछने पर राजदूत मार्क बताते हैं, "हमें भारत की सुरक्षा व्यवस्था और अधिकारियों पर विश्वास है. न तो मुंबई के हमलों के बाद से हमारी सांस्कृतिक गतिविधियां रुकी हैं और न ही हमने सुरक्षा के अतिरिक्त इंतज़ाम किए हैं. हमें इसकी ज़रूरत नहीं लगती." इसराइली समूह के लोग बताते हैं कि देश में ऐसे भी रंगकर्मी हैं जो दुनिया की नज़र से सोचते हैं. पड़ोस और मध्यपूर्व के बाकी सवालों की ही बात करते रहते हैं पर ऐसे लोग छोटी तादाद में हैं. एक छोटी सी आबादी वाले देश में समूह को अपने लोगों की बातें कहते, बताने और दिखाने में ज़्यादा रुचि है. इसराइल की यह प्रस्तुति उस जीतने की आदी, सीमा के समाज की कथा है जो दीवारों के भीतर कुछ कमियों को भी समेटे होती है. जीत हमेशा पूरी नहीं होती है. जीत के साथ या उसके बाद सब कुछ ठीक नहीं होता...कमियाँ, तकलीफ़ और दर्द हमेशा बने रहते हैं...इसराइल हो, या ग़ज़ा..या कोई और जगह...
|
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||