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शुक्रवार, 09 मार्च, 2007 को 03:08 GMT तक के समाचार
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..ताकि दोनों क़ौमों में दूरियाँ ख़त्म हों
क़ुरान
रवींद्र जैन इससे पहले सामवेद और जैन धर्म पर भी काम कर चुके हैं
सत्तर के दशक में फ़िल्म ‘काँच और हीरा’ से अपना फ़िल्मी संगीत सफ़र शुरू करने वाले रवींद्र जैन को क़ुदरत ने दुनिया देखने का सुख तो नहीं दिया लेकिन इसके बावजूद उन्होंने वह सब कुछ हासिल किया जो किसी भी सामान्य व्यक्ति के लिए पाना आसान नहीं होता.

चित चोर, दुल्हन वही जो पिया मन भाए, अँखियों के झरोखे से और राम तेरी गंगा मैली जैसी सुपर हिट फ़िल्मों को अपने संगीत से सजाने वाले और सौ से ज़्यादा फ़िल्मों की धुनें बना चुके रवींद्र जैन को हिंदी के साथ ही बांग्ला, संस्कृत, उर्दू और अंग्रेज़ी भाषा में महारत हासिल है.

आजकल वो क़ुरान के हिंदी-काव्य अनुवाद के काम लगे हुए हैं. उनसे बात की सूफ़िया शानी ने. पेश हैं इसके मुख्य अंश.

सुना है आप क़ुरान की आयतों पर काम कर रहे हैं. किस तरह का है यह काम और कहाँ तक पहुँचा?

हाँ.. यह बड़ा काम मैंने शुरू किया है और हर रोज़ शाम को मैं क़ुरान की आयतों को तर्जुमे (अनुवाद) के साथ सुनता हूँ. अब तक उन्नीस सिपारे हो चुके हैं और ग्यारह बचते हैं.

आपके इस काम का उद्देश्य क्या है और आप इसे किस तरह अंजाम दे रहे हैं?

उद्देश्य तो बहुत साफ़ है कि जो दोनों क़ौमों (हिंदू-मुसलमान) में तनाव और दूरी है वह ख़त्म हो. और जहां तक इस काम के अंजाम का सवाल है, मैं क़ुरान की आयतों के तर्जुमे को सरल भाषा के साथ कविता की शक्ल में ढाल रहा हूँ ताकि आम आदमी इसे आसानी से समझ सके.

मिसाल के तौर पर... सूरे अल्हम्द में अल्लाह ने ख़ुद को कहा है रब्बुलआलमीन (मुसलमीन नहीं). गोया कि वो सारे आलम को पालने वाला है. दरअसल रहमान और रहीम उसकी सिफ़त के नाम हैं..आला है वो अव्वल है वो.

तो इस तरह मेरी यह कोशिश है कि सारे तर्जुमे की बुनियाद पर लिखी गई कविताओं को एक किताब की शक्ल दी जाए और साथ ही इसका ऑडियो भी तैयार किया जाए.

ऑडियो में पहले क़ुरान क़िरआत (क़ुरान को एक खा़स अंदाज़ में पढ़ना) के साथ पढ़ा जाएगा फिर अनुवादित कविता होगी.

धर्म और धार्मिक ग्रंथ, ये चीज़ें बेहद संवेदनशील होती हैं,ऐसे में इस्लामी ग्रंथ को ही क्यों चुना आपने?

यह सच है कि धर्म के मामले संवेदनशील होते हैं लेकिन इससे पहले मैंने जैन धर्म और सामवेद पर भी काम किया है. उस्तादों की बंदिशों पर भी काम कर रहा हूँ और इस सबके पीछे एक ही मक़सद है कि आने वाली पीढ़ी की सही रहबरी हो सके.

क़ुदरत ने नाइंसाफ़ी की आपके साथ. लेकिन फिर भी आपने संगीत में एक मुका़म हासिल किया है. इस लंबे सफ़र में किस तरह का संघर्ष करना पड़ा आपको.

इसका जवाब में इन बोलो में देना चाहूँगा-

कर्म भूमि पर फल के लिए
श्रम सबको करना पड़ता है,
रब सिर्फ़ लकीरें देता है
रंग हमको भरना पड़ता है.

संघर्ष किसे नहीं करना पड़ता. लेकिन हमें अपने काम से अपने आपको साबित करना पड़ता है. वह भी उस दौर में जबकि बड़े-बड़े फ़नकार मौजूद हों, तो थोड़ा मुश्किल तो होता ही है.

सुना है कि आपको येसुदास की आवाज़ इतनी अधिक पंसद है कि अगर आप सबसे पहले किसी को देखना चाहेंगे तो वो येसुदास ही होंगे?

यह सच है कि येसुदास की आवाज़ में माइक टोनल क्वालिटी है और दूसरी ख़ासियत है नॉर्थ और साउथ दोनों शास्त्रीय संगीत की गहराई, गंभीरता और कड़ा रियाज़ जो उनकी आवाज़ में झलकता है. और यही सब खूबियाँ हम संगीतकारों को चाहिए होती हैं.

आपने फ़िल्मी दुनिया में एक लंबा सफ़र तय किया है. अब नए नए संगीतकार आ रहे हैं. नए अंदाज़ आ रहे हैं. तो बदलते हुए वक़्त के साथ अपने आपको कैसे ढालते हैं?

हमेशा यह ख़्याल रखना पड़ता है कि हम वक़्त से पीछे न रह जाएँ. हर परिवर्तन को स्वीकारते हुए अपनी क्षमताओं को वक़्त के हिसाब से बढ़ाना होता है.

मैं आज भी सीखने की कोशिश करता हूँ और जिज्ञासा को अपने भीतर हमेशा ज़िंदा रखता हूँ.

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