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चेतन की नज़र में युवा भारत.... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत का युवा अब 'रिस्क' लेने से नहीं घबराता और हर वो काम करना चाहता है जिसमें 'रिस्क' अधिक हो और फ़ायदा भी. ये कहना है भारत के युवा वर्ग से जुड़े मसलों पर रोचक पुस्तकें लिखने वाले जाने-माने लेखक चेतन भगत का. चेतन की नई पुस्तक ‘थ्री मिस्टेक्स ऑफ़ माई लाइफ़’ अब बाज़ार में आ गई है और ये पुस्तक छोटे शहरों के युवाओं को केंद्रित कर लिखी गई है. चेतन की पहली पुस्तक ‘फ़ाइव प्वाइंट समवन’ भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी आईआईटी के छात्रों के बारे में थी और दूसरी पुस्तक ‘वन नाइट @ कॉल सेंटर’ भारत में बढ़ते कॉल सेंटरों पर थी. ये दोनों पुस्तकें भारत में और कई अन्य देशों में इतनी बिकी हैं कि अमरीका के प्रतिष्ठित अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स ने चेतन भगत को ‘भारतीय इतिहास में सबसे अधिक बिकने वाला अंग्रेज़ी उपन्यासकार’ क़रार दिया है. ‘फाइव प्वाइंट समवन’ 2004 में और ‘वन नाइट’ 2007 में प्रकाशित हुई और अब तक दोनों क़िताबों की दस लाख प्रतियां बिक चुकी हैं, जो भारतीय बाज़ार में एक रिकार्ड है. छोटे शहरों का नया भारत अपनी नई पुस्तक ‘थ्री मिस्टेक्स ऑफ़ माई लाइफ़’ के बारे में चेतन कहते हैं, ‘ये किताब धर्म, क्रिकेट, दोस्ती और राजनीति सब चीज़ों को जोड़कर लिखी गई है. ये कहानी अहमदाबाद के तीन दोस्तों की है जो क्रिकेट का सामान बेचने वाली दुकान खोलते हैं....लेकिन फिर जो होता है वो लोगों के पढ़ने के लिए है.’ गुजरात में पिछले कुछ वर्षों में दंगे हुए हैं और कुछ नए क्रिकेटर भी भारतीय टीम में शामिल हुए हैं, तो क्या असली घटनाओं से प्रेरित है चेतन की कहानी. चेतन कहते हैं, "घटनाएं असली हैं लेकिन मेरे चरित्र काल्पनिक हैं क्योंकि मैंने उपन्यास लिखा है, ये कोई डॉक्यूमेंट्री नहीं है. इसलिए लोगों को इसे पढ़ने में मज़ा आएगा." भारतीय युवा वर्ग के बारे में चेतन मुस्कुराते हुए कहते हैं, "आज का युवा बहुत रिस्क लेता है. हमारे माता-पिता सरकारी नौकरियां चाहते थे...कम रिस्क...लेकिन आज का युवा डरता नहीं है. वो आगे बढ़ना चाहता है. उनके सपने अलग हैं, वो ग़लतियाँ करने से घबराते नहीं हैं." चेतन कहते हैं कि भारत में मौके कम हैं और करियर की शुरुआत में ग़लतियों को माफ़ नहीं किया जाता. लेकिन क्या ये सही है ? ये पूछे जाने पर कि भारत का युवा वर्ग अन्य देशों से कैसे अलग है, "वो कहते हैं कि भारत का युवा चाहे जींस पहने, बरगर खाए और अंग्रेज़ी बोले लेकिन वो अंदर से भारतीय होता है. वो विदेश जाता है मजबूरी में महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने. लेकिन मौक़ा मिलते ही वो वापस भी आ जाता है." चेतन खुद भी हांगकांग में कई साल रहे लेकिन अब वापस भारत आ गए हैं और यहीं रहना चाहते हैं. नए युवा वर्ग पर आने वाले दबावों के बारे में वो कहते हैं कि हर पीढ़ी के सामने चुनौतियाँ होती हैं और ऐसा नहीं है कि युवा वर्ग बिगड़ा हुआ है. चेतन बताते हैं, "मेरे पास एक ईमेल आया था जिसमें किसी ने लिखा था कि भारत में महत्वाकांक्षाएं अधिक हैं और मौके कम. हमें कोशिश करनी चाहिए कि युवाओं को और मौका मिले और अगर ऐसा हुआ तो भारत को आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकेगा." वो मानते हैं कि भारत बड़े शहरों में नहीं बल्कि छोटे शहरों में बसता है और इन इलाक़ो में रहने वालों के भी सपने होते हैं. शायद यही कारण है कि उनकी नई किताब छोटे शहर पर लिखी गई है. आलोचना का जवाब चेतन की किताबों की आलोचना भी हुई है और कई आलोचकों ने यहां तक कहा कि उनकी अंग्रेज़ी अच्छी नहीं है और वो भारत को समझते नहीं हैं. इस बारे में चेतन मुस्कुराते हैं, वो कहते हैं, "अब मैं क्या कहूं, जैसे मुझे सलमान रुश्दी पसंद हैं लेकिन हर आदमी उनकीं अंग्रेज़ी नहीं समझ सकता." "मेरी क़िताबें भारत में कई दूसरे अंग्रेज़ी लेखकों की क़िताबों से अधिक बिकती हैं. हर आदमी गंभीर किताब नहीं लिखता. मैं जो लिखता हूं वो आम लोगों की बात होती है और शायद इसीलिए लोग उसे पढ़ते हैं."
चेतन कहते हैं कि उनके लिए ये सबसे बड़ी उपलब्धि है कि भारत के लोगों ने उनको हाथों-हाथ लिया है और यह प्यार उनके लिए किसी आलोचक की टिप्पणी से बेहतर है. चेतन की दोनों पहली किताबों पर फ़िल्में बन रही हैं. कॉल सेंटर पर बन रही फिल्म ‘हैलो’ तैयार है. चेतन को उम्मीद है कि उनकी नई क़िताब पर भी फ़िल्म बनेगी. ‘थ्री मिस्टेक्स ऑफ़ माई लाइफ़’ यानी मेरे जीवन की तीन ग़लतियां, जब चेतन से मैंने पूछा कु उनके जीवन की जीवन की तीन गलतियाँ कौन सी हैं तो उनका जवाब था, “ग़लतियां तो बहुत की हैं. पूरी क़िताब लिखनी पड़ जाएगी.” हाल की तीन ग़लतियां पहला मैंने क़िताब लिखते-लिखते वज़न पर ध्यान नहीं दिया तो मोटा हो गया. दूसरा आईआईटी में मेरे पास साहित्य पढ़ने का विकल्प था, मुझे साहित्य अच्छा भी लगता है लेकिन मैंने उस समय इसका कोई कोर्स नहीं किया. तीसरा ‘हैलो’ फ़िल्म में मुझे एक रोल मिल रहा था. मैंने शर्म के मारे रोल नहीं किया. अब फ़िल्म बन गई है और मैंने देखी तो मुझे लगा कि रोल कर लेना चाहिए था. युवा वर्ग के लिए चेतन का बस एक संदेश है - "ग़लतियां करने से मत घबराओ क्योंकि ग़लतियाँ नहीं करेंगे तो आप सीखेंगे कैसे." |
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