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कैसा था ब्रिटिश राज में भारत | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इस वर्ष जब भारत अपनी आज़ादी की 60वीं वर्षगाँठ मना रहा है तो ये सवाल अकसर मन में आता है कि आख़िर ब्रिटिश राज का भारत कैसा दिखता होगा. आज हर बड़ी या ख़ास घटना तुरंत वीडियो कैमरे में कैद हो जाती है, कई लोगों के घरों में वीडियो कैमरे या हैंडीकैम होते हैं –यादों को सहेजना और ऐतिहासिक पलों को कैद करना बड़ा आसान हो गया है. अब लंदन में ब्रिटिश फ़िल्म इंस्टीट्यूट(बीएफ़आई) ने भारत में ब्रितानी राज के दौरान के कुछ दुर्लभ और अनोखे वीडियो संग्रहित किए हैं जिन्हें आम लोग जाकर देख सकते हैं. इस आयोजन का नाम 'बिफ़ोर मिडनाइट- ए पोर्टरेट ऑफ़ इंडिया ऑन फ़िल्म 1899-1947' है. 19वीं या 20वीं सदी में राजाओं के राजसी दरबार हो या खेतों में खेती करते किसान या गंगा किनारे घाटों पर स्नान करते लोग....इन दुर्लभ वीडियो को देखना वाकई एक अदभुत अनुभव है. इनमें 1899 से लेकर आज़ादी तक के अविभाजित भारत के वीडियो देखे जा सकते हैं. हालांकि कुछ वीडियो देखकर आभास होता है कि ये ब्रितानी साम्राज्यवाद के प्रचार का हिस्सा हैं. इस प्रदर्शनी के क्यूरेटर रॉबिन बेकर कहते हैं, "हम सालों से ये सब वीडियो जुटा रहे थे. कुछ ब्रितानी साम्राज्यवाद का प्रचार करने के लिए बनाए गए थे, कुछ लोगों के होम वीडियो थे लेकिन ये मौका ज़रूर देते हैं अतीत में झांकने का." अनोखी धरोहर
ज़्यादातर वीडियो में ध्वनि या आवाज़ नहीं है और कुछ की अवधि मात्र एक से तीन मिनट की है लेकिन ये उस समय के सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक माहौल को करीब से देखने का मौका देते हैं. इसमें गांधीजी के मशहूर नोआखली मार्च का वीडियो भी शामिल है जब 1946 में अविभाजित भारत का पूर्वी बंगाल दंगों की आग में जल रहा था और हिंदू-मुसलिम एकता का संदेश लिए गांधीजी ने नवंबर 2006 में वहाँ मीलों दौरा किया. ये वीडियो गांधीजी के रिश्तेदार कानु ने फ़िल्माया था और इसमें गांधीजी, मनु गांधी और उनकी डॉक्टर सुशीला नायर को देखा जा सकता है.
बीएफ़आई के इस संग्रह में 1903 और 1911 के दिल्ली दरबार का वीडियो भी है. वर्ष 1903 के दो मिनेट के वीडियो में उस समय का नज़ारा उभर कर आता है जब एडवर्ड सातवें और महारानी एलेक्ज़ेड्रा की ताजपोशी की तैयारियाँ चल रही थी. वहीं 1911 में करीब पचास हज़ार सैनिकों की मौजूदगी में जॉर्ज पाँचवें और महारानी मेरी की ताजपोशी का 16 मिनट का वीडियो तो और भी दिलचस्प है. वीडियो में लिखा गया है कि ताजपोशी में हिस्सा लेने वाले राजा तो कई थे लेकिन रानी केवल एक थी- भोपाल की बेग़म. बीएफ़आई के परिसर में मौजूद एक ब्रितानी महिला पेट्रिशा काफ़ी कौतूहल से दिल्ली दरबार के वीडियो बड़े ही ध्यान से देख रही थीं. जब बातों-बातों में बात छिड़ी तो उन्होंने इस पूरे संग्रह के बारे में अपने अनुभव बताए," मेरे पिताजी दस वर्षों तक बर्मा में रहे थे और वे भारत जाते थे ब्रिटिश राज के दौर में. तो मुझे काफ़ी रुचि रही है भारत में. दिल्ली दरबार की तस्वीरें देखी थी पहले मैने पर असल में ये कैसा रहा होगा ये जिज्ञासा हमेशा रही है मन में. बड़ा रोमांचक है वो दृश्य. विश्वास नहीं होता कि पचास हज़ार सैनिक थे ताजपोशी के समय. फिर खेतों में बैलों से खेत जोतते किसान, ये सब तरीके तो अब बंद ही हो गए हैं." जोधपुर के महाराजा के कुछ निजी वीडियो की कलेक्शन भी इस संग्रह में मौजूद है जो तीस के दशक में राजसी ठाठ-बाठ की तस्वीर पेश करता है. इसमें शाही शिकार करते, पोलो खेलते लोग और शाही परिवार में हुई शादी की शानो-शौक़त झलकती है. कैसा था भारत राजा-रजवाड़ों से दूर चंद ऐसे वीडियो भी हैं जो आम लोग की सीधी-सादी ज़िंदगी को दर्शाते हैं. 'पैनोरामा ऑफ़ कैलकटा' नाम का एक मिनट का ब्लैक एंड व्हाइट वीडियो इस संग्रह का सबसा पुराना वीडियो है. वर्ष 1899 का ये वीडियो एक नाव से लिया गया है और घाट पर आते-जाते,स्नान करते लोगों को दिखाता है. हालांकि वीडियो के साथ लिखा गया है कि ये बात स्पष्ट नहीं है कि घाट कोलकाता के हैं या बनारस के. लोगों से अनुरोध भी किया गया है कि अगर कोई शहर पहचान सकता हो तो ब्रिटिश फ़िल्म इंस्टीट्यूट को ज़रूर बताए. साथ ही 1925 में बना एक अन्य वीडियो बेहद दिलचस्प है जिसमें पंजाब के एक गाँव को दिखाया गया है. बैलों से खेत जोतते किसान, फसल काटते लोग और घर के चूल्हे में खाना बनाती महिलाएँ- 20 के उस दशक में लोग कैसे काम करते होंगे और उनके रहन-सहन को लेकर ये वीडियो आपको कल्पना की उड़ान पर ले जाता है. वहीं 1941 का एक दिलचस्प वृत्तचित्र है जिसे बिमल रॉय ने बनाया है. उस समय वे बतौर फ़िल्मकार मशहूर नहीं हुए थे. इसमें दिखाया गया है कि टीन के डिब्बे कैसे बनाए जाते हैं और ये डिब्बे गाँव के जीवन का कितना अहम हिस्सा थे. बीएफ़आई का ये आयोजन 30 सिंतबर तक चलेगा. |
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