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रेड एफ़एम पर 'प्रतिबंध' लगाने की सिफ़ारिश | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
केंद्र सरकार ने दिल्ली के एक निजी रेडियो चैनल रेड एफ़एम पर सप्ताह भर के लिए प्रतिबंध लगाने की सिफ़ारिश की है. पिछले दिनों रेड एफ़एम के प्रेजेंटर नितिन ने इंडियन आइडल के विजेता प्रशांत तमांग को लेकर रेडियो प्रसारण में कथित तौर पर नस्लवादी टिप्पणी की थी. प्रशांत गोरखा मूल के हैं. टिप्पणी के बाद पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग और सिलीगुड़ी में हिंसा भड़क उठी थी. इस घटना के बाद रेड एफ़एम के विरुद्ध कार्रवाई की माँग की जा रही थी. पत्रकारों से बातचीत करते हुए सूचना-प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी ने कहा, "एफ़एम चैनल सरकारी लाइसेंस पर चल रहे हैं. मैनें सप्ताह भर के लिए चैनल के ऊपर प्रतिबंध लगाने का फ़ैसला किया है." यह फ़ैसला टीडीसेट (टेलीकॉम क्षेत्र में उठने वाले विवादों की सुनवाई के लिए गठित ट्रिब्यूनल) का फ़ैसला आने के बाद ही प्रभावी होगा. इसकी सुनवाई चार अक्तूबर को होगी. 'लक्ष्मण रेखा ख़ुद खींचें' समाचार एजेंसियों के अनुसार चैनल का कहना है कि उसने घटना के बाद गोरखा समुदाय से माफ़ी माँग ली थी. साथ ही उसने इस बारे में प्रेस विज्ञप्ति भी ज़ारी की थी. प्रसारण के अधिकार के पक्ष में चैनल ने सवाल उठाया है कि चूँकि चैनल का प्रसारण क्षेत्र दिल्ली है, इसलिए उसे दार्जिलिंग और सिलीगुड़ी क्षेत्र में हुई हिंसा के लिए कैसे ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है? इस घटना के बाद पत्रकारिता जगत में एक बार फिर पत्रकारिता की सीमा और आचार संहिता को लेकर बहस छिड़ी है. आउटलुक हिंदी पत्रिका के संपादक आलोक मेहता कहते हैं, "मैं आम तौर पर प्रतिबंध लगाए जाने के ख़िलाफ़ हूँ. पर हमें लक्ष्मण रेखा ख़ुद खींचनी होगी. संपादकों को चाहिए की सरकार को इस तरह के मौक़े न दे." | इससे जुड़ी ख़बरें रेड एफ़एम को कारण बताओ नोटिस29 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'निजी एफ़एम से समाचार पर विचार'20 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'मीडिया के कामकाज में कोई दखल नहीं'05 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस चुप हो गया सबसे सस्ता रेडियो स्टेशन30 मार्च, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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