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अल्यूमिनियम पर उकेर दी पूरी क़ुरान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अल्यूमिनियम के पत्तर पर पूरी कुरान खोदने वाले मिराज हुसैन कहते हैं कि उन्हें इसकी प्रेरणा मुंबई के भिंडी बाज़ार से मिली थी. उन्हें अल्यूमिनियम के बर्तनों पर नाम खुदते देखकर लगा था कि इस हुनर का इस्तेमाल क़ुरान को किसी धातु के पत्तर पर उकेरने के लिए भी किया जा सकता है. उस दिन की प्रेरणा ने अब रूप ले लिया है अल्यूमिनियम के 230 पन्नों पर कुरान के तीसों पारों की मौजूदगी के तौर पर. करीब 22 किलोग्राम वजन की अल्यूमिनियम पर उकेरी गई मुस्लिमों की यह पवित्र किताब अब मिराज हुसैन के घर में मौजूद है. जो कोलकाता के मटिया बुर्ज इलाके में पड़ता है. भोपाल में तकरीर करने आए मौलाना मिराज हुसैन ने बताया कि इस काम में उन्हें काफी जद्दोजहद करनी पड़ी. जैसे अल्यूमिनियम के पन्नों का साइज क्या हो? अक्षर कैसे लिखे जाएं जो पढ़े जाएँ लेकिन सुंदर भी हों वगैरह.
पन्ने तैयार करने के लिए उन्होंने अल्यूमिनियम के रोल बाज़ार से खरीदे और कुछ तज़ुर्बो के बाद उसे 12 गुना 10 इंच के आकार में काट लिया साथ ही साथ पन्नों पर हाशियों के लिए लकीरें भी बनवाई. पन्नों पर लिखने के लिए उन्होंने बर्तनों पर नाम लिखने वाली बिजली से चलने वाली मशीनों का इस्तेमाल किया और फिर अल्यूमिनियम के हर एक पन्ने पर 29 लाइनें लिखी गईं. मौलाना मिराज हुसैन को अब लगता है कि किसी देश की सरकार उनसे कुरान की यह कापी ले ले और इसे किसी ऐसी जगह रखे जहाँ लोग उनके हुनर को देख पाएँ. वह इसे किसी एक आदमी या परिवार को नहीं देना चाहते हालाँकि उनका इरादा इस कला को खानदान के दूसरे लोगों को सिखाने का है या फिर किसी ऐसे शख्स को जिसे इस हुनर को सीखने में दिलचस्पी हो. वे बताते हैं कि कुरान को तैयार करने में जो भी रक़म खर्च हुई है, वह उन्होंने अपने पास से ही लगाई है. |
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