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मंच पर बंटवारे का दर्द और ताज़ा हालात | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
“हम एक हैं, हम सदियों से एक हैं और एक ही रहेंगे. हमें एक होना चाहिए भी. जैसे कुनबे में लोग एक साथ रहते हैं, कुछ नोंक-झोंक और असहमतियों के बीच, वैसे ही एक साथ रहकर एक दूसरे को बर्दाश्त करना चाहिए..... ” भारत-पाकिस्तान के बीच सियासी तनाव, नाटक न होने देने की धमकियों और खचाखच भरे सभागार में ताली बजाते लोगों के साथ दिल्ली में पाकिस्तान से आए नाटक- जिन लाहौर नहीं वेख्या का मंचन संपन्न हुआ. मौका था दिल्ली में प्रति वर्ष होने वाले अंतरराष्ट्रीय रंगमंच महोत्सव का जिसमें दुनिया के कई अन्य देशों के साथ ही पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के नाटकों का भी मंचन हो रहा है. इसी कड़ी में रविवार को- जिन लाहौर नहीं वेख्या नाटक का मंचन हुआ जिसकी पटकथा भारत के जाने-माने साहित्यकार असगर वजाहत ने लिखी है और नाटक का निर्देशन किया है पाकिस्तान की जानी-मानी रंगकर्मी शीमा किरमानी ने.
हालांकि रविवार को सुबह से ही राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में सुरक्षा एकदम सख़्त कर दी गई थी. वजह थी नाटक के मंचन से पहले ही नाटक के मंचन का विरोध और उसे रोकने की धमकियां जो कथित रूप से हिंदूवादी संगठनों की ओर से जारी की गई थी. रंगकर्मियों और दर्शकों में यह भ्रम बना रहा कि कहीं कथित हिंदुवादी संगठनों की धमकियों के बीच इस नाटक का मंचन रद्द न हो जाए पर आखिरकार नाटक का मंचन हुआ और इतना पसंद किया गया कि रंग महोत्सव में अबतक का सबसे ज़्यादा सराहा गया नाटक साबित हुआ. लोगों ने देर तक खड़े होकर तालियों की ज़ोरदार गड़गड़ाहट के साथ नाटक के पूरे होने पर रंगकर्मियों का धन्यवाद व्यक्त किया. कुछ पलकें नम थीं तो कुछ गले रूंधे हुए और इन सबके बीच यह अहसास न मालूम कहाँ गया कि नाटक करने वाले किसी ग़ैर मुल्क के हैं. ग़म का फ़साना... दरअसल, नाटक का विरोध करनेवालों की दलील है कि पाकिस्तान से भारत को जो मिल रहा है और जिस तरह की तकलीफ़ आतंकवाद या चरमपंथ के ज़रिए भारत झेल रहा है, उसके बाद किसी भी तरह के संबंधों की गुंजाइश नहीं रह जाती है.
पर नाटक लेकर आई निर्देशक शीमा किरमानी ने कहा कि ये नाटक दो मुल्कों के बीच किसी तरह की दूरी पैदा करने वाला नहीं, बल्कि टूटे दिलों को जोड़ने का काम करने वाला है. असग़र वजाहत का यह नाटक 1947 में भारत-पाकिस्तान बंटवारे की पृष्ठभूमि पर आधारित है. नाटक दोनों ओर से उजड़े हुए लोगों के दर्द को बयाँ करता है. इस नाटक का दो दिन बाद ही लखनऊ में भी मंचन होना था पर अब ताज़ा हालातों में इसे रद्द कर दिया गया है. नाटक की निर्देशक शीमा कहती हैं, “लखनऊ मेरा अपना शहर है. हम लखनऊ से ही ताल्लुक रखते हैं. अब धमकियों और सुरक्षा की चिंताओं के बीच वहाँ जाने से मना कर दिया गया है. हमें यह जानकर तकलीफ़ हुई है. फिर यह नाटक भी तो लाहौर और लखनऊ के बीच की कहानी है.” पिछले वर्ष तक भारत-पाकिस्तान के संबंधों में दोनों ओर से लोग सुधार के फूल लगने की आस लगाए हुए थे. पर नवंबर, 2008 में मुंबई में चरमपंथी हमलों ने पूरी फ़िज़ा ही पलटकर रख दी. तेरा भी है, मेरा भी... नाटककार एमके रैना कहते हैं, “इस तरह के हमलों से सबसे ज़्यादा असर दोनों ओर के आम लोगों पर पड़ता है. माहौल बिगड़ने पर तकलीफ़ भी सबसे ज़्यादा इन्हें ही झेलनी पड़ रही है.”
नाटक देखने आए भारत के चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने कहा, “इस नाटक में साफ़ बताया गया है कि बंटवारे के लिए ज़िम्मेदार लोग और थे और उसका दर्द झेलने वाले और हैं. आज भी लोग वो दर्द झेल रहे हैं. सियासत को इससे सबक लेना चाहिए.” पर 2009 भारत और पाकिस्तान के बीच जिस तरह के तनाव के साथ शुरू हुआ है, ऐसे हालात में नाटक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की बात कितनी असरदार रह जाएगी, पूछने पर नाटक की निर्देशक शीमा कहती हैं, “हम यही बताना चाहते हैं कि सियासी दाँव और हैं पर आम लोग तो अमन चाहते हैं, मोहब्बत और प्यार चाहते हैं, भाईचारा चाहते हैं. हम दोनों ओर बैठे मुट्ठी भर रूढ़ीवादी और चरमपंथियों की धमकियों से क्यों डरें. मुझे तो आम लोगों पर यकीन है और आम लोग ऐसा नहीं चाहते.” शीमा बीबीसी से बातचीत में ज़ोर देकर कहती हैं, “लोगों को सोचने का मौका देने के लिए हम नाटक लेकर आए हैं. लोग इसपर फिर से सोचें कि बंटवारा करके क्या सारे मसले हल हो गए. क्या हासिल हुआ हमें और आज जो भी हालात या चरमपंथ जैसे संकट दोनों ओर पनप रहे हैं, क्या इसकी जड़ें बंटवारे में दिखाई नहीं देतीं.” नाटक देखने आए कई लोगों ने मुझसे बातचीत में लगभग एक जैसी बात कही... लड़ाई हल नहीं है. तोड़कर तकलीफ़ ही मिलती है. आम आदमी का चेहरा याद करें, उसकी तकलीफ़ें याद करें और सियासतदान इतिहास से सबक लें.
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