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सोमवार, 03 सितंबर, 2007 को 10:34 GMT तक के समाचार
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'मुसाफ़िर साठ बरसों के, अभी तक...'

दिल्ली में भारत-पाक मुशायरा
इस मुशायरे में भारत और पाकिस्तान की कई महिला शायर भी शामिल थीं
भारत और पाकिस्तान की आज़ादी के 60 साल पूरे होने पर आयोजित मुशायरे में मौजूदा चुनौतियों और समस्याओं को बहुत ही ख़ूबसूरती से पेश किया गया.

दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में आयोजित इस मुशायरे में भारत और पाकिस्तान के कई शायरों ने हिस्सा लिया.

इस मुशायरे में सदियों पुरानी परंपराओं को न केवल बरक़रार रखा गया बल्कि उसमें दोनों देशों की समसामयिक समस्याओं को भी पेश किया.

वास्तव में मुशायरों की आत्मा भी समसामयिक घटनाओं की प्रस्तुति में ही होती है और इसीलिए लोग पुराने कलाम से अधिक नई परिस्थितियों में कही गई कविताओं और शेरों पर ज़्यादा से ज़्यादा दाद देते हैं.

भारत के प्रसिद्ध शायर ज़ुबैर रिज़वी ने भारत-पाक रिश्ते की नज़ाकत का ज़िक्र करते हुए कहा कि हमारा रिश्ता अजीब रहा है जिसमें तीन युद्ध भी शामिल हैं.

इसी संदर्भ में उन्होंने अपनी एक नज़्म (कविता) पढ़ी और लोगों से ख़ूब दाद हासिल की.

अजीब हैं ये हमारे रिश्ते
मैं शब के माथे पे चाँद देखूँ
और उसकी आँखों में
धूप खाते सुनहरे साहिल की रेत चमके
मैं खिड़कियों को नए मनाज़िर की सम्त खोलूँ
तो वो हवा की हथेलियों पर चराग़ रख दे
चराग़ की लौ जो कपकपाए तो उसको
अपनी हथेलियों की जलन से रोके

मैं सोचता हूँ
गुलाब रुत में हमारा अब के
जो सामना हो
हम अपने हाथों में गर्मजोशी की धूप भर लें
स्याह शब की हथेलियों पर चराग़ रख दें
ज़मीं, समुंदर, हवा, पहाड़ों के दामनों पर
धनक के रंगों से अपने प्यारों के
नाम लिखें
मोहब्बतों के सलाम लिखें.

पाकिस्तान से आने वाले मेहमान शायर असग़र नदीम सैयद ने अपनी उसी भावना की अभिव्यक्ति से सराबोर नज़्म से लोगों का दिल जीत लिया और कहा कि अभी कुछ दिन लगेंगे. यह कविता उन्होंने भारत की ओर से कही.

अभी कुछ दिन लगेंगे ख़्वाब को ताबीर होने में
सफ़र को मंज़िलों की हद में लाने में
परिंदे को हवा के रुख़ पे आने में
अभी कुछ दिन लगेंगे, अभी कुछ दिन लगेंगे.

भावुक माहौल

असग़र नदीम सैयद ने माहौल को ज़्यादा भावुक बना दिया. उन्होंने पाकिस्तान की ओर से जो नज़्म पढ़ी वह भारत से पाकिस्तान जाने वालों की त्रासदी का चित्रण थी.

मुसाफ़िर साठ बरसों के अभी तक घर नहीं पहुँचे
कहीं पर रास्ते की घास में अपनी जड़ों की खोज में
तारीख़ के घर का पता मालूम करते हैं
मगर तारीख़ तो बरगद का ऐसा पेड़ है जिसकी
जड़ें तो सरहदों को चीर कर अपने लिए रस्ता बनाती हैं
मुसाफ़िर साठ बरसों के बहुत हैरान बैठे हैं...
मुसाफ़िर साठ बरसों के अभी तक घर नहीं पहुँचे
कहीं पर भी नहीं पहुँचे.
कि सुबहे-नीम वादा में धुंधलका ही धुंधलका है
कि शामे-दर्दे-फ़ितरत में कहीं पर एक रस्ता है
नहीं मालूम वो किस सम्त को जाकर निकलता है
मुसाफ़िर साठ बरसों के बहुत हैरान बैठे हैं.

श्रोता
मुशायरे को सुनने के लिए बड़ी तादाद में लोग इकट्ठा हुए

जितने लोग ऑडिटोरियम में थे उनसे दोगने और तिगुने लोग बाहर बड़े से स्क्रीन पर उनकी इस रचना पर दाद दे रहे थे.

