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गुरुवार, 23 अगस्त, 2007 को 23:11 GMT तक के समाचार
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कोलम्बस का रास्ता

चित्रांकन-हरीश परगनिहा
चित्रांकन-हरीश परगनिहा

‘‘आप अमरीका नहीं गए?’’

प्रशांत मिश्रा पिछले कई दिनों से इस सवाल का जवाब देते-देते थक गए थे. वह मार्निंग वॉक पर निकलते तो मुहल्ले का कोई न कोई परिचित व्यक्ति रास्ते में मिल जाता और उनसे यह सवाल पूछ बैठता. फिर कहता, ‘आपने अच्छा नहीं किया, प्रशांत बाबू.’

आपको अमरीका जाना ही चाहिए था. कोई कहता, ‘अगर आपको जार्ज बुश से विरोध है तो क्या आप अमरीका नहीं जाएंगे? इस तरह तो कोई व्यक्ति कहीं जाएगा ही नहीं.’

‘इस उम्र में आपको मौक़ा मिला और अपना मौक़ा गँवा दिया. आप अपने लिए न जाते, कम से सम अपने बाल-बच्चों, पत्नी और माता-पिता के लिए तो जाते. वहाँ से कुछ घर वालों के लिए लाते.’

‘मेरी मौसी एक बार अमरीका गई थी तो वह वहाँ से काफ़ी चीज़े लेकर आई थी. उनकी दी हुई घड़ी और कैमरा आजतक मेरे पास है. उस समय निक्सन वहाँ के प्रेसीडेंट थे.’

कोई कहता,‘मेरे बड़े भाई एक बार अमरीका गए तो वे कैनेडी की मूर्ति लेकर आए थे. बहुत खूबसूरत मूर्ति थी.’

एक के अंकल गए तो मार्टिन लूथरकिंग के घर की एक अनुकृति लेकर आए, एक सज्जन स्टैचू ऑफ लिबर्टी लेकर आए तो एक सज्जन व्हाइट हाऊस का वूडन मॉडल लेकर आए थे.

प्रशांत मिश्रा सबकी बातों को चुपचाप सुनते. वह इस प्रश्न का उत्तर देना भी मुनासिब नहीं समझते-आख़िर वह अमरीका क्यों नहीं गए? वे मुस्कराकर रह जाते और फिर कोई दूसरी बात शुरू कर देते.

प्रशांत बाबू की पत्नी ने मुहल्ले में कईयों के ड्राईंग रूप में ये चीज़े देखी थीं. उनकी पत्नी कहती अगर आपको अमरीका जाने का मौक़ा मिले तो ये चीज़े ज़रूर लाइएगा. हम लोग भी अपने ड्राईंग रूम में इन्हें सजाएंगे. बहुत खूबसूरत लगेंगी.

प्रशांत बाबू कभी सोचते भी नहीं थे कि उन्हें एक दिन अमरीका जाने का मौक़ा मिलेगा, लेकिन जब उन्हें मौक़ा मिला तो वे अमरीका ‘नहीं’ गए, पर वे क्यों ‘नहीं’ गए, इसका ठीक-ठीक कारण किसी को नहीं पता था.

 आप मुझे तौर-तरीका समझाएंगे. आप लोग मोदी और आडवाणी को कुछ भी कहे, हम सह लें, लेकिन हम लोगों ने लादेन की आलोचना की तो आप लोगों की सुलगती है

