|
'न किसी की आँख का नूर हूँ...' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ 1857 के विद्रोह का नेतृत्व करने वाले आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र की शायरी में एक अजीब तरह का दर्द छिपा हुआ है. विद्रोह और फिर उनके रंगून में निर्वासित होने के बाद ये ग़म और भी स्पष्ट तौर पर उनकी शायरी में नज़र आता है. मुग़ल सल्तनत के आख़िरी ताजदार बहादुर शाह ज़फ़र ने अपनी एक ग़ज़ल में कहा था: या मुझे अफ़सरे-शाहाना बनाया होता यानी मुझे बहुत बड़ा हाकिम बनाया होता या फिर मुझे सूफ़ी बनाया होता, अपना दीवाना बनाया होता लेकिन बुद्धिजीवी न बनाया होता. भारत के पहले स्वतंत्रता आंदोलन के 150 साल पूरे होने पर जहाँ बग़ावत के नारे और शहीदों के लहू की बात होती है वहीं दिल्ली के उजड़ने और एक तहज़ीब के ख़त्म होने की आहट भी सुनाई देती है. ऐसे में एक शायराना मिज़ाज रखने वाले शायर के दिल पर क्या गुज़री होगी जिस का सब कुछ ख़त्म हो गया हो. बहादुर शाह ज़फ़र ने अपने मरने को जीते जी देखा और किसी ने उन्हीं की शैली में उनके लिए यह शेर लिखा: न दबाया ज़ेरे-ज़मीं उन्हें, न दिया किसी ने कफ़न उन्हें अपनी बर्बादी के साथ-साथ बहादुर शाह ज़फ़र ने दिल्ली के उजड़ने को भी बयान किया है. पहले उनकी एक ग़ज़ल देखें जिसमें उन्होंने उर्दू शायरी के मिज़ाज में ढली हुई अपनी बर्बादी की दास्तान लिखी है: न किसी की आँख का नूर हूँ, न किसी के दिल का क़रार हूँ बहादुर शाह ज़फ़र ने अपनी एक और ग़ज़ल में अपने हालात को इस तरह पेश किया है: पसे-मर्ग मेरे मज़ार पर जो दिया किसी ने जला दिया दिल्ली के हालात को दर्शाते हुए उनके कुछ शेर इस प्रकार हैं: नहीं हाले-दिल्ली सुनाने के क़ाबिल एक और ग़ज़ल में लिखते हैं: न था शहर देहली, ये था चमन, कहो किस तरह का था यां अमन एक और ग़ज़ल में लिखते हैं: क्या ख़िज़ां आई चमन में हर शजर जाता रहा सुफ़ियाना और देसी रंग में डूबी हुई उनकी मनोस्थिति और हालात को दिखलाती हुई एक ग़ज़ल है: कौन नगर में आए हम कौन नगर में बासे हैं दिल्ली से अपने विदा होने को बहादुर शाह ज़फ़र ने इन शब्दों में बांधा है: जलाया यार ने ऐसा कि हम वतन से चले निर्वासन के दौरान बहादुर शाह ज़फ़र के हालात को दर्शाती उनकी इस मशहूर ग़ज़ल के बिना कोई बात पूरी नहीं होगी: लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में | इससे जुड़ी ख़बरें 1857: हिंदुस्तान का ख़याल, धर्म का असर09 मई, 2007 | भारत और पड़ोस विद्रोह में लोक साहित्य की अहम भूमिका09 मई, 2007 | भारत और पड़ोस नहीं दिखता है आम भारतीय का इतिहास09 मई, 2007 | भारत और पड़ोस पहले विद्रोह पर दक्षिण की दावेदारी09 मई, 2007 | भारत और पड़ोस 1857: 19वीं सदी का सबसे बड़ा विद्रोह09 मई, 2007 | भारत और पड़ोस 'आर्थिक कारणों से भी भड़का विद्रोह'09 मई, 2007 | भारत और पड़ोस 'टाला जा सकता था 1857 का विद्रोह'09 मई, 2007 | भारत और पड़ोस 1857 के संघर्ष में महिलाओं की भूमिका09 मई, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||