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रंगसाज़ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वह हर रोज़ साड़ियों पर रंग चढ़ाने के लिए नदी के किनारे जाता है. रंग चढ़ाने के बाद जब वह उन साड़ियों को धूप में रखता है और हवा चलती है तो साड़ियाँ हवा में लहराती हैं. तब लगता है कि प्रकृति रंगों का खेल खेल रही है. चाँद, सितारे, मौसम, समय- सब रंगों का खेल ही तो खेलते हैं. सच तो यह है कि जीवन भी रंगों का खेल ही तो है. रिश्तों के रंग, नातों के रंग, प्यार के रंग, घृणा के रंग, यही खेल खेलने के लिए अवतार और पैग़म्बर दुनिया में आए हैं. यह रंगों का खेल कितना हसीन है. लगता है प्रकृति का मालिक भी रंगों का खेल, खेल रहा है. जीवन और मृत्यु के रंग को चढ़ाकर मनुष्य को संसार में भेज देता है. रंगों के इस खेल का शिकार आँखें ही तो हैं और इसी खेल में आँखों के साथ धोखा हो जाता है. जिस सूर्य के प्रकाश को आँखें जिस रंग में वस्तु को देखती हैं. वह ही इसमें नहीं होता. आश्चर्यजनक बात तो यह है कि जब रंग ज़्यादा हो तब भी यह धब्बा बन जाता है और जब कम हो तब भी धब्बा बन जाता है. गली की औरतें लहराती हुई आती हैं और साड़ियाँ यूँ फैंकती हैं जैसे उन साड़ियों के साथ कामनाएँ और इच्छाएँ भी उनके साथ फेंक रही हों. जो रंगों के साथ ग़लत-मलत हो जाती हैं. रंग कितने महान हैं जो हर चीज़ को बदल देते हैं. सुंदर लड़कियाँ हसीन क्षणों को साड़ियों के रंगों के अंदर समा लेती हैं और फिर अनकही कहानियों को अनसुनी कथाओं में बदल कर रंगों के साज़ के साथ यूँ गाया जाता है जैसे रंग गाए जाते हैं. जो सुनाई ज़रूर देते हैं परंतु जिनमें शब्द नहीं होते. रंगों की कहानी भी शब्दों से जुदा नहीं है. शब्द जिसका अपना कोई रंग नहीं परंतु हर चीज़ को रंग देते हैं. बूढ़े इसी रंगसाज़ की दुकान पर बैठकर औरतों की साड़ियों पर आलोचना करते हैं. इससे साड़ियों व औरतों का ज़िक्र ज़ुबान पर आता है. और बुढ़ापे का मापदंड भी बना रहता है. लड़कपन का वस्त्र ओढ़ मनचले लड़के साड़ियों को रंगने में उसकी सहायता करते हैं और साड़ियों को छूते हुए लड़कियों का नाम ज़ुबान पर लाते हैं और रंग से मित्रता भी निभाते हैं. ‘‘यह नर्मदा साड़ी है.’’ एक नौजवान ने कहा जिसने 17 वर्ष के कपड़े पहने हुए थे और उस पर इच्छाओं का रंग अच्छा लगता है. दूसरे ने कहा,‘‘कृष्णा की साड़ी को अच्छी तरह रंगना. वह कह गई थी कि रंग ज़रा पक्का रखना.’’ ‘‘आशा लाल साड़ी पहने जब बाग़ में फूल तोड़ेगी तो लगेगा कि जैसे चाँद अम्बर में सैर कर रहा है.’’ ‘‘शारदा की साड़ी अच्छी तरह रंगना.’’ हर चीज़ का मरना ही इसका जीना है. 