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बुल्ले शाह के उर्स में भारतीय दल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मशहूर पंजाबी सूफ़ी शायर बुल्ले शाह के उर्स में शिरकत करने के लिए भारत से 20 सदस्यों वाला एक दल पाकिस्तान पहुँचा है. दल ने गुरूवार को वाघा सीमा चौकी के ज़रिए पाकिस्तानी सीमा में प्रवेश किया. बुल्ले शाह की बरसी के मौक़े पर तीन दिन का यह उर्स लाहौर से क़रीब पचास किलोमीटर दूर कसूर शहर में होगा. पिछले क़रीब पचास साल में यह पहला मौक़ा है कि बुल्ले शाह के उर्स में भाग लेने के लिए किसी भारतीय दल को इजाज़त दी गई है. इस दल की नेता प्रसिद्ध गाँधीवादी निर्मला देशपांडे हैं. राज्य सभा सदस्य देशपांडे ने वाघा सीमा पर पत्रकारों से बातचीत में कहा कि 80 लोगों ने इस दल में जाने के लिए वीज़ा की अर्ज़ी दी थी जिसमें से सिर्फ़ 25 लोगों को ही वीज़ा मिला है. उन्होंने बताया कि बाक़ी अर्ज़ियों को ख़ारिज नहीं किया गया है बल्कि उन पर कोई फ़ैसला ही नहीं किया गया है. निर्मला देशपांडे ने एक सवाल के जवाब में कहा, "दोनों देशों में एक ही तरह के हालात हैं इसलिए हम कोई शिकायत दर्ज नहीं कराने वाले हैं." धार्मिक सौहार्द बुल्ले शाह एक ऐसे संत और शायर थे जिन्हें पंजाबी सूफ़ी परंपरा में बहुत लोकप्रिय मुक़ाम हासिल है. बुल्ले शाह ने यह क्रांतिकारी नारा दिया कि इनसान ही ख़ुदा का रूप है. यह शेर देखिए - इस का मतलब है कि आदम से हव्वा का जन्म हुआ तो फिर आदम का जन्म किस तरह हुआ? इसके जवाब में बुल्ले शाह तीसरी पंक्ति में यही कहते हैं कि ख़ुद अल्लाह ही आदम के रूप में आया. बुल्लेशाह ने धार्मिक भेदभाव और कट्टरपंथ का प्रबल विरोध किया जिसके लिए उन्हें तत्कालीन मुग़ल शासक औरंगज़ेब का कोपभाजन भी बनना पड़ा. उनका कहना था कि तमाम मज़हबों का मक़सद एक ही है और मज़हब के आधार पर ख़ुदा को अलग-अलग नज़र से देखना ठीक नहीं है. बुल्ले शाह के सूफ़ी कलाम भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों में बहुत लोकप्रिय हैं. |
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