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एक मुलाक़ात अनुपम खेर के साथ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. बीबीसी एक मुलाक़ात में इस बार के मेहमान हैं जाने माने अभिनेता अनुपम खेर. आपने अभिनय की शानदार पारी खेली है. आपकी नज़र में कैसा रहा ये सफ़र? सफ़र बहुत खूबसूरत रहा, इसके लिए मैं भगवान का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ. मैं छोटे से शहर शिमला का रहने वाला हूँ. छोटे शहर में आदमी सिर्फ़ सपने देखता है, बहुत कम लोगों के सपने पूरे होते हैं. मैं उन खुशकिस्मत लोगों में शामिल हूँ जिसका लोकप्रिय होने, अपनी ख़ास पहचान बनाने और सफल होने का सपना पूरा हुआ. ईश्वर ने मुझे एक्टिंग स्कूल खोलने में भी कामयाबी दी है. तो कुल मिलाकर अब तक का सफ़र शानदार रहा है. आप हमेशा से ही अभिनेता बनना चाहते थे क्या? मेरी कोशिश कुछ अलग करने की थी. मैं लोगों से कुछ अलग दिखना चाहता था. इसका कारण था कि जब आप छोटे शहर से हों, मध्यमवर्गीय परिवार से हों, पढ़ाई में बहुत अच्छे न हों, खेल में भी ठीक-ठाक ही हों और फिर भी आप चाहें कि भीड़ से अलग नज़र आएँ. मैं लोगों की नक़ल करता था. तब लोग कहते थे कि ये लड़का हर किसी की नक़ल करता है. जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, मेरे अंदर अभिनेता बनने की इच्छा तेज़ हुई. मैं स्कूल-कॉलेज में नाटकों में हिस्सा लेता था. फिर मैंने डिपार्टमेंट ऑफ़ इंडियन थियेटर चंडीगढ़ में एक साल का डिप्लोमा किया. इसके बाद दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से तीन साल का कोर्स किया. तो कह सकते हैं कि ये प्रोसेस एक्टर बनने का ही था. और सबसे अच्छी नक़ल किसकी करते थे? अपने पिताजी की. दरअसल, मेरे पिताजी सुबह-सुबह एक डबलरोटी बेचने वाले की शक्ल देखना चाहते थे क्योंकि एक बार सुबह-सुबह उसकी शक्ल देखने के बाद उनकी 50 रुपये की लॉटरी लगी थी और वो लोअर डिवीजन क्लर्क से अपर डिवीजन क्लर्क बन गए थे. उन्हें लगता था कि ये सब डबलरोटी वाले की शक्ल देखने से हुआ है. हम बहुत छोटे कमरे में रहते थे. जैसे ही डबलरोटी वाले की आवाज़ आती वो बिना आँख खोले कमरे से बाहर निकलते. बाद में डबलरोटीवाले को लाने के लिए मेरी और मेरे भाई की ड्यूटी लगा दी गई थी. मैं अपने टीचरों की नक़ल भी उतारता था. इन सब चीज़ों से मुझे काफ़ी फ़ायदा हुआ और ये मेरे अभिनय में काम आईं. बच्चे अपने किसी न किसी अध्यापक का मजाक ज़रूर उड़ाते हैं? मैं समझता हूँ कि इसकी वजह ये है कि बच्चे उन्हें शारीरिक तौर पर दूसरों से बड़ा महसूस करते हैं. माता-पिता बच्चे को अपने कंधे पर बिठा लेते हैं, इसलिए उनके बड़े होने का अहसास बच्चों को नहीं होता है. और कोई फ़िल्मी अभिनेता, जिसकी आप नक़ल करते हों?
