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बुधवार, 29 सितंबर, 2004 को 17:08 GMT तक के समाचार
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बिस्मिल्लाह के पाँच हज़ार से अधिक रूप

प्रदर्शनी
हाशिम अख़्तर के 18 वर्षों की मेहनत का परिणाम है यह प्रदर्शनी
लखनऊ के नवाबों की डेढ़ सौ साल पुरानी बारादरी दो दिनों के लिए सजीव हो गई जब एक मशहूर कातिब ने अपनी अठारह साल की मेहनत से तैयार एक अनोखी प्रदर्शनी यहाँ लगाई.

कलात्मक लिखाई के लिए मशहूर एक कातिब ने कुरान की पहली आयत 'बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम' (शुरू करता हूँ उस अल्लाह के नाम से जो अत्यंत दयावान और करूणामय है) को पाँच हज़ार दो सौ छियासी तरीक़ों से लिखा है.

कातिब हाशिम अख़्तर नक़वी सिंचाई विभाग में नक्शानवीस हैं और पुराने लखनऊ में रहते हैं.

कलात्मक लेखन (कैलिग्राफ़ी) का हुनर उन्होंने अपने पिता हसन अख़्तर से विरासत में मिला लेकिन वे उनसे सीख नहीं पाए क्योंकि जब पिता की मौत हुई तो हाशिम सिर्फ़ दो वर्ष के थे.

धुन

शुरूआत कुछ इस तरह हुई कि इस्लाम के नामी विद्वान कल्बे आबिद ने उन्हें 786 बार बिस्मिल्लाह लिखने की सलाह दी, मौलाना की सलाह पर एक लिखना शुरू किया तो लिखते ही चले गए.

 इस प्रदर्शनी के लिए स्पॉन्सर इसलिए नहीं मिले क्योंकि इस काम में कहीं से कमाई होने की उम्मीद उन्हें नहीं दिखी
हाशिम अख़्तर

लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स में तो हाशिम अख़्तर का नाम आ चुका है अब गिनीस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने की तैयारी है.

बिस्मिल्लाह के यही पाँच हज़ार से अधिक रूप बारादरी में प्रदर्शनी बनकर सजे हैं, कहीं फूल, कहीं पेड़, कहीं बादल तो कहीं तलवार बनकर, मगर हर बार ध्वनि वही, शब्द वही, अर्थ वही.

हाशिम की पत्नी शहाना नक़वी गुड़िया बनाने वाली बेहतरीन कलाकार हैं और उन्होंने अपने पति की भरपूर मदद की, वे कहती हैं, "एक कलाकार होने के नाते मैंने रंगों वगैरह के बारे में कुछ सुझाव दिए."

ख़ासियत

इस प्रदर्शनी के बारे में ख़ुद हाशिम कहते हैं, "सारे डिज़ाइन एक दूसरे से अलग हैं, मैंने डिज़ाइन हिंदुस्तानी और विदेशी लिपियों के स्टाइल में बनाए हैं लेकिन लिखा वही है--बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम. मैंने उनको ऐसा मोल्ड दिया है वे देखने में हिंदी लगते हैं लेकिन वो हैं उर्दू में ही."

प्रदर्शनी
प्रदर्शनी के लिए कोई प्रायोजक नहीं मिला

प्रदर्शनी को देखने के लिए बड़ी तादाद में लोग आए और तारीफ़ भी बहुत हुई लेकिन हाशिम अख़्तर को अफ़सोस है कि इस आयोजन का ख़र्च उठाने के लिए कोई प्रायोजक नहीं मिला लेकिन शहर के एक डेकोरेटर शमील शम्सी ने इस काम में उनकी मदद की.

हाशिम अख़्तर कहते हैं कि "इस प्रदर्शनी के लिए स्पॉन्सर इसलिए नहीं मिले क्योंकि इस काम में कहीं से कमाई होने की उम्मीद उन्हें नहीं दिखी."

टेलीफ़ोन विभाग में काम करने वाले मोहसिन रिज़वी इस कलाकारी को देखकर गदगद हो उठे, "यह तो अल्लाह का उपहार है, ऐसा बनाना आम आदमी के बस की बात नहीं है."

टेलीविज़न प्रोड्यूसर रिज़वाना सैफ़ ने कहा, "मैंने अब तक बिस्मिल्लाह दो तरीक़े से लिखा देखा था, एक संख्या रूप में 786 और दूसरा अरबी लिपि में."

हाशिम अख़्तर को इस काम के लिए जितनी वाहवाही मिली उससे उनकी 18 साल की लगन और मेहनत सार्थक हो गई, अब शायद वह दिन दूर नहीं जब गिनीस बुक में भी उनका नाम आ ही जाए.

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