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‘अफ़ीम थी ब्रितानी राज की ताकत’ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
प्रसिद्ध भारतीय कथाकार अमिताभ घोष का नया उपन्यास `सी ऑफ़ पॉपीज़' उस समय की कहानी कहता है जब अंग्रेज़ों की देखरेख में भारत से पूरी दुनिया मेंरफ अफ़ीम का व्यवसाय पूरे ज़ोर पर था. ये कहानी तीन महाद्वीपों और करीब दो सदियों में फैली है. घोष की ये किताब तीन उपन्यासों की सिरीज़ की पहली कड़ी है. घोष मानवविज्ञानी और इतिहासकार हैं और उन्होंने ऑक्सफोर्ड से डॉक्ट्रेट की है. ‘सी ऑफ़ पॉपीज़’ एक ऐतिहासिक उपन्यास है. क्या ये उपन्यास इस तथ्य से उपजा है की ब्रितानी दो सदी पहले दुनिया में अफ़ीम के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता थे ? मैं यहाँ आपको ठीक करूँ. ये कोई दो सौ साल पुरानी बात नहीं है. अंग्रेज़ी राज में वर्ष 1920 तक भारत बहुत बड़ी मात्र में अफ़ीम निर्यात करता था. दूसरा, ये कहानी अफ़ीम के धंधे से नहीं पैदा हुई है. मूलतः मेरी रूचि भारतीय गिरमिटीया मजदूरों में थी. खासतौर पर उन मजदूरों में जो बिहार से थे. पर जब मैंने इन पर काम करना शुरू किया तो लगभग हर कहानी अफ़ीम की तरफ़ मुड़ती दिखी. आप इससे भाग नहीं सकते. भारत से गिरमिटीया मजदूरों का जाना शुरू होता है 1830 के दशक में. ये वही समय है जब अफ़ीम का व्यापार अपने चरम पर था. इस दशक का अंत होता है चीन के ख़िलाफ़ अफ़ीम युद्ध से. इसके अलावा सारे बंधुआ मजदूर बनारस और गाज़ीपुर के अफ़ीम पैदा करने वाले क्षेत्रों से थे. दोनों बातें इतना साथ-साथ चलती है कि अफ़ीम से बच नहीं सकते. कैसे और कब आप भारत से होने वाले से अफ़ीम निर्यात के बारे में ये सब इस किताब के साथ ही शुरू हुआ. ज़्यादातर भारतीयों की तरह मुझे भी अफ़ीम के बारे में अधिक पता नहीं था. मुझे इस बात का भान नहीं था कि सदियों तक भारत अफ़ीम का सबसे बड़ा निर्यातक रहा है. मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि दरअसल ये अफ़ीम का पैसा था जो भारत में ब्रितानी राज चलाता था. ये महज एक संयोग नहीं है कि अफ़ीम का धंधा बंद होने के 20 साल के भीतर अंग्रेज़ी राज ने अपनी वापसी कि तैयारी कर ली. इसके बाद भारत में रहना लाभकारी नहीं रह गया था. आपका शोध क्या कहता है कि अफ़ीम का व्यापार कितना बड़ा था ? कुल भारतीय राजस्व में अफ़ीम का हिस्सा सतत रूप से 18-20 फीसदी था. अगर आप इस रूप में देखें कि ये केवल एक उत्पाद था जो कि अर्थव्यवस्था का इतना बड़ा हिस्सा था. ये अविश्वसनीय लगता है... आश्चर्यजनक ! इस आंकड़े में वो मुनाफा शामिल नहीं है है जो अफ़ीम को जहाजों से पहुँचाने में कमाया गया या फिर इससे जुड़े अन्य कई छोटे बड़े सहयोगी धंधों से आया. भारत से चीन को अफ़ीम का निर्यात कब और कैसे शुरू हुआ ? ये विचार सबसे पहले सामने आया 1780 के में जब वॉरेन हेस्टिंग्स गवर्नर जनरल थे. हालत आज से बहुत मिलते जुलते थे. चीन बहुत बड़ी मात्र में निर्यात कर रहा था पर वो यूरोप से कुछ आयात करने में इच्छुक नहीं था. चीन के साथ व्यापार घाटा बढ़ता जा रहा था. तभी हेस्टिंग्स को लगा कि चीन को अफ़ीम निर्यात ही इस व्यापार घाटे को पूरा करने का एक ही रास्ता है. वर्ष 1780 के दशक में चीन को अफ़ीम की पहली खेप भेजी गई. शुरुआत में कुछ खास मांग नहीं थी. पर दस साल के भीतर अफ़ीम कि मांग कई गुना बढ़ गई. उसके बाद 10-30 वर्ष के अरसे में ये व्यापार जिस तरह बढ़ा वो अविश्वसनीय है. जब से अफ़ीम का निर्यात शुरू हुआ तब से लेकर 1809- 1810 तक ज़्यादातर अफ़ीम का उत्पादन बंगाल प्रेसीडेन्सी याने पूर्वी भारत में हुआ. इसके बाद पश्चिमी भारत के मालवा इलाके में अफ़ीम की खेती शुरू हुई. आखिर में पश्चिम भारत में दुगना उत्पादन होने लगा और इस उत्पादन का बड़ी भारी मात्रा में निर्यात हुआ. आपको क्या लगता है पश्चिम भारत के ये बड़े राजघराने किस पैसे पर चल रहे थे. अफ़ीम उत्पादक क्षेत्रों में अफ़ीम ने किस तरह का विध्वंस मचाया? मैं ये तो नहीं कह सकता कि मैं हालत को पूरी तरह से बयान कर सकता हूँ. हम नहीं जानते की ये विध्वंस था कि नहीं. इसके बारे में बहुत ज़्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है. कुछ सुधारक ज़रूर अफ़ीम के