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तीन करोड़ रुपए में नीलाम हुआ कैमरा | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक कैमरा खरीदने के लिए आप कितनी की़मत देने के लिए तैयार हैं? वियना में एक अज्ञात व्यक्ति ने एक विशेष कैमरा तीन करोड़ रुपए में खरीदा है. कैमरा विशेष इस मायने में है कि ये दुनिया के सबसे पुराने कैमरों में से है. ये डागयुरोटाइप कैमरा 1839 में एक फ़्रेंच कंपनी सुज़े फ़्रेरेस ने बनाया था और यह जर्मनी के म्यूनिख शहर में मिला था. अब इसे वियना के नीलामघर में बेचा गया. दुनिया भर में लोगों ने इस कैमरे के लिए बोली लगाई थी. एक विशेषज्ञ का दावा है कि सुज़े फ़्रेरेस कंपनी का बना हुआ ये एकमात्र कैमरा बचा है. वियना नीलामघर के प्रमुख ने कहा है कि उन्हें यकीन है कि ये कैमरा फ़ोटोग्राफ़ी के शुरूआती दौर का है. डागयुरोटाइप नाम उस व्यक्ति के नाम पर रखा गया है कि जिन्होंने इस पद्धति की खोज की थी. अन्य फ़ोटोग्राफ़िक पद्धतियों से अलग डागयुरोटाइप में नेगेटिव की जगह पॉज़िटिव छवि विकसित की जाती है. इसमें दोबारा फ़ोटो विकसित करने का विकल्प नहीं था. फ़ोटोग्राफ़ी के शुरुआती दौर में ये तरीका काफ़ी लोकप्रिय था और पोर्टरेट बनाने के लिए इसे अनुकूल माना जाता था. माना जाता है कि 1840 में अब्राहम लिंकन का पहला चित्र डागयुरोटाइप कैमरे से ही लिया गया था. आज की तारीख़ में कुछ ही लोगों के पास डागयुरोटाइप कैमरे ठीक-ठाक स्थिति में बचे हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें अजी हम से छुपकर कहाँ जाइएगा...04 अप्रैल, 2007 | पहला पन्ना बीबीसी की फ़ोटो प्रतियोगिता02 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस हबल का मुख्य कैमरा बंद हुआ30 जनवरी, 2007 | विज्ञान कैमरों की जगह कैमराफ़ोन06 जून, 2006 | विज्ञान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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