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'नॉयपाल लोगों को उकसाना पसंद करते हैं' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नोबल पुरस्कार विजेता साहित्यकार सर विद्या नॉयपाल की जीवनी ने इन दिनों हलचल मचा रखी है. इसे लिखा है ब्रिटिश इतिहासकार पैट्रिक फ्रेंच ने. इस किताब का नाम है 'द वर्ल्ड इज़ व्हाट इट इज़.' सर विद्या नॉयपाल त्रिनिदाद के मूल निवासी हैं. पैट्रिक फ्रेंच ने अपनी किताब में नॉयपाल के जीवन के विभिन्न पहलुओं का बारीक विश्लेषण किया है. इस किताब के बारे में पैट्रिक फ्रेंच से हुई बातचीत के अंश. दुनिया के सबसे विवादास्पद लेखक की जीवनी लिखना कितना कठिन था? जीवनी लेखक हिलेरी स्प्रलिंग ने कहा कि इस तरह की क़िताब लिखने के लिए उन्हें 'फौलादी धीरज' की ज़रूरत होगी. मुझे लगता है कि उनकी यह बात सही थी. यह कभी आसान काम नहीं था लेकिन वीएस नायपॉल ने मेरे काम और शोध में काफ़ी सहायता की. वह इस मामले में हमेशा गंभीर दिखे. नायपॉल के बारे में एक लेखक ने लिखा है वे पल में नरम, पल में गरम हो जाते हैं, क्या उनसे बातचीत करते हुए आपको भी ऐसा लगा? बिल्कुल नहीं, मैं उनसे सीधे सीधे बात कर रहे थे और वह भी बिल्कुल सीधा जवाब दे रहे थे. मैं जब उनसे असहमत होता था तो कभी-कभी वे नाराज़ हो जाते थे, लेकिन यह उनकी अदा है. नायपॉल ने कहा था कि वह आपकी किताब पढ़ने को उत्सुक नहीं है. लेकिन आप कह रहे हैं कि उन्होंने किताब की पांडुलिपि पढ़ी थी और उसमें किसी तरह का कोई बदलाव नहीं सुझाया था. आख़िर सच क्या है ? मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि वह मेरी किताब को पढ़ेंगे. हमारे बीच हुए समझौते के अनुसार उन्होंने किताब की पांडुलिपि देखी थी. जिसके बाद उन्होंने किसी तरह के परिवर्तन की सलाह नहीं दी थी. एक बार उन्होंने कहा था कि सच्चाई को कभी कम करके नहीं दिखाना चाहिए, ख़ास तौर पर किसी की जीवनी में. जब मुस्लिम जगत की बात आती है तो नायपाल एक अतिवादी रवैया अपनाते हैं. एडवर्ड सईद ने तो उन्हें "वैचारिक विनाश" कहा है. क्या आप यह मानते है कि नायपॉल लोगों को उकसाते हैं- आप कह सकते हैं कि वे विवाद पैदा करते हैं, अपने दोस्तों का अपमान करते हैं, परिवार या पूरे समुदाय को बुरा भला कहते हैं, ऐसे में उनकी असली भावना क्या होती है? लोगों को उनकी बातें सुनने की जगह किताब को पढ़ना चाहिए. वीएस नायपॉल लोगों को उकसाना पसंद करते हैं, कुछ हद तक अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के तहत और कुछ हद तक मनोरंजन और प्रतिक्रिया के लिए. सईद के बारे में उन्होंने कहा, "वह मिस्र का एक आदमी है जो दुनिया में खो गया है और वह उन मामलों में भी दखल देने लगा है जिनके बारे में वह कुछ नहीं जानता है. उसे साहित्य की बहुत कम जानकारी है हालाँकि अमरीका में उन्हें साहित्यिक हस्ती मान लिया गया है. वह भारत और इंडोनेशिया के बारे में कुछ नहीं जानता है. वह तेहरान भी नहीं गया है. उसने वहां की क्रांति भी नहीं देखी है". बातचीत के दौरान कभी आपको लगा कि भारत के प्रति उनकी राय बदल गई है? क्या वे अब भी भारत को शंकालु नज़रों से देखते हैं? मैंने अपनी किताब में दिखाया है कि 1962 में भारत यात्रा के बाद भारत के प्रति उनकी राय काफ़ी हद तक बदल गई. आजकल वे आशावादी बन गए हैं. बहुत लोगों की तरह वे भी भारत के इतिहास में अपमानजनक बातें देखते हैं. क्या आपको कभी लगा कि वे उम्र के साथ-साथ थोड़े नरम हो गए हैं ? मुझे यह कहते हुए खुशी हो रही है कि वे क़तई नरम नहीं पड़े हैं. जैसा दिखता है कि नॉयपाल ने महिलाओं के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया, क्या वे नारीविरोधी हैं या उससे भी कहीं अधिक जटिल कुछ और है? यह इससे कहीं अधिक जटिल और दिलचस्प बात है. उनकी दादी, उनकी माँ उनकी दो पत्नियां और उनकी प्रेमिका, उनके लिए बहुत ज़रूरी हैं, जिस किस्म का इंसान वह बनना चाहते हैं या किताबें लिखना चाहते हैं उसमें उनकी बड़ी भूमिका है. इस किताब को लिखने में जिन लोगों ने सहायता की उनसे बातचीत के बाद क्या आपको ऐसा लगा कि नायपॉल का कोई दोस्त नहीं है. वह एक नितांत अकेले व्यक्ति हैं ? नहीं, व्यक्तिगत तौर पर वे मजेदार आदमी हैं. लेकिन अपनी किताब में उन्हें ऐसा व्यक्ति बताया है जिसकी किसी के प्रति कोई वफ़ादारी नहीं. नायपॉल एक मामूली परिवार से आते हैं. एक तरह से उनकी कहानी एक प्रवासी की सफलता की कहानी है. उनके अंदर कोई दुविधा नहीं है, वे लोगों, धर्मों और मान्यताओं के बारे में इतनी क्रूर वैचारिक स्पष्टता कहाँ से लाए हैं? यह सही है. वह ब्रिटेन के अप्रवासी लेखकों में सबसे सफल लेखक हैं. उनके अंदर बौद्धिक स्पष्टता त्रिनिनाद से ही आई है. उनके पिता के रवैये, उनकी माँ के शक्तिशाली और विस्तृत परिवार से और पोर्ट ऑफ़ स्पेन के क्वींस रॉयल कॉलेज़ में मिली औपनिवेशिक शिक्षा से. क्या यहाँ कोई ऐसी जगह है जिसे नायपॉल अपना घर कहते हैं ? विल्टशर स्थित उनका घर. आपने इस किताब के लिए शोध करने और लिखने में कितना समय लगाया. क्या इस दौरान नायपॉल आपके लिए उपल्बध थे ? किताब को पूरा करने में पाँच साल का समय लगा. इस तरह की किताब लिखने में इससे कम समय नहीं लगेगा. इस दौरान वह सामान्यतया उपलब्ध रहते थे. वह हमेशा विनम्र बने रहे. वह हमेशा तय समय पर आए, कभी लेट नहीं हुए. आपकी अगली योजना क्या है ? भारत के बारे में और अधिक लिखना. | इससे जुड़ी ख़बरें कादरे को अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार03 जून, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस सद्दाम को 'फाँसी की सज़ा' का मंचन14 नवंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'विश्व हिंदी सम्मेलन के उद्देश्य ही संदिग्ध हैं'11 जुलाई, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस नाटककार हैरल्ड पिंटर को नोबेल सम्मान13 अक्तूबर, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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