मैं बहुत ख़राब मिमिक हूँ. एक हिसाब से ये अच्छा भी हुआ क्योंकि मेरा मानना है कि बहुत अच्छे मिमिक अच्छे एक्टर नहीं बनते. पर बहुत सारे अच्छे एक्टर हैं जो अच्छी मिमिकरी करते हैं. देव आनंद, दिलीप कुमार, जॉनी वॉकर का अंदाज़ मुझे बहुत पसंद था, तो कभी-कभी उनकी नक़ल ज़रूर कर लेता था. जब मैं कॉलेज में था तो उस वक़्त देव आनंद बहुत लोकप्रिय थे. तब हम समझते थे कि अगर देव आनंद का एक भी स्टाइल दिखा सके तो कोई न कोई लड़की ज़रूर पट जाएगी. आपने एक इंटरव्यू में अपने पहले किस का दिलचस्प अंदाज़-ए-बयाँ किया था? दरअसल, ये मेरी आत्मकथा के नाटक ‘कुछ भी हो सकता है’ का हिस्सा था. छोटे शहरों की बात ही कुछ और होती है. यानी रोमांस होता था तो आँख मटक्का करते हुए ही 8-9 महीने निकल जाते थे. उंगली छू जाती थी तो बहुत खुश हो जाते थे. फिर शेरो-शायरी होती थी. एक बार उपकार फ़िल्म देख रहे थे. फ़िल्म देखने के दौरान एक लड़की से शायद उंगलियां छू गईं. अगले दिन ही उसका छोटा भाई एक चिट्ठी लेकर आया. उसने कहा कि दीदी ने इसका जवाब मांगा है. तो वो मेरा पहला प्रेम पत्र था. पत्र में लिखा था-मेरे प्यारे अनुपम, जब से तुम्हें देखा है, मेरी रातों की नींद उड़ गई है और दिन का करार चला गया है. फिर मैं अपने दोस्त विजय सहगल के पास गया. हमने पाँच-छह शेरो शायरी की किताबें खंगाली और जवाब लिखा. शेर था, ‘किसी के कान में हीरा, किसी के हार में हीरा, मुझे हीरों से क्या लेना, मेरा महबूब है हीरा.’ आजकल के बच्चों की मासूमियत कहीं खो गई है और वो संघर्ष में जल्दी टूट जाते हैं. और उनमें वो माद्दा नहीं दिखता कि अपनी असफलताओं को सीढ़ी बनाकर आगे बढें? जब भी मैं कहीं लेक्चर देने जाता हूँ तो मेरा पसंदीदा विषय होता है ‘पावर ऑफ फेलियर.’ मुझे लगता है कि असफलता को अगर आप सही तरीक़े से लें तो वह आपको बहुत कुछ सिखा सकती है और आगे की ज़िंदगी को आसान कर सकती है. आपने कई शानदार भूमिकाएं की हैं, लेकिन मेरे ख़्याल सारांश में आपकी भूमिका मील का पत्थर थी. कैसे मिली आपको ये फ़िल्म?
मैं 3-4 साल से मुंबई में भटक रहा था. काम नहीं मिल रहा था. आखिरकार महेश भट्ट साहब को मैंने फ़ोन किया. मुझे अच्छी बात ये लगी कि उन्होंने मुझे नाम से बुलाया. पाँच-छह महीने तक मैं उनसे मिलता रहा. उन्होंने मुझसे कहा कि तुम अच्छे अभिनेता हो और काम मिल जाएगा. मैंने पलटकर कहा कि मैं अच्छा नहीं बेहतरीन अभिनेता हूँ. फिर सारांश आई. उस वक़्त मैं 27 साल का था और मैंने 65 साल के बीबी प्रधान का किरदार निभाया था. मेरी बेवकूफी होती अगर मैं इस भूमिका के लिए मना करता. मुझे लगता है कि मैंने ‘खोसला का घोसला’, ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’, ‘ए वेडनसडे’, ‘डैडी’ में अच्छा काम किया, लेकिन सारांश का जिक्र हर जगह आता है. मुझे लगता है इसकी वजह ये थी कि उस समय मैं नया था और कोई मुझे जानता नहीं था. दरअसल, पहले ये भूमिका संजीव कुमार को करनी थी, लेकिन किन्ही वजहों से मुझे मिल गई. फ़िल्म देखने के बाद संजीव कुमार ने मुझसे कहा कि वह ये रोल इतना अच्छा नहीं कर पाते. जब आपने महेश भट्ट को ये कहा कि मैं अच्छा नहीं, बल्कि बेहतरीन अभिनेता हूँ तो क्या कुछ सोचकर कहा था? दरअसल, मैं ये सुन-सुनकर तंग आ गया था कि अच्छा अभिनेता हूँ और काम ज़रूर मिलेगा, लेकिन काम