कोई कहता कि वे जार्ज बुश के विरोधी थे, इसलिए नहीं गए. कोई कहता कि उनका दफ़्तर में अपने बॉस से झगड़ा था, इसलिए वह नहीं गए. कोई कहता कि वह दिल के मरीज़ थे, इसलिए इतनी दूर विमान की यात्रा नहीं कर सकते थे. कोई कहता कि अमरीकी दूतावास ने उन्हें वीज़ा ही नहीं दिया. कोई तो यह भी कहता कि उन्हें अमरीका जाने का ऑफर ही नहीं था, उन्होंने ख़ुद यह गप्प उड़ाई थी. बहरहाल, प्रशांत बाबू का अमरीका में कोई दोस्त और निकट का सगा-संबंधी नहीं था. दूर के रिश्ते में उनकी एक मौसी का लड़का न्यूयॉर्क में ही बस गया था. कभी-कभी वह मौसी किसी शादी-ब्याह में मिलती तो अपने बेटे के बारे में फ़ख़्र से बतातीं. तब घर की महिलाएँ और लड़कियाँ तथा किशोर लड़के मौसी के बातें बड़े चाव से सुनते थे. वह वहाँ के किस्से बहुत डूब कर सुनाती थीं. प्रशांत बाबू को इन किस्सों में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं थी, पर उनकी पत्नी बड़े गौर से सुनती और रात को सोते समय अपने पति को कुछ किस्से सुनातीं.

मौसी को प्रशांत बाबू की बेटी गौरी बहुत पसंद थी. वह मौसी से लगी रहती थी. मौसी बार-बार कहती, ‘गौरी के लिए मैं अमरीका में कोई लड़का ढूंढूंगी. अपने बेटे से कहूँगी कि वह अपनी कंपनी में कोई भारतीय लड़का ढूंढे.’

प्रशांत बाबू की पत्नी मौसी की बातों को हँसी-मज़ाक या केवल सदिच्छा मानकर उनपर ज़्यादा गौर नहीं करती. अमरीका में काम करने वाला आख़िर गौरी से क्यों ब्याह करेगा? गौरी सुंदर है, पढ़ी-लिखी है पर वह कोई एक्स्ट्रा आर्डनरी नहीं है.

प्रशांत बाबू को अमरीका जाने का ‘ऑफर’ दफ्तर से मिला तो उनके घर के लोग काफ़ी खुश थे. गौरी तो यह सोचने भी लगी थी कि वह पापा को ‘सी ऑफ’ करने हवाई अड्डे पर जाएगी. और फिर जब वे न्यूयॉर्क से लौटेंगे तो उन्हें ‘रिसीव’ करने भी जाएगी तथा उन्हें गुलदस्ते भी भेंट करेगी. उसने कई फ़िल्मों में यह सब देखा था. उसने अपने कॉलेज में अपने दोस्तों को भी बता रखा था उसके पापा न्यूयॉर्क जा रहे हैं और वह कई चीज़ें लेकर आएंगे. लेकिन जब प्रशांत बाबू अमरीका नहीं गए तो बेटी ख़ासी नाराज़ हो गई. पत्नी तो गुस्से में बोली, ‘आप अपने सिद्धांतों को लेकर रह जाइएगा. मुझे समझ में नहीं आता, आपने क्यों मना कर दिया. कहीं आपका दिमाग तो ख़राब नहीं हो गया है.’

प्रशांत बाबू अमरीका न जाकर अपने मुहल्ले, घर और दफ़्तर में चर्चा का विषय ज़रूर बन गए थे.

दरअसल प्रशांत बाबू बाहर से जितने विनम्र, सख्त और निरीह व्यक्ति थे, अंदर से उतने ही स्वाभिमानी और अक्खड़. वे किसी की खुशामद नहीं करते. यह उनकी आदत में शुमार था. वह बॉस के कमरे में तभी जाते, जब उधर से बुलावा आता या दफ़्तर का कोई काम होता. मस्केबाजी, हँसी, मज़ाक और चापलूसी या तारीफ़ करना उन्हें बड़ा कृत्रिम लगता. यह लिजलिजापन उन्हें पसंद नहीं था.

दफ़्तर के ज्यादातर लोगों का मानना था कि प्रशांत बाबू झक्की स्वभाव के हैं. कोई कहता कि वह कुंठित व्यक्ति हैं. वह अपने सहयोगियों से ईर्ष्या करते हैं. वे अपने को सुपिरियर तथा ‘इंटेलेक्चुअल’ समझते हैं. कोई कहता कि उनकी पर्सनैलिटी में कुछ खोट है. कोई कहता कि उनकी जुबान तीखी है. कोई कहता कि उनका तो अपने घर में पत्नी और बच्चों से नहीं बनता. उनका दांपत्य जीवन भी ठीक नहीं है. कोई कहता, ‘उन्हें हार्ट की बीमारी है और वह चिड़चिड़े हो गए हैं. कोई कहता कि उनका कोलेस्ट्रल बढ़ गया है.’ कोई कहता कि वे शुगर के मरीज़ हो गए हैं. कोई कहता कि वे आईएएस में तीन बार इंटरव्यू में पहुँचकर भी पास नहीं हो पाए-इस घटना से वह इतने परेशान हो गए कि उनके मन में एक हीनग्रंथि बैठ गई.

