|
महेश 'अश्क' की गज़लें | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
न मेरा जिस्म कहीं औ' न मेरी जाँ रख दे मेरा पसीना जहाँ है, मुझे वहाँ रख दे बगूला बन के भटकता फिरूँगा मैं कब तक बिदक भी जाते हैं, कुछ लोग भिड़ भी जाते हैं वो रात है, कि अगर आदमी के बस में हो जो अनकहा है अभी तक, वो कहके देखा जाए *************** अब तक का इतिहास यही है, उगते हैं कट जाते हैं तुम्हें तो अपनी धुन रहती है, सफ़र-सफ़र, मंज़िल-मंज़िल लोगों की पहचान तो आख़िर, लोगों से ही होती है हम में क्या-क्या पठार हैं, परबत हैं और खाई है अपने-अपने हथियारों की दिशा तो कर ली जाए ठीक ***************
यहीं एक प्यास थी, जो खो गई है जो हरदम घर को घर रखती थी मुझमें हवा गुज़री तो है जेहनों से लेकिन दिया किस ताक़ में है, यह न सोचो *************** महेश अश्क, |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||