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'सफलता का क्या है..आज है कल नहीं' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बॉलीवुड में इस साल अभिषेक बच्चन ने गुरु में सफलता का स्वाद चखा तो 'झूम बराबर झूम' बुरी तरह पिटी. सलमान खान 'पार्टनर' में चले तो 'मैरीगोल्ड' फ़्लॉप रही. सैफ़ अली खान की 'तारा रम पम' भी ख़ास नहीं कर पाई. ऐसे में अक्षय कुमार का रिकॉर्ड इस साल लगभग 100 फ़ीसदी रहा है- नमस्ते लंदन और हे बेबी दोनों हिट रहीं. सिर्फ़ किंग खान यानी शाहरुख़ को ही इस साल इतनी सफलता मिली है. अक्षय कुमार इनदिनों कनाडा में अपनी फ़िल्म की शूटिंग कर रहे हैं. बीबीसी ने उनसे विशेष बातचीत की. इस साल आपकी फ़िल्म आई ‘नमस्ते लंदन’ जो हिट रही, फिर ‘हे बेबी’ आई जो कामयाब रही, अब आपकी नई फ़िल्म आ रही है ‘भूल भुलैया’. तो क्या आप हैट्रिक की तैयारी में हैं? हैट्रिक हो या नहीं हो, मुझे नहीं पता लेकिन मेरा मकसद यही है कि मैं अच्छा काम करता रहूँ. मैं अपने आप को बदलना चाहता हूँ, एक छवि में बँधना नहीं चाहता कि सिर्फ़ कॉमेडी करूँ या एक्शन करूँ. मैं इन सब चीज़ों पर ध्यान ज़्यादा देता हूँ बजाय कि हिट या फ़्लॉप पर. ये सब तो दर्शकों के हाथ में है. आप लोग फ़िल्म देखते हैं तो हिट हो जाती है वरना नहीं होती. वैसे आपने हैट्रिक की बात की, तो यहाँ भागमभाग को शायद आप भूल गईं. उसने भी अच्छा बिज़नेस किया था. इस वर्ष जितनी सफलता आपकी सभी फ़िल्मों को मिली है, वो बाक़ी अभिनेताओं को कम ही मिली है ख़ासकर विदेशों में. पहले शाहरुख़ खान जैसे एक्टर ही विदेशों में लोकप्रिय होते थे. हो सकता है कि आज मैं 'फ़्लेवर ऑफ़ द मंथ' हूँ फिर अगले महीने न रहूँ. कुछ नहीं कह सकते हैं, ये तो बदलता रहता है. जो कुछ दर्शक और फ़ैन्स दे दें वही अच्छा है. आपकी नई फ़िल्म है ‘भूल भुलैया’ जिसे प्रियदर्शन ने निर्देशित किया है..क्या ये भी आपकी पिछली फ़िल्मों की तरह कॉमेडी है?
‘भूल भुलैया’ एक गंभीर साइकोलॉजिकल थ्रिलर है. इसमें कॉमेडी नहीं है. क्या है कि भारत में या भारत के बाहर भी लोग कई बातों पर विश्वास करते हैं जैसे कि किसी के अंदर आत्म आ गई है, भूत है. लोग झाड़ फूँक करवाते हैं प्रेतआत्मा निकालने के लिए, लोग समझते हैं कि उसके अंदर से कोई और बोल रहा है. जबकि ऐसा होता नहीं है. ये एक बीमारी है जिसे मल्टिपल पर्सनेल्टी डिसऑर्डर कहते हैं. भूल भुलैया इसी पर आधारित है. अगर कम शब्दों में कहूँ तो ये फ़िल्म साइंस वर्सिस सुपरस्टिशन यानी विज्ञान और अंधविश्वासों को आमने-सामने लाकर खड़ा करती है. ये शायद पहली फ़िल्म है जिसमें प्रियदर्शन जी और मैं साथ में है पर ये कॉमेडी नहीं है. आपने कहा कि अंधविश्वसों पर सवाल उठाए गए हैं भूल भुलैया में. लेकिन कुछ लोग ये भी कहेंगे कि जो एक के लिए अंधविश्वास है वो दूसरे के लिए आस्था का विषय हो सकता है. हाँ सब लोगों का अलग-अलग चीज़ों पर विश्वास होता है. आप उस बात पर विश्वास न करें, मैं शायद करूँ. जैसे मैं भगवान पर बहुत विश्वास करता हूँ. मैं मानता हूँ कि जो भी चमत्कार होता है भगवान ही करता है. लेकिन कुछ लोग इन बातों पर विश्वास नहीं रखते. फ़िल्म में दोनों पक्षों के बीच तालमेल कैसे बिठाया गया है ये तो फ़िल्म देखकर ही पता चलेगा. आपने निर्देशक प्रियदर्शन जी की बात की. उनकी लगभग हर फ़िल्म में अक्षय कुमार होते हैं. कुछ उनके बारे में बताइए. वे तो कम ही मीडिया से रूबरू होते हैं.