चित्रांकन-हरीश परगनिहा
चित्रांकन-हरीश परगनिहा

यह सही है कि प्रशांत बाबू महानगर की भागदौड़ में थोड़ा तनाव महसूस करने लगे थे. कुछ तो अधिक संवेदनशील होने के कारण, कुछ आर्थिक तंगी के कारण. वह अपनी पत्नी को किसी नौकरी में नहीं लगवा सके. एक आदमी की तनख्वाह में दिल्ली में बीस साल गुजारना कोई आसान काम नहीं. अभी तक वह किराए के मकान में ही रहते इसलिए उनकी पत्नी का कहना था कि अमरीका जाने से कुछ रुपए बच जाते और वह गौरी की शादी में काम ही आता. तीन महीना रहकर वह काफ़ी कुछ बचा लेते. पर पता नहीं क्यों उनके अमरीका न जाने से बॉस के चमचों को ज़्यादा बुरा लगा. उन चमचों ने तो प्रशांत बाबू के ख़िलाफ़ अभियान ही चला दिया- यह तो सिरफिरा आदमी है. इसकी भलाई के लिए भी कुछ कहो तो यह उलटा ही सोचता है.

एक दिन वह दफ़्तर पहुँचे तो किसी ने कमेंट किया, ‘आ गए, सिद्धांतवादी श्री.’ दूसरे ने कहा, ‘अरे! आजकल तो लादेन के सपोर्टर हमारे दफ़्तर में भी हो गए हैं.’ तीसरे ने कहा, ‘आतंकवादियों को बचाना तो प्रगतिशीलता हो गई है.’

प्रशांत बाबू चुपचाप सुनते रहे. वह इन बातों का जवाब या स्पष्टीकरण देना नहीं चाहते थे. उनकी दिलचस्पी इस तरह की बहसों में नहीं थी. एक समय था जब वह सेमीनारों में परचे पढ़ते थे, पर अब वह एकदम ठंडे हो गए थे. शांत पड़ गए थे. वे अब सिर्फ़ अपना काम करते थे. दुनिया तेजी से बदल रही थी. भारत भी तेजी से बदल रहा था. अमरीका के नक्शे कदम पर था. देश की आर्थिक तरक्की की लंबी चौड़ी बातें कहीं जा रही थी. अख़बारों में भी काफ़ी कुछ छप रहा था.

तभी एक सहयोगी ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘प्रशांत बाबू, बिनलादेन का नया वीडियो आया है. आपने टीवी पर देखा?’ आपकी क्या राय है.

प्रशांत बाबू चुप रहे. उस सहयोगी ने कहा, ‘अरे. कुछ तो बोलिए. दफ़्तर में गुमसुम बैठेंगे तो मन कैसे लगेगा. लादेन के बारे में आपकी कुछ तो राय होगी.’

प्रशांत बाबू से रहा नहीं गया, ‘लादेन ही नहीं, बुश के बारे में भी मेरी राय है. दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. ’

‘मतलब, आपको दोनों में कोई फर्क नज़र नहीं आता. आप क्या खाक पढ़े-लिखे हैं.’

प्रशांत बाबू को थोड़ा गुस्सा आ गया. वह बोले, ‘मि. संजीव, मुझसे इस लहजे में बातें न कीजिए.’

‘आप मुझे धमकी देते हैं. अमरीका न जाने का गुस्सा मुझपर उतार रहे हैं.’

