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'टेढ़ी-मेढ़ी आँख बनाने की ज़रूरत नहीं' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
‘प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा’ .... अगर आप हिंदी फ़िल्मों के प्रशंसक हैं तो फ़िल्म बॉबी का ये मशहूर डायलॉग शायद ज़रूर सुनने को मिला होगा आपको. प्रेम चोपड़ा ने अपने करियर की शुरुआत 60 के दशक में पंजाबी फ़िल्मों में बतौर हीरो की. इसी दौरान प्रेम चोपड़ा ने बतौर खलनायक हिंदी फ़िल्मों में भी क़दम रखा. ये वो दौर था जब हिंदी फ़िल्मों के युवा खलनायक प्राण धीरे-धीरे चरित्र किरदारों की ओर बढ़ने लगे थे. इसी दौरान शहीद(1965), तीसरी मंज़िल और उपकार(1967) जैसी हिट फ़िल्में देकर प्रेम चोपड़ा ने खलनायक के तौर पर अपनी जगह बनाई और कटी पतंग और क्रांति जैसी फ़िल्मों से उस मकाम को और पक्का किया. दो अंजाने के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी मिला था. हाल ही में लंदन आए प्रेम चोपड़ा से बीबीसी ने ख़ास बातचीत की. आपको आज भी लोग एक लेजेंड के तौर पर याद करते हैं- इतने बरस बाद भी. ऐसी क्या बात है आपकी हस्ती में? लोगों की ज़र्रा नवाज़ी है कि अभी तक मुझे बर्दाशस्त करते हैं और पसंद करते हैं. मैं उनका शुक्रिया ज़रूर अदा करना चाहूँगा. मैं तो आज भी मेहनत करता रहता हूँ कि लोगों को खुश कर सकूँ. अच्छा फ़िल्मों के चक्कर में आप कैसे पड़ गए? ये तो कॉलेज के ज़माने की बात है. कॉलेज में ही ये पता चलने लगता है कि आपकी दिलचस्पी किसमें है. मुझे कॉलेज के ज़माने से ही स्टेज का शौक था. बस वहीं से लगा कि ये राह पकड़नी है. कुछ देर पहले हमने देखा कि एक लड़की ने आकर आपसे बोला कि आपको फ़िल्मों में देखकर उसे बहुत डर लगता था. पहले भी आपको लड़कियाँ ऐसा बोलती होंगी. (हँसते हुए) हाँ पहले भी लड़कियाँ आकर मुझसे बोला करती थीं कि उन्हें मुझसे डर लगता है. मुझे पता है कि उस लड़की का वो मतलब नहीं था. क्या है कि पसंद करते हैं लोग.असल में नहीं डरते. उनका तरीका है मेरे काम की तारीफ़ करने का. आपने बेशुमार फ़िल्मों में विलेन का रोल किया है. आपका सबसे यादगार रोल कौन सा रहा.
ये कहना बड़ा मुश्किल होता है. किसी एक फ़िल्म के बारे में कह पाना मुश्किल है.जो फ़िल्में चल जाती हैं, उन्हें हम यादगार कहने लगते हैं. हमारे लिए तो हर फ़िल्म अहम होती है, हर फ़िल्म में उतनी ही मेहनत करते हैं. पुराने दौर की फ़िल्मों में खलनायक की एक अलग सी छवि होती थी- अलग मेकअप, अलग अंदाज़ और कुछ ख़ास डायलॉग होते थे. कितना ज़रूरी होता है किसी विलेन की छवि के लिए ये सब. शुरू-शुरू में शायद लोगों को लगता था कि विलेन अलग सा हो, टेढ़ी-मेढ़ी आँख करके बात करे. लेकिन अब तो ऐसा नहीं है. अब तो बहुत से हीरो विलेन का रोल करना चाहते हैं. अब विलेन का रोल ज़्यादा मक़बूल हो गया है. लोगों को भी विविधता मिलती है इससे. आपने कहा कि लंदन आपको बेहद पसंद है..ऐसी क्या बात है लंदन में. लंदन में आकर ऐसा आभास होता है कि जैसे अपने ही मुल्क़ में हों. यहाँ बहुत अपनापन महसूस होता है, काफ़ी दोस्त-रिश्तेदार हैं लोगों के यहाँ.आप ख़ुद को अजनबी नहीं समझते इस शहर में. यहाँ हर तरह के लोग मिलते हैं. ऐसा लगता है कि हिंदुस्तान से हज़ारों मील दूर होते हुए भी अपने देश में हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें हॉलीवुड की पहली बॉलीवुड फ़िल्म23 अगस्त, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस समय के साथ बदलते रहे खलनायक02 अगस्त, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस गब्बर सिंहः 'तोहार का होई रे कालिया'19 अक्तूबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस बुरी नज़र वाले तेरा मुँह आला01 मार्च, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस जाने-माने अभिनेता अमरीश पुरी नहीं रहे12 जनवरी, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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