18 वर्ष के सीधे-सीधे नौजवान ने होंठ खोले तो लगा जैसे मरुस्थल समंदर का ज़िक्र कर रहा है. लड़कपन के वर्ष अपने ही में उलझे रहते हैं. जो लोगों को उम्र से इस समय अलग किए होते हैं. जब जीवन के 18वें और 19वें वर्ष फूलों की तमन्ना के बदले काँटों के आँगन में चोर-सिपाही का खेल खेलते हैं और फिर इस खेल में प्यार चोर और सौंदर्य सिपाही बन जाता है और इसी खेल में इच्छाएँ चोरी हो जाती हैं. इच्छाएँ लुट जाती हैं. यह वह इच्छाएँ हैं जो उन्होंने एक-दूसरे से छुपा कर रखी होती हैं. अतः इनकी चोरी का एक-दुसरे से ज़िक्र भी नहीं कर सकते क्योंकि उनके होने या न होने का कोई प्रमाण नहीं होता. यही बात है कि सारी बस्ती के लोगों की उम्र चोरी हो गई है और यह सिर्फ़ अपने सिद्धांतों को चारों ओर से मज़बूती से पकड़े हुए हैं. मगर एक दिन मौसमों ने समय से चाल करके उन्हीं चादरों में इन्हें लपेट लिया जिसमें उनके सुंदर क्षण भी मर गए. ‘‘सुरैय्या को शर्म नहीं आई लाल साड़ी पहनते हुए’’ एक बूढ़े ने कहा. ‘‘दूसरे बूढ़े ने कहा, शामा को आसमानी साड़ी पहनते हुए लज्जा नहीं आती विशेषकर हम बूढ़े लोगों के सामने चलते हुए.’’ उम्र के भाग जाने के बाद इच्छाओं का जाल आदमी को यूँ जकड़ता है जैसे मछुआरे का जाल मछलियों को निकालता है. उम्र एक दरिया है और आदमी मछली और समय मछुआरा, मछलियों को निकालता रहता है. दरिया कभी कुछ नहीं करता क्योंकि इसके पानी को एक दिन समंदर में मिल जाना है. कभी रंगसाज़ को यूँ लगता है जैसे रंग नहीं बल्कि वह ख़ुद साड़ियों पर चढ़ रहा हो. एक दिन निर्मला ने अपनी साड़ी रंगसाज़ की तरफ बढ़ाई और कहा कि उस पर अच्छा से रंग चढ़ा दो. ऐसा करते हुए निर्मला की उंगलियाँ रंगसाज़ की उंगलियों से छू गईं. यूँ लगा जैसे सृष्टि सितारों से उनका रंग निचोड़ कर धरती के फूलों को रंग रही हो और शबनम ने फूलों को ठंडक तो दी हो मगर शरीर में जलन पैदा कर दी हो. सिलसिला जारी होने लगा. इसी दिन बाढ़ आई और रंगसाज़ की रंगी हुई सारी साड़ियों को बहा कर ले गई. प्रातः निर्मला आई और पूछने लगी,‘‘मेरी साड़ी का क्या हुआ. हर दिन निर्मला आती और अपनी साड़ियों के बारे में पूछती, मगर सच तो यह है कि निर्मला की साड़ी सैलाब में बही न थी वह तो रंगसाज़ ने छुपाकर रखी थी और लगता था कि उसने निर्मला की साड़ी को नहीं बल्कि स्वयं निर्मला को भी छुपाकर रखा था. वह सपना देखने लगा रंगों का. उसे ऐसा लगा कि रेत के पहाड़ सबसे मज़बूत हैं और मरुस्थलों के अंदर पानी के टापू हैं, फिर वह ख़ुद ही निर्मला के घर जाने लगा और हर दिन जाकर कहता-’’ होली का त्यौहार आया और रंग खेलने का खेल आरंभ हो गया. रंगसाज़ भी खेल खेलने लगा. सुबह होते ही निर्मला के घर चला गया. उसने निर्मला पर रंग फेंका. निर्मला के बाप ने कहा,‘‘न ज़ात मालूम है और न धर्म और रंग फेंकने के लिए आ गया.’’ मगर रंगों का न तो कोई धर्म है और न ज़ात, यह तो बस रंग हैं. इधर निर्मला की आँखों के कई रंग बदले. उसने रंगसाज़ की तरफ देखा रंगों का खेल, आँखों के खेल में बदल चुका था और आँखें सपनों की दुनिया में एक न समाप्त होने वाली यात्रा की तैयारी में जुट गईं. रिश्तों के पहाड़ उन्हें रेत के कण नज़र आए और रस्मों की हथकड़ियाँ, कच्चे धागों की डोरियाँ. रंगसाज़ ने निर्मला के बदन पर जो रंग फेंका था उसका रंग नीला था. नीले रंग में निर्मला उसे यूँ लगती थी जैसे आसमान ज़ुबान पर हो और चाँदनी की देवी हाथ में चमकते हुए सितारों की थाली लिए हवाओं के परों के ऊपर प्यार के उन फूलों को तोड़ने के लिए जा रही हो जिनसे 16वें वर्ष की सुगंध आती है.