चित्रांकन-हरीश परगनिहा
चित्रांकन-हरीश परगनिहा

‘मैं कोई धमकी नहीं देता. मैं तो केवल यह कह रहा हूँ कि अगर बहस करनी है तो गंभीरता और सलीके से कीजिएगा.’ ‘आप मुझे तौर-तरीका समझाएंगे. आप लोग मोदी और आडवाणी को कुछ भी कहे, हम सह लें, लेकिन हम लोगों ने लादेन की आलोचना की तो आप लोगों की सुलगती है.’ ‘लादेन मेरा कोई चाचा नहीं है.’ प्रशांत बाबू चीख कर बोले. मैंने तो सिर्फ़ यह कहा, ‘बुश और लादेन दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. यह मेरी निजी राय है. मैं आपकी निजी राय को बदलने के लिए नहीं कह रहा हूँ.’

‘प्रशांत बाबू, आपके जैसे पाखंडियों को हमने खूब देखा है.’ यह सुनकर प्रशांत बाबू को गुस्सा आ गया, वह बोले, ‘जुबान संभालकर बात कीजिए.’ ‘आप मेरा क्या उखाड़ लेंगे.’ यह कहकर संजीव आगे बढ़े और उन्होंने प्रशांत बाबू की कॉलर पकड़कर एक घूंसा जड़ दिया. प्रशांत बाबू के लिए यह बिल्कुल अप्रत्याशित था. वह गिरते-गिरते बचे. तभी दफ़्तर के लोगों ने बीच-बचाव किया और मामले को शांत कराया. प्रशांत बाबू तत्काल दफ़्तर से घर लौट आए.

वह जब घर पहुँचे तो पत्नी बड़ी खुश नज़र आ रही थी. पत्नी ने कहा, ‘न्यूयॉर्क से उस मौसी का खत आया है. गौरी के लिए उन्होंने वहाँ कोई लड़का देखा है. लड़के ने गौरी की तस्वीर देखी है. उसे लड़की पसंद है. उन्हें दहेज नहीं चाहिए, केवल लड़की चाहिए.’ वह दिसंबर में भारत आ रहा है. लड़की देखेगा. वे लोग बस्तर के रहने वाले हैं. 20 साल से न्यूयॉर्क में ही बस गए हैं. लड़के का पूरा बायोडाटा इंटरनेट पर है. और हाँ लड़के का कोई रिश्तेदार तुम्हारे दफ़्तर में भी है. शायद संजीव नाम है. यह कहकर पत्नी ने प्रशांत बाबू को मौसी जी का लिफ़ाफ़ा थमा दिया.

लिफाफे पर कोलम्बस की तस्वीर बनी हुई थी और नीचे अंग्रेज़ी में ‘कोलम्बस’ भी लिखा हुआ था. प्रशांत बाबू ने बचपन में कोलम्बस के बारे में पढ़ा था और उसकी काल्पनिक तस्वीर भी देखी थी. इतने वर्षों में कोलम्बस का चेहरा भी बदल गया था. वह उस चेहरे को गौर से देखने लगे. उस चेहरे के भीतर से कोई और चेहरा उन्हें झाँकते हुए नज़र आया.

प्रशांत बाबू सोचने लगे कि कहीं मेरे अंदर भी कोई चेहरा झाँक तो नहीं रहा है. यह देखने वह बेडरूम में लगे आईने के सामने खड़े हो गए. उनके होठों पर ख़ून बह रहा था. वह उसे पोछने की कोशिश कर रहे थे. तभी उनकी पत्नी ने यह ख़ून देख लिया. ख़ून की एक बूंद लिफाफे पर भी गिरी और कोलम्बस का चेहरा लाल हो गया. कोलम्बस निकला था भारत को खोजने, पर वह भटकते हुए अमरीका चला गया था. प्रशांत बाबू भटकना नहीं चाहते थे. वह अपने लिए कोई रास्ता खोज रहे थे. वह इतने वर्षों की नौकरी में इतना पैसा नहीं जमा कर पाए थे कि दहेज दे सकें. तभी उनके घर के फ़ोन की घंटी बजी. पत्नी ने उठाया. ‘न्यूयॉर्क से मौसी जी का फ़ोन है.’

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विमल कुमार
13/1016, वसुंधरा, गाजियाबाद (उ.प्र.)

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