यह मुशायरा कई तरह से दूसरे मुशायरों से अलग था. इसमें उर्दू भाषा की आबरू कही जाने वाली ग़ज़ल से अधिक नज़्में पढ़ी गईं.

इसमें आमतौर पर मुशायरे के जाने माने शायरों के अलावा उर्दू के क्लासिकी और संजीदा कहे जाने वाले शायरों ने अपने कलाम सुनाए.

महिला शायर

इसमें शायरात (कवियत्री) की भी अच्छी-ख़ासी संख्या थी और वे सबकी सब आमतौर पर मुशायरों से अधिक साहित्य में जानी-पहचानी जाती हैं.

पाकिस्तान से आने वाली महिला कवि किशवर नाहीद ने एक ग़ज़ल भारत-पाकिस्तान के नाम पढ़ी तो दूसरी ग़ज़ल उन्होने उर्दू की सुप्रसिद्ध उपन्यासकार क़ुर्तुलऐन हैदर यानी ऐनी आपा की याद में कही.

क़ुर्तुलऐन हैदर का हाल ही में दिल्ली में निधन हुआ और उन्हें जामिया के क़ब्रिस्तान में दफ़्न किया गया.

हमसे दुशवार-परस्तों को हवा ढूंढ़ती है
जिस जगह जाओगे, देखोगे, क़ज़ा ढूंढ़ती है
याद आ जाए तो बीनाई-ए-जाँ ऐसी हो
दिल जुदा ढूंढ़ता है, आँख जुदा ढूंढ़ती है
वो परी-रू कि यकता थी, समनज़ार भी थी
ख़ुश-लिबासी के लिए उसको क़बा ढूंढ़ती है
बातें करते हुए रो देना, ये आदत कैसी
शाम से पहले ही होठों को दुआ ढूंढ़ती है
मैं वो आईना कि जिससे है गुरेज़ां ख़्वाहिश
मैं वो बादल, जिसे सावन की घटा ढूंढ़ती है
उसको फ़ुर्सत ही नहीं, मुझको तमन्ना भी नहीं
फिर ख़लिश क्या है कि रह-रह के वफ़ा ढूंढ़ती है

मुशायरा संजीदा शायरों का था और लोग शालीनता की ओस में नहाए हुए थे.

उर्दू की मशहूर शायर और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी की प्रोफेसर ज़ाहिदा ज़ैदी ने नज़्में भी पढ़ीं. उनकी इस ग़ज़ल को बहुत सराहा गया.

न क़ाफ़ला-ए-शौक़, न मंज़िल के निशां
दूर तक रेगे-रवां, रेगे-रवां, रेगे-रवां
साअते-वस्ल तो शायद थी किसी ख़्वाब का अक्स
फिर वही काहिशे-जां, काहिशे-जां, काहिशे-जां
शबे-फ़ुर्क़त में ख़मोशी की सुनो सरगोशी
गुल करो शोला-ए-जां, शोला-ए-जां, शोला-ए-जां
ज़िंदगी है तो बहर तौर गुज़र जाएगी
हाँ मगर दर्दे-निहां, दर्दे-निहां, दर्दे-निहां

भारत के बुज़र्ग शायर रिफ़त सरोश ने भारत और पाकिस्तान के हवाले से अपनी नज़्म पढ़ी जिससे यह ज़ाहिर हो गया कि दोनों तरफ की जनता शांति चाहती है.

कब तलक ये तिशनगी बेगानगी
हिंदो-पाकिस्तान का दिल एक है
एक ही चश्में की दो नहरें हैं ये
अज़्मते-तारीख़ पर दोनों को नाज़
जंगे-आज़ादी की भी है तस्वीर एक
और आज़ादी का जब सूरज उगा
दोनों जानिब था उजाला दाग़दार

पाकिस्तान की मशहूर शायरा ज़हरा निगाह ने अपनी नज़्म ‘गुल बादशाह’ से जंग की तबाही, शहादत और पूरब-पश्चिम के टकराव की विडम्बना को दिखाया.

पाकिस्तान की शायरा किश्वर नाहीद ने भी औरतों की पीड़ा को उजागर करती एक नज़्म पढ़ी जिसका मुखड़ा था-

तुम ही स्वामी राम बने मेरे
तुम ही मजनूं क़ैस बने मेरे

ज़हरा निगाह ने अध्ययन और आध्यात्म के फ़र्क़ को ख़ूबसूरती के साथ पेश किया.

सातवें आसमान तक शोला-ए-इल्मो-अक़्ल था
फिर ज़मीने-अहले-दिल कैसी हरी भरी रही
आप हुआ है मुंदमिल गुल ने बहार की नहीं
शुहरते-दस्ते-चारागर ज़ख़्म ही ढूढ़ती रहीं.

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