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शुक्रवार, 07 नवंबर, 2003 को 16:49 GMT तक के समाचार
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पाकिस्तानी महिलाएँ इस्लाम की ओर

डॉक्टर फरहत हाशमी
फ़रहत हाशमी ने कई जगह पर इस्लाम के बारे में जानकारी देने की व्यवस्था की है

पाकिस्तान में शिक्षित और सम्पन्न वर्ग की महिलाएँ इस्लाम को समझने के लिए बड़ी संख्या में आगे आ रही हैं.

इसे पाकिस्तान में धार्मिक क्षेत्र में महिलाओं के इस्लाम को समझने की क्रांति के रूप में देखा जा रहा है.

उन्हें इस्लाम का अध्ययन करने की प्रेरणा मिली है डॉक्टर फ़रहत हाशमी से, जो क़ुरान को आज के संदर्भ में लोगों तक पहुँचाने में जुटी हैं.

कराची की एक महिला नायिला शाहिद का कहना है कि बहुत सारी अन्य मुसलमान महिलाओं की तरह वे भी इस्लाम के बारे में हमेशा विस्तार से पढ़ना चाहती थीं.

लेकिन उनका कहना है कि जब वे मौलवियों को स्वर्ग-नरक और पर्दा आदि के बारे बोलते सुनती थीं तो उनकी इस विषय में दिलचस्पी लगभग ख़त्म हो जाती थी.

मगर अब ये दिलचस्पी बढ़ती जा रही है.

महिलाएँ आगे आईं

डॉक्टर हाशमी ने महिलाओं को इस्लाम पर जानकारी देने के लिए कई संस्थाएँ खोलकर महिलाओं के लिए इस्लाम को समझना आसान बना दिया है.

 हम इस्लाम के बारे में बहुत ही व्यावहारिक और सही-सही जानकारी देते हैं

डॉक्टर फ़रहत हाशमी

उनका कहना है, "हम इस्लाम के बारे में बहुत ही व्यावहारिक और सही-सही जानकारी देते हैं."

शनिवार को कराची में 'अल-हुदा इंस्टीट्यूट ऑफ़ इस्लामिक एजुकेशन फ़ॉर विमेन' में बहुत सारी महिलाएँ देखी जा सकती हैं.

डॉक्टर हाशमी ने जब जनता के लिए सार्वजनिक तौर पर कराची में एक अध्ययन शिविर लगाया तो लगभग दस हज़ार महिलाओं ने इसमें भाग लिया.

पिछले साल 1200 महिलाएँ उनके क़ुरान अनुवाद के कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आगे आईं.

मरियम आसिफ़ जो 17 वर्ष की हैं, मानती हैं कि इस्लाम को विस्तार से पढ़ने से उन्हें पता चला है कि सत्य और मात्र बयानबाज़ी में क्या अंतर है.

उनका कहना है, "लोग तो इतनी बातें करते हैं जिन्हें सुनकर ये मानना मुश्किल होता है कि यही इस्लाम है."

इस्लाम का अध्ययन
कराची में इस्लाम के अध्ययन के लिए चल रही एक कक्षा

कराची में एक प्रकाशक रुख़साना यामीन कहती हैं कि उनका अपने धर्म के बारे में ज्ञान इतना सीमित इसलिए हैं क्योंकि वे जब भी इस्लाम पर किताब उठाती हैं तो अपनी दिलचस्पी बरक़रार नहीं रख पातीं.

लेकिन फिर ये महिलाएँ इस्लाम का अध्ययन करने की ओर आकर्षित कैसे हुईं?

नया ढंग, व्यावहारिक अध्ययन

डॉक्टर हाशमी महिलाओं को इस्लाम आधुनिक तकनीक, नए ढंग और रोज़मर्रा के जीवन से जोड़कर पढ़ाती हैं.

एक शिक्षक हुमा हुसैन क़ुरान का अनुवाद कर 'मल्टीमीडिया' के ज़रिए बड़ी स्क्रीन पर महिलाओं को समझाती हैं.

डॉक्टर हाशमी का कहना है कि उन्हें नहीं पता कि इतनी संख्या में महिलाएँ उन्हें सुनने क्यों आती हैं.

उनका मानना है कि लोग धर्म की ओर तब आते हैं जब उन्हें जीवन में निराशा का सामना करना पड़ता है.

 महिलाओं का अपने कपड़ों और कॉफ़ी पार्टियों से मन भर गया है इसलिए अब वे धर्म की ओर झुक रही हैं

कराची की रज़िया लतीफ़

पूर्व राष्ट्रपति ज़िया-उल-हक़ के इस्लाम को राजनीति में लाने के रवैये पर वे कहती हैं. "पाकिस्तानियों की आशाएँ पिछले पचास साल से पूरी नहीं हुई हैं. राजनीति में इस्लाम को लाने के बाद भी लोगों की मुश्किलें हल नहीं हुई हैं."

उनका कहना है कि लोग सही राह खोजते हैं.

वे कहती हैं, "मैं चाहती हूँ कि दूसरे लोग भी उसी शांति को अनुभव करें जो क़ुरान पढ़कर मुझे मिली थी."

लेकिन महिलाओं के इस्लाम की ओर आकर्षण के बारे में डॉक्टर हाशमी के विचारों से सब लोग सहमत नहीं हैं.

रज़िया लतीफ़ कहती हैं, "महिलाओं का अपने कपड़ो और कॉफ़ी पार्टियों से मन भर गया है इसलिए अब वे धर्म की ओर झुक रही हैं."

उन्हें निराशा है कि ये महिलाएँ समाज सेवा या हस्पतालों में काम करने के लिए तैयार नहीं हैं.

उनका कहना है कि ताज़ा घटनाओं से महिलाएँ फिर पर्दे के पीछे छिप जाएँगी.

रज़िया लतीफ़ और उन जैसी अन्य महिलाओं को डर है कि ये तालेबान के शासनकाल के दौरान जो स्थिति पैदा हुई थी वैसी ही स्थिति उत्पन्न करने की ओर पहला क़दम हो सकता है.

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