इसी दिन निर्मला के पिता को मालूम हो गया कि रंग अपना रंग दिका चुके हैं. घर वालों ने आदेश दिया कि वह आज के बाद रंगसाज़ के पास साड़ी रंगवाने के लिए नहीं जाएगी और न ही अपनी साड़ी के बारे में मालूम करेगी. दूसरे दिन निर्मला उसकी दुकान पर नहीं गई. दूसरी लड़कियों ने रंग चढ़ाने के लिए साड़ियाँ उसकी दुकान पर रखीं. रंगसाज़ ने सबके लिए नीली साड़ियाँ बनाना आरंभ कर दीं. वह उन सभी साड़ियों पर नीला रंग चढ़ाता ही गया. उसने गली के धर्मपाल से कहा कि एक बार निर्मला से कहो कि सुबह दस बजे मुझे मिले. धर्मपाल ने ऐसा ही किया और निर्मला ने भी मिलने का वादा कर ही दिया. रंगसाज़ को मालूम था कि सुबह दस बजे निर्मला मिलेगी इसलिए वह रात भर सो न सका. साड़ियाँ रंगता रहा. मगर आश्चर्य की बात तो यह है कि उन सभी पर नीला रंग चढ़ा रहा था. सुबह लड़कियों का झुरमुट आया और कहने लगा,‘‘तुमने यह क्या किया सब साड़ियों को नीले रंग में रंग दिया.’’ परंतु वह ख़ामोशी से उन लड़कियों को देखता रहा. यूँ लगा कि जैसे पत्थर बन गया हो. अब वह दुकान के अंदर रहने लगा. हर रोज़ सुबह दस बजे की प्रतीक्षा करने लगा. मगर जिस समय की उसे प्रतीक्षा थी वह घड़ियों की सुईयों में क़ैद थी. उसने दिल में सोचा. काश यह मौसम दिन-घंटे समय को क़ैद न करते और समय आज़ाद दरिया की तरह बहते हुए मिलता. वह हर चीज़ को नीला करने लगा. दूसरे सभी रंगों से उसने घृणा का ऐलान किया. उसका चेहरा ढलने लगा और ढलते-ढलते वह ढल ही गया. वह नीले रंग में इतना खो गया कि एक दिन उसने अम्बर में उड़ने की इच्छा की ताकि सभी नीले रंग को समेट कर निर्मला की साड़ी को रंग दे. समय ने कभी भी किसी की प्रतीक्षा नहीं की. बात यहाँ तक आ पहुँची है कि वह नीला रंग पीता और नीले रंग के कपड़े पहनता मगर नीला रंग पीने से उसका चेहरा पीला हो गया. उसके हाथ-पाँव पीले हो गए. उसकी आँखें पीली गो गईं. सच तो यह है कि उसे पीले रंग से नफ़रत थी. बचपन से ही वह पीले रंग को नहीं चाहता था. इसी दिन उसने अनुभव किया कि प्रकृति आदमी से कितना बड़ा खेल खेतती है. जब वह नीला रंग माँगता है तो उसे पीला दिया जाता है. जब गुलाबी की इच्छा करता है तो लाल रंग उसके आगे रख दिया जाता है. अतः जीवन जीवन पर उसका अधिकार क्या है? मौसम के हाथों में बंदी है और समय ख़ुद गुलाम है. एक जीवन मिला है और जीने पर हज़ार तरह की रुकावटें. आँखें हैं मगर रगों पर अधिकार किसी और का. कान मिले मगर आवाज़ किसी और के बस में. रंगसाज़ पीला हो गया और फिर गली-गली घूमने लगा और घूमता ही रहता और लोगों से कहता-निर्मला दस बजे आएगी. निर्मला को घर की चार दीवारी में बंद कर दिया गया ताकि उसे दस बजे का पता न लग सके. उसके चेहरे की धूप को हवा ने चूसना प्रारंभ किया और शरीर के उभार बोझ अनुभव होने लगे. उसे लगा कि समय गति को आगे ले जा रहा है. मगर उसके कदम पीछे जा रहे हैं. दिन-रात वह समय से पूछती कि तू गिनती में बंद क्यों है. उसे लगा कि यहाँ पर हर चीज़ बंदी हुई है. कोई सुंदरता में क़ैद है और कोई असुंदरता में क़ैद है. दुनिया एक बंदीखाना