व्यापार को रोकने की कोशिश में लगे थे. उनकी कई याचिकाएं और पत्र अभिलेखों में मौजूद हैं. पर हाँ किसानों के लिए काफी समस्याएँ पैदा हो रही थीं क्योंकि वो एक फस्ल उगाने की कृषि की तरफ़ जा रहे थे. जब अफ़ीम की इतनी ज़्यादा खेती हो रही थी तो क्या स्थानीय लोगों को इसकी लत नहीं लग रही थी ? नुकसान तो हुआ था. मुझे नहीं पता था की अफ़ीम लेने के भी अलग अलग तरीके हैं. एक तरीका है कटोरी से अफ़ीम लेने का. ये तरीका भारत में सर्वाधिक प्रचलित है. इसमें लोग अफ़ीम खाते हैं या पानी में घोल कर पीते हैं. पर पूर्वी भारत से शुरु कर के चीन तक लोग अफ़ीम जला कर पीते हैं. ये तरीका बड़ा घातक है. परंपरागत रुप से भारत में लोग अफ़ीमयुक्त धूम्रपान नहीं करते. अफ़ीम सामाजिक जीवन का एक हिस्सा है जो की भिन्न धर्मानुष्ठान में, रिवाजों में इस्तेमाल होती है. ये एक बहुत उलझन भरी तस्वीर है. भारत में जो नुकसान हुआ वो कृषि चक्र को लेकर था पर चीन में ये नुकसान अतुलनीय था. भारत और ब्रितानी इतिहास दोनों ने राज के इस पहलु को नज़रंदाज़ किया ? बिल्कुल. सदियों तक अफ़ीम भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग थी. ये बड़े अचरज की बात है कि मेरे जैसा शख्स जिसने भारतीय इतिहास पढ़ा हो और जो इसे ठीक-ठाक जनाता हो वो इस बारे में पूरी तरह से अनभिज्ञ हो. मुझे लगता है की इस सब को छुपाने की कोशिश की गई है. भारत के पक्ष पर मुझे लगता है की ये एक शर्मनाक बात है. जानकारी की कितनी कमी है. मेरा मतलब है की भारत में कितने लोगों को पता है गाजीपुर अफ़ीम फैक्ट्री आज भी दुनिया सबसे बड़ी अफ़ीम उत्पादक फैक्ट्री है. ये बिना शक दुनिया मैं सबसे बड़ी पूरी तरह से कानूनी अफ़ीम फैक्ट्री है. आपको नहीं लगता की कालचक्र घूम गया है. आज अफ़गानिस्तान दुनिया का सबसे बड़ा अफ़ीम पैदा करने वाला मुल्क है और धनवान पश्चिम उसका सबसे बड़ा खरीददार है?
हाँ ये एक अजीब बात है. पर ये एक ऐसा घटनाक्रम है जिसमे कोई रहत की साँस नहीं ले सकता. अफ़ीम आज भी अर्थव्यवस्थाओं का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है. कम से कम अफगानिस्तान का तो है ही. बर्मा का भी. `सी ऑफ़ पॉपीज़' ब्रितानी साम्राज्यवाद की तीखी आलोचना करती है. आपको लगता है की भारत में साम्राज्यवाद आसानी से छूट गया मतलब इसके शासन के दुष्परिणाम क्या हुए ये पता लगाने की ज़्यादा कोशिश नहीं हुई? ये एक बड़ी विडंबना है. अंग्रेज़ों के आने से पहले भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे बड़ी था. दो सौ साल में भारत लाड़खड़ाया, फिसला और और समझ लीजिये कुछ नहीं बचा. उनके जाने के 50 साल बाद आखिरकार हमने अपनी खोई हुई जगह वापस पाने की कोशिश शुरू की है. सारे तथ्य ये कहते हैं की ब्रितानी राज भारत के लिए विनाशकारी साबित हुआ. ब्रितानी लोगों के आने के पहले दुनिया का 25 प्रतिशत व्यापार भारत से शुरू होता था. और जब वो गए हैं तब ये हिस्सा घट कर केवल एक प्रतिशत रह गया. कई लोग ये सोचते हैं की ब्रितानी हुकूमत ने भारत को कई बड़ी व्यवस्थायें दीं, मसलन पुलिस, नौकरशाही.. जब लोग विदेशी शासकों द्वारा आधुनिक संस्थाएँ बनने की बात करते हैं तब मुझे समझ नहीं आता की ये क्या सोच कर कहते हैं. क्या उपनिवेश बनने के पहले भारत में पुलिस नहीं थी. दरोगा होते थे, पुलिस चौकियां होती थीं. दरअसल अंग्रेज़ों ने चौकी शब्द ही भारत से लिया है. ऐसा कहना एकदम बेतुका है. | इससे जुड़ी ख़बरें नाटककार विजय तेंदुलकर का निधन19 मई, 2008 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'कहानी कहने का फ़न आना चाहिए'18 मई, 2008 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'नॉयपाल लोगों को उकसाना पसंद करते हैं'17 अप्रैल, 2008 | मनोरंजन एक्सप्रेस पथर कटवा19 अक्तूबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस ‘तनी हुई रस्सी’ का एक अंश12 अक्तूबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस अम्मा से वह आख़िरी मुलाक़ात22 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'प्रामाणिक रुप से लिखने वाला क्रांतिकारी कथाकार'10 मई, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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