प्रियदर्शन मीडिया से ज़रा दूर ही रहते हैं, ज़्यादा आते नहीं हैं सामने. उनको मैने कई बार बोला है कि वो इंटरव्यूह दिया करें, अपनी फ़िल्म के बारे में बताएँ क्योंकि जितना वो अपनी फ़िल्म के बारे में जानते हैं उतना शायद हम न जानते हों. जहाँ तक काम की बात है, तो उनके साथ काम करने में बहुत मज़ा आता है क्योंकि वे बहुत सुलझे हुए इंसान हैं. उनकी ख़ासियत है कि वे लोगों का मनोरंजन करना जानते हैं- चाहे वो कॉमेडी हो, थ्रिलर हो या फिर विरासत जैसी फ़िल्म हो. ‘लागा चुनरी में दाग़’ भी ‘भूल भुलैया’ के साथ ही रिलीज़ हो रही है. इससे बिज़नेस पर कुछ असर पड़ने की आशंका है? दोनों फ़िल्में बिल्कुल अलग हैं. एक थ्रिलर है तो दूसरी रोमांटिक फ़िल्म है, दोनों का कोई तालमेल नहीं है. जिसको थ्रिलर देखनी है वो भूल भुलैया देखेगा, जिसको रोमांटिक देखना होगा वो रोमांटिक देखेगा. आपने अपनी फ़िल्म में अंधविश्वासों पर सवाल उठाने की बात की. आपकी नज़र में फ़िल्म कलाकारों का काम केवल मनरोंजन करना होता है या फिर उनका ये दायित्व भी होना चाहिए कि वे फ़िल्मों में कुछ संदेश रखें जैसे रंग दे बसंती या लगे रहो मुन्नाभाई में था. हाँ फ़िल्म में मनोरंजन तो होता है लेकिन कोई न कोई संदेश भी होता है. जैसे भूल भुलैया में एक तरह की सीख है कि अंधविश्वासों पर ज़्यादा ध्यान न दें. हर चीज़ का कारण होता है और ये फ़िल्म मनोवैज्ञानिक तरीके से इन कारणों को बताती है. मेरा ख़्याल है आप इससे कुछ न कुछ सीख कर ही निकलेंगे. आप यशराज के बैनर तले फ़िल्म ‘टशन’ में काम कर रहे हैं. करीब दस साल पहले आपने यशराज के साथ काम किया था- ‘दिल तो पागल है’ और पहले ये दिल्लगी’ में. क्या बड़े बैनर में काम करना अहम होता है किसी भी अभिनेता के लिए या उसके बगै़र भी जगह बना सकते हैं? बड़े बैनर में काम करना अपने हिसाब से फ़ायदेमंद तो ज़रूर होता है क्योंकि आपको पता है कि अच्छा बैनर होगा जो अच्छी फ़िल्म बनाएगा. लेकिन ऐसा भी तो होता है कि बड़े बैनर आपको न लें. ऐसे में आपको अपना काम ही करते रहना पड़ता है. जैसे मैं ही यशराज के साथ इतने सालों बाद काम कर रहा हूँ. इस बीच मुझे तो अपना काम करते रहना पड़ा. इनदिनों आप प्रियदर्शन, विपुल शाह, सुनील दर्शन.. इन लोगों की फ़िल्मों में ज़्यादा नज़र आते हैं. एक टीम सी बन गई है. तो क्या ऐसे में काम करने में आसानी होती है क्योंकि टीम वर्क ज़्यादा अच्छा होता है? हाँ हमारी सोच मिलती जुलती है. लेकिन ऐसा कुछ नहीं है कि कोई कैम्पिंग हो गई है. ये एक वहम है बस. ये ज़रूर है कि इन लोगों के साथ मैने काफ़ी काम किया है. इनका सिनेमा का तरीका भी वही है जैसा मेरा है, इसलिए ज़्यादा सहज महसूस करता हूँ. वैसे मैं एक नए निर्देशक के साथ भी काम कर रहा हूँ. विक्टर नाम है उनका. नागेश कुकुनूर और निखिल आडवाणी के साथ भी फ़िल्में कर रहा हूँ. नागेश कुकुनर अलग तरह की फ़िल्में बनाते हैं. उनके साथ कौन सी फ़िल्म कर रहे हैं? फ़िलहाल मैं कनाडा में हूँ और नागेश कुकुनूर की फ़िल्म कर रहा हूँ- ‘8/10’. नाम थोड़ा अजीब और अलग सा है. फिर आएगी फ़िल्म ‘सिंग इज़ किंग’. आपसे कुछ समय पहले बात हुई थी तो आपने कहा था कि लोग जल्द ही अक्षय कुमार को एक्शन फ़िल्म में देखेंगे? हाँ अगले साल मैं एक्शन फ़िल्म में काम कर रहा हूँ उसका नाम है ‘चाँदनी चौक टू चाइना’. आपको लोग कॉमेडी और एक्शन दोनों के लिए जानते हैं. आपके पंसदीदा कॉमिक और एक्शन अभिनेता कौन से हैं? कॉमेडी में मुझे संजीव कुमार जी और महमूद पसंद हैं और एक्शन में जेट ली और जैकी चान. |
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