कोई नहीं दे रहा था. आपकी पसंदीदा फ़िल्में? डैडी, मैंने गांधी को नहीं मारा, खोसला का घोसला, लम्हे. ये कुछ अच्छी फ़िल्में हैं. और अब ए वेडनेसडे मुझे बहुत पसंद है. इसमें मेरी भूमिका पुलिस कमिश्नर की है. मैं चाहता था कि मैं इस फ़िल्म को बिना एक्टिंग के करूँ. मैंने अपना काम मुश्किल कर दिया था. ए वेडनेसडे चार से छह घंटे की कहानी है, जिसे डेढ़ घंटे में दिखाया गया है. अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए आप क़िरदार चुनने के लिए क्या करते हैं? जब आप स्क्रिप्ट पढ़ते हैं और डायरेक्टर से मिलते हैं तो आपको लग जाता है कि ये ख़ास फ़िल्म है. वैसे भी फ़िल्म में अभिनेता की भूमिका सीमित होती है. कुछ फ़िल्मों में ऐसा होता है कि एडिटिंग, म्यूजिक और दूसरी चीजें भी सब ठीक हो जाती हैं. आपका पसंदीदा व्यक्तित्व, जिससे आपने प्रेरणा ली हो? मेरे दादा पंडित अमरनाथ मेरे आदर्श रहे. मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा. उन्होंने मुझे रामायण, गीता सुनाई. मैंने अपनी ज़िंदगी के शुरुआती 18 साल उनके साथ गुजारे. उनका ये कहना था कि ईमानदारी और मेहनत का कोई विकल्प नहीं है. उनका ये कहना था कि आप अगर किसी चीज को दिल से चाहते हैं और उसे पाने के लिए दिल से मेहनत करते हैं तो वो आपको ज़रूर मिलेगी. आपका पसंदीदा अभिनेता, जिससे आप प्रेरित हों? क्योंकि मैंने बकायदा अभिनय का प्रशिक्षण लिया है तो दुनिया भर के अभिनेताओं से मुझे प्रेरणा मिली. जैक लेमन, चैपलिन, जैक निकलसन, गुरुदत्त, बलराज साहनी, दिलीप कुमार मुझे बहुत अच्छे लगते थे. फ़िल्मों में इतने लंबे-लंबे डायलॉग होते हैं, इन्हें याद करने में कितना वक़्त लगता है? मैं डायलॉग में बहुत ज़्यादा समय नहीं लेता. जैसे मेरे प्ले में 137 पन्नों की स्क्रिप्ट है. मैं लाइनों को विजुअल दे देता हूँ, उससे याद करने में आसानी हो जाती है. और डायलॉग जैसे लिखे होते हैं, वैसे ही बोलते हैं कि कुछ बदलते भी हैं? कुछ फ़िल्में हैं जिनमें कुछ नहीं बदला गया, लेकिन कॉमेडी में कुछ बदलाव की गुंजाइश रहती है. कॉमेडी और गंभीर क़िरदार में आपको क्या पसंद है? मुझे कॉमेडी इसलिए पसंद है क्योंकि इससे लोगों को खुशी मिलती है. क्योंकि मेरी कॉमेडी में 99 फ़ीसदी मामलों में अश्लील या डबल मीनिंग डायलॉग नहीं होते. इनके बीच मुझे कई गंभीर क़िरदार भी मिले और मुझे खुशी है कि मैं इन्हें अच्छी तरह से निभा सका. आपके पसंदीदा सह अभिनेता? मैंने आमिर, शाहरुख़ के साथ काम किया है. माधुरी दीक्षित, श्रीदेवी बहुत अच्छी अभिनेत्रियां हैं. दिलीप कुमार और अमिताभ का अपना ही अंदाज़ है, उनके साथ काम करने में मजा आता है. फेवरिट पास टाइम? मुझे पढ़ना बहुत पसंद है. मैं एक्टिंग स्कूल भी चलाता हूँ. मैंने ज़िंदगी में कभी ये नहीं कहा कि मैं बोर हो रहा हूँ. बोर वो होते हैं जो खुद को पसंद नहीं करते. पसंदीदा खाना? मुझे कश्मीरी खाना बहुत पसंद है. एक्टर नहीं होते तो क्या होते? एक ऐसा एक्टर जो काम ढूँढ रहा होता. इसमें कोई शक नहीं कि मैं अभिनेता ही होता. अगले पाँच-दस सालों में आप खुद को कहाँ देखते हैं? ये सवाल तो आप मुझसे तब भी कर सकते हैं जब मैं 99 साल का हो जाँऊगा. मैं तब भी कहूँगा कि मेरे 100 अरमान अब भी रह गए हैं. |
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