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'मैं तो बेकसी का मज़ार हूँ....' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली के आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र ने एक शेर में लिखा था: पए फ़ातिहा कोई आए क्यों, कोई चार फूल चढ़ाए क्यों यंगून यानी रंगून में बहादुरशाह ज़फ़र की जो मज़ार तहख़ाने के अंदर है उसकी दीवारों पर ये शेर अंकित है जिस से ये ज़ाहिर होता है कि बहादुरशाह को विदेश में मरने का काफ़ी ग़म था. इसी संदर्भ में उनका वह शेर भी काफ़ी लोकप्रिय है जिसमें उन्होंने कहा था कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए लेकिन इस सच्चाई के बावजूद बहादुरशाह ज़फ़र की मज़ार पर काफ़ी रौनक़ रहती है और किसी भी दूसरे मुग़ल बादशाह के मज़ार से अधिक ज़फ़र के मज़ार को आदर और सम्मान हासिल है. रंगून में बहादुरशाह ज़फ़र के मज़ार के ट्रस्टी यानी प्रबंधक कमेटी के एक सदस्य और म्यांमार इस्लामिक सेंटर के मुख्य कंवेनर अलहाज यूआई लुइन पिछले दिनों भारत के दौरे पर थे उनका कहना था कि आख़िरी मुग़ल शासक बहादुरशाह ज़फ़र का स्थान बर्तानवी सरकार के ख़िलाफ़ लड़ने वाले एक योद्धा और आख़िरी मुग़ल शासक की तो है ही लेकिन एक सूफ़ी संत के तौर पर लोगों की उनमें श्रृद्धा काफ़ी ज़्यादा है. 1857 के भारत के पहले स्वतंत्रता आंदोलन में हारने के बाद बहादुरशाह ज़फ़र को बंदी बना कर बर्मा की राजधानी रंगून भेज दिया गया था. आई लुइन ने बहादुरशाह ज़फ़र के क़ैद के ज़माने के अंग्रेज़ गार्ड कैप्टेन डेविस का हवाला देते हुए कहा कि उनको लकड़ी के एक मकान में रखा गया था जहाँ उन्हें काग़ज़ और क़लम देने की सख़्त मनाही थी. उन्होंने कहा वह मकान वास्तव में अस्तबल था जिसे बादशाह के लिए थोड़ा ठीक कर दिया गया था. आय लुइन ने यह भी बताया कि बर्मा के क्षेत्रीय लोगों को बादशाह से मिलने कि इजाज़त नहीं थी क्योंकि भारत में अंग्रेज़ों के विरुद्ध तो विद्रोह चल ही रहा था साथ में बर्मा भी अंग्रेज़ों के क़ब्ज़े में पूरी तरह नहीं आया था. 1885 ई. में ही तीसरी ऐंग्लो-बर्मा युद्ध के बाद ही अंग्रेज़ों ने पूरे बर्मा पर अधिपत्य जमाया. उन्होंने यह भी बताया कि उसी साल बहादुरशाह ज़फ़र की पत्नी बेगम ज़ीनत महल का देहांत हुआ और कॉन्ग बांग वंश के राजा थीबा को जलावतन करके भारत के रत्नागीरी भेज दिया गया जहां आज तक उनकी स्मृति है.
ज़फ़र का उर्स हर वर्ष नवम्बर के महीने में बहादुरशाह ज़फ़र के उर्स का जश्न तीन से चार दिनों तक मनाया जाता है और उनके मज़ार पर ज़बरदस्त रौनक़ देखने को मिलती है. लुइन ने यह भी बताया कि वे लोग ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती जिनकी दरगाह अजमेर में है उनका उर्स भी साथ ही में मनाते हैं यानी वे दो उर्स को एक साथ मिला देते हैं. वे ऐसा इसलिए करते हैं कि बहादुरशाह ज़फ़र को चिश्तिया सिलसिले में 25 वर्ष की आयु में शामिल कर लिया गया था और 40 वर्ष की उम्र में उन्हें चिश्तिया सिलसिले का ख़लीफ़ा भी बना दिया गया था. उनका मानना है कि आज भी बहादुरशाह ज़फ़र के सिलसिले के बहुत से मुरीद दुनिया भर में फैले हुए हैं. लुइन ने यह भी बताया कि जब रमज़ान का पवित्र महीना नवंबर में आ जाता है तो वे उर्स की तारीख़ में फेर बदल कर देते हैं. उन्होंने यह भी बताया कि हर वर्ष उर्स के मौक़े से भारत सरकार अजमेर में स्थित ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह से चादर भेजवाती है. भारत के इस क़दम को बर्मा के लोग और सरकार दोनों आदर से देखते हैं. उन्होंने यह भी बताया कि भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश से आने वाले सरकारी पदाधिकारी और आम लोग यंगून आने पर बहादुरशाह ज़फ़र के मज़ार की ज़ियारत को ज़रूर आते हैं.
