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'मुसाफ़िर साठ बरसों के, अभी तक...' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत और पाकिस्तान की आज़ादी के 60 साल पूरे होने पर आयोजित मुशायरे में मौजूदा चुनौतियों और समस्याओं को बहुत ही ख़ूबसूरती से पेश किया गया. दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में आयोजित इस मुशायरे में भारत और पाकिस्तान के कई शायरों ने हिस्सा लिया. इस मुशायरे में सदियों पुरानी परंपराओं को न केवल बरक़रार रखा गया बल्कि उसमें दोनों देशों की समसामयिक समस्याओं को भी पेश किया. वास्तव में मुशायरों की आत्मा भी समसामयिक घटनाओं की प्रस्तुति में ही होती है और इसीलिए लोग पुराने कलाम से अधिक नई परिस्थितियों में कही गई कविताओं और शेरों पर ज़्यादा से ज़्यादा दाद देते हैं. भारत के प्रसिद्ध शायर ज़ुबैर रिज़वी ने भारत-पाक रिश्ते की नज़ाकत का ज़िक्र करते हुए कहा कि हमारा रिश्ता अजीब रहा है जिसमें तीन युद्ध भी शामिल हैं. इसी संदर्भ में उन्होंने अपनी एक नज़्म (कविता) पढ़ी और लोगों से ख़ूब दाद हासिल की. अजीब हैं ये हमारे रिश्ते मैं सोचता हूँ पाकिस्तान से आने वाले मेहमान शायर असग़र नदीम सैयद ने अपनी उसी भावना की अभिव्यक्ति से सराबोर नज़्म से लोगों का दिल जीत लिया और कहा कि अभी कुछ दिन लगेंगे. यह कविता उन्होंने भारत की ओर से कही. अभी कुछ दिन लगेंगे ख़्वाब को ताबीर होने में भावुक माहौल असग़र नदीम सैयद ने माहौल को ज़्यादा भावुक बना दिया. उन्होंने पाकिस्तान की ओर से जो नज़्म पढ़ी वह भारत से पाकिस्तान जाने वालों की त्रासदी का चित्रण थी. मुसाफ़िर साठ बरसों के अभी तक घर नहीं पहुँचे
जितने लोग ऑडिटोरियम में थे उनसे दोगने और तिगुने लोग बाहर बड़े से स्क्रीन पर उनकी इस रचना पर दाद दे रहे थे. यह मुशायरा कई तरह से दूसरे मुशायरों से अलग था. इसमें उर्दू भाषा की आबरू कही जाने वाली ग़ज़ल से अधिक नज़्में पढ़ी गईं. इसमें आमतौर पर मुशायरे के जाने माने शायरों के अलावा उर्दू के क्लासिकी और संजीदा कहे जाने वाले शायरों ने अपने कलाम सुनाए. महिला शायर इसमें शायरात (कवियत्री) की भी अच्छी-ख़ासी संख्या थी और वे सबकी सब आमतौर पर मुशायरों से अधिक साहित्य में जानी-पहचानी जाती हैं. पाकिस्तान से आने वाली महिला कवि किशवर नाहीद ने एक ग़ज़ल भारत-पाकिस्तान के नाम पढ़ी तो दूसरी ग़ज़ल उन्होने उर्दू की सुप्रसिद्ध उपन्यासकार क़ुर्तुलऐन हैदर यानी ऐनी आपा की याद में कही. क़ुर्तुलऐन हैदर का हाल ही में दिल्ली में निधन हुआ और उन्हें जामिया के क़ब्रिस्तान में दफ़्न किया गया. हमसे दुशवार-परस्तों को हवा ढूंढ़ती है मुशायरा संजीदा शायरों का था और लोग शालीनता की ओस में नहाए हुए थे. उर्दू की मशहूर शायर और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी की प्रोफेसर ज़ाहिदा ज़ैदी ने नज़्में भी पढ़ीं. उनकी इस ग़ज़ल को बहुत सराहा गया. न क़ाफ़ला-ए-शौक़, न मंज़िल के निशां भारत के बुज़र्ग शायर रिफ़त सरोश ने भारत और पाकिस्तान के हवाले से अपनी नज़्म पढ़ी जिससे यह ज़ाहिर हो गया कि दोनों तरफ की जनता शांति चाहती है. कब तलक ये तिशनगी बेगानगी पाकिस्तान की मशहूर शायरा ज़हरा निगाह ने अपनी नज़्म ‘गुल बादशाह’ से जंग की तबाही, शहादत और पूरब-पश्चिम के टकराव की विडम्बना को दिखाया. पाकिस्तान की शायरा किश्वर नाहीद ने भी औरतों की पीड़ा को उजागर करती एक नज़्म पढ़ी जिसका मुखड़ा था- तुम ही स्वामी राम बने मेरे ज़हरा निगाह ने अध्ययन और आध्यात्म के फ़र्क़ को ख़ूबसूरती के साथ पेश किया. सातवें आसमान तक शोला-ए-इल्मो-अक़्ल था |
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