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शनिवार, 20 अगस्त, 2005 को 01:19 GMT तक के समाचार
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पाकिस्तानी किताबों पर अमरीका की चिंता
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पाकिस्तानी धार्मिक दलों ने अमरीकी चिंता को बेबुनियाद बताया है
अमरीका ने पाकिस्तान में पाठ्य पुस्तकों में ईसाइयों और यहूदियों के ख़िलाफ़ सामग्री होने पर गंभीर चिंता व्यक्त की है.

अमरीकी विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने शॉन मैककॉरमैक ने पत्रकारों को बताया कि पाकिस्तान सरकार को अमरीका की चिंताओं से अवगत करा दिया गया है.

उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी पाठ्य पुस्तकों की भाषा लोगों को हिंसा के लिए प्रेरित कर सकती है जो कि अमरीका को स्वीकार्य नहीं है.

उन्होंने कहा कि मार्च महीने में अमरीका यात्रा के दौरान पाकिस्तानी शिक्षा मंत्री जावेद अशरफ़ क़ाज़ी को अमरीका सरकार की चिंताओं से अवगत कराया गया था.

चरमपंथियों के ख़िलाफ़ पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के रवैये का ज़िक्र करते हुए मैककॉरमैक ने कहा, "हम समझते हैं कि पाकिस्तान सरकार ने किताबों की समीक्षा करा रही है."

लेकिन कराची से बीबीसी संवाददाता आमिर अहमद ख़ान के अनुसार सरकार के पाठ्यक्रमों की दो-दो बार समीक्षा कराए जाने के बावजूद एक प्रतिष्ठिति ग़ैरसरकारी संस्था ने कहा है कि स्थिति में कोई उल्लेखनीय बदलाव देखने को नहीं मिला है.

दो-दो समीक्षाएँ

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने मार्च 2002 में पहली बार पाठ्य पुस्तकों की समीक्षा का आदेश दिया था.

लेकिन शिक्षा मंत्रालय की एक समिति ने समीक्षा के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा कि पाठ्यक्रम में किसी बदलाव की ज़रूरत नहीं है.

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स्कूलों से सामाजिक अध्ययन की किताबें हटाई जा चुकी हैं

इसे देखते हुए पाकिस्तान की सबसे सम्मानित ग़ैरसरकारी संस्था सतत विकास योजना संस्थान (एसडीपीआई) ने पाठ्यक्रम की स्वतंत्र समीक्षा कराने का फ़ैसला किया.

एसडीपीआई द्वारा कराई गई समीक्षा में कहा गया कि पाठ्य पुस्तकों में झूठ के अलावा तथ्यों में तोड़मरोड़ के अनेकों उदाहरण मौजूद हैं.

इस स्वतंत्र समीक्षा में यह भी पाया गया पाठ्य पुस्तकें महिलाओं और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ भेदभाव को बढ़ावा देती हैं.

एसडीपीआई ने स्कूली किताबों में उग्रवाद और हिंसो को बढ़ावा देने वाली सामग्री होने की भी बात की.

इसके बाद पाकिस्तान सरकार ने पिछले साल पाठ्य पुस्तकों की नए सिरे से समीक्षा का आदेश दिया. इसमें जेहाद के ज़िक्र को हटाने की अनुशंसा की गई. इस समिति ने सामाजिक अध्ययन को पाठ्यक्रम से हटाने की भी सिफ़ारिश की.

लेकिन इन अनुशंसाओं के कार्यान्वयन के बावजूद एसडीपीआई का कहना है कि पाठ्य पुस्तकों में विसंगतियाँ ज्यों-की-त्यों कायम है.

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