इस संदर्भ में उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के दौरे का ख़ास तौर से ज़िक्र करते हुए बताया कि उन्होंने बहादुरशाह ज़फ़र के मज़ार के पुनर्निर्माण के लिए 50 हज़ार डालर की राशि देने की घोषणा की लेकिन यह रक़म भारत-पाकिस्तान में जारी कश्मकश के नतीजे में नहीं ली जा सकी क्यों कि भारत ऐसा नहीं चाहता था. आय लुइन ने यह भी बताया कि पीतल की पलेट पर लिखी हुई यह घोषणा उनके यहाँ है और भारत-पाक के सुधरते रिश्ते के कारण अब इस रक़म को इस्तेमाल में लाने में भारत को कोई एतराज़ भी नहीं है. आय लुइन ने यह भी बताया कि मज़ार को दान की कोई कमी नहीं है और उन्हें किसी तरह की भी मरम्मत के लिए किसी प्रकार की सरकारी राशि की ज़रूरत नहीं पड़ती है. “हमें जितनी ज़रूरत होती है उतना श्रद्धालुओं से ही मिल जाता है और मरम्मत या रिनोवेशन का कोई काम हो हम ख़ुद ही करवा लेते हैं”. असली मज़ार बहादुरशाह ज़फ़र की मज़ार की पूरी जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि उसमें कुल चार क़ब्रें हैं एक ओर बहादुर शाह ज़फ़र की पत्नी ज़ीनत महल की मज़ार है बीच में बहादुरशाह ज़फ़र की कथित मज़ार है और दूसरी ओर उनकी पोती और ताजदार शाहज़ादी रौनक़ ज़मानी की क़ब्र है जिनका देहांत 1930 ईस्वी में हुआ था और वही बहादुरशाह ज़फ़र के मज़ार की पहली ट्रस्टी थीं. मज़ार को घेरने के लिए उन्होंने ब्रिटिश सरकार से इजाज़त चाही और यह मामला प्रीवी कॉउंसिल तक गया और फिर उन्हें इजाज़त मिली. आय लुइन ने कहा कि 1991 ई. में जब बहादुरशाह ज़फ़र के मज़ार के एक हिस्से की मरम्मत के लिए खुदाई की जा रही थी तो एक क़ब्र मिली जिसके बारे में स्पष्ट तौर से न सही लेकिन सारे लोगों ने यह मान लिया कि बहादुरशाह ज़फ़र की असली क़ब्र यही है. इसके कई कारण हैं. उन्होंने बताया कि हालांकि हालांकि बहादुरशाह ज़फ़र को मुसलमानों के रीति रिवाज के अनुसार दफ़नाया गया लेकिन अंग्रेज़ों ने जानबूझ कर यह कोशिश की कि उनके क़ब्र का कोई निशान न रहे. उनकी क़ब्र को ज़मीन के बराबर कर दिया गया और बांस का ऐक बाड़ा लगा दिया गया जो दो एक साल में ख़त्म हो गया. लोगों को सिर्फ़ यह याद रहा कि एक पेड़ के नज़दीक बहादुरशाह ज़फ़र को दफ़नाया गया था और बाद में मज़ार बनाई गई और फिर जब उनकी पत्नी ज़ीनत महल की मृत्यु हुई तो अनुमान के अनुसार उन्हें बहादुरशाह ज़फ़र की क़ब्र के साथ दफ़्न कर दिया गया और फिर रौनक़ ज़मानी को भी उन्हीं के साथ दफ़्न किया गया. | इससे जुड़ी ख़बरें सदभावना का संदेश देती दरगाह12 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'न किसी की आँख का नूर हूँ...'11 मई, 2007 | भारत और पड़ोस 1857 की कहानी, ग़ालिब की ज़बानी20 मई, 2007 | भारत और पड़ोस एक इतिहास आम भारतीयों के लिए15 नवंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'बहुत कठिन है डगर पनघट की...'30 मार्च, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस बुल्ले शाह के उर्स में भारतीय दल26 अगस्त, 2004 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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