है. भावनाएँ शब्दों में बंद हैं. इच्छाएँ धर्मों की गुलाम हैं और जीवन के सुंदर वर्ष जातियों एवं वर्गों की चादरों में बंद हैं. निर्मला का शरीर सूखने लगा. वायु और सूर्य यह सब कुछ देख रहे थे. उन्होंने चीखकर कहा कि निर्मला निर्दोष है. सारी बस्ती जानती है कि निर्मला का दोष नहीं मगर बावजूद अब सज़ा भुगत रही है. वह दीवारों से पूछती है कि दस कब बजेंगे. एक दिन ज़ोर का तूफान आया. गाँव वालों को अपना जीवन खतरे में दिखाई देने लगा, वायु ज़ोर से चलने लगी जैसे आज कुछ भी न बचेगा, तूफान इतना तेज़ होने लगा जैसे घर बिखर जाएंगे, लोग भागने लगे. रिश्ते कागज़ की कश्तियों में दिखाई देने लगे और वायदे कच्चे धागों की तरह टूट गए. घर बसाने की इच्छाएँ दब गईं रिश्ते टूट गए. फिर समझ इस बात की भी नहीं आई कि लोग झूठ क्यों बोलते हैं? शताब्दियों का साथ निभाने की बातें क्यों करते हैं. जबकि उन्हें मालूम है कि उन्होंने क्षणों में अलग हो जाना है. निर्मला का पिता भूल गया कि वह एक पिता है. वह भी साधारण लोगों की तरह ही भागा. न रस्मों की परवाह न धर्मों की रक्षा. सब लोग विचारों, संबंधों को तोड़ कर भागे. ऐसा लगा कि कह रहा हो कि अगर जीवन बच गया तो रिश्ते बच जाएंगे. नए धर्म तलाश कर लिए जाएंगे. लोग भाग गए और सोचने लगे कि यह क्यों हुआ. तूफान क्यों आया. घर क्यों टूटे. चूंकि निर्मला पर अत्याचार हुए. इसलिए तूफान आया. दूसरे व्यक्ति ने कहा क्षमा माँगनी चाहिए. क्षमा माँगने का सबसे अच्छा ढंग यही है कि निर्मला को छोड़ देना चाहिए. एक व्यक्ति ने बल देकर कहा कि तूफान थमते ही हम ऐसा करेंगे. कुछ देर के बाद तूफान थम गया. लोगों ने राहत महसूस की. सबके सब गाँव की तरफ चल पड़े. पराजय आँखों में थी. मगर पराजित होना नहीं चाहते थे. आँखों ही आँखों में एक योजना बना ली गई और जाते ही निर्मला को छोड़ दिया गया. निर्मला बाहर आई और पूछने लगी. एक ने कहा मगर क्या मुझे मालूम हो सकेगा कि दस बजने वाले हैं. ‘‘यदि घड़ियों की दुकान पर जाकर भी सही समय का पता न चला तो कहाँ मालूम होगा?’’ साथ वाले आदमी ने कहा मगर यहाँ पहुँचकर वह चकित रह गई कोई घड़ी दस बजा रही थी और कोई बारह. निर्मला चीखने लगी. ‘‘मुझे मालूम हो गया है 10 न बजेंगे.’’ बस्ती के लोग प्रसन्न हो गए क्योंकि निर्मला को छुड़ा कर अपने पापों का प्रायश्चित कर लिया और निर्मला रंगसाज़ से मिल भी न सकी. ****************** संपर्क- प्लॉट नं-19 | इससे जुड़ी ख़बरें तीन मौन दृश्य और एक पीला फूल23 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका कहानी- नम्रता डर रही है16 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका कहानी - आस09 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका कहानी - बुआ01 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका देखते-देखते25 जनवरी, 2007 | पत्रिका दो कलाकार18 जनवरी, 2007 | पत्रिका दरख़्त रानी11 जनवरी, 2007 | पत्रिका चश्मा05 जनवरी, 2007 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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