|
गुजरात में नहीं दिखेगी परज़ानिया | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वर्ष 2002 में गुजरात में हुए दंगों पर आधारित फ़िल्म परज़ानिया फ़िलहाल गुजरात में रिलीज़ नहीं की जाएगी. भारत में अन्य जगहों पर ये फ़िल्म शुक्रवार को रिलीज़ हो रही है. 'परज़ानिया' का विषय गंभीर होने के साथ-साथ गुजरात दंगों से जुड़ा है और ये भी एक वजह है कि फ़िल्म को शुरुआत में गुजरात में नहीं दिखाने का फ़ैसला किया गया है. हालांकि फ़िल्म के निर्देशक राहुल ढोलकिया का कहना है कि अभी किसी डिस्ट्रिब्यूटर से बात न हो पाने की वजह से ऐसा करना पड़ा है. यह फ़िल्म वर्ष 2002 के गोधरा कांड के दौरान घटी एक सच्ची घटना पर आधारित है. इससे पहले फ़िल्म फ़ना भी गुजरात में रिलीज़ नहीं हो पाई थी. 'परज़ानिया' एक मध्यवर्गीय पारसी परिवार की कहानी है, जो एक मुस्लिम बहुल इलाक़े में रहता है. कहानी का मुख्य क़िरदार साइरस है. परिवार में उसके अलावा पत्नी शर्नाज़, एक दस साल का बेटा परज़ान और छोटी बेटी दिलशाद है. कहानी इन्हीं पात्रों के इर्द-गिर्द घूमती है. परज़ान की परज़ानिया परज़ान ने अपने लिए एक काल्पनिक दुनिया बनाई है जिसके मकान चॉकलेट से बने हैं और उसमें आइसक्रीम के पहाड़ हैं और नाम रखा है परज़ानिया. वो और उसकी छोटी बहन दिलशाद बस इन्हीं दोनों की ये दुनिया है.
लेकिन अचानक एक दिन कुछ ऐसा घटता है जिसके बाद ये परिवार बिखर जाता है. दो समुदायों के बीच अचानक हुए तनाव के बीच शहर में दंगे फ़साद शुरू हो जाते हैं और इन्हीं सब घटनाओं के बीच स्कूल को गया परज़ान अचानक लापता हो जाता है. साइरस उसे ढूंढ़ना शुरू करता है लेकिन कामयाबी नहीं मिलती है. निर्देशक ढोलकिया ने पूरी फ़िल्म में उस परिवार के अपने खोए बच्चे को लेकर उभरी तकलीफ़ को पर्दे पर बखूबी उभारा है. परज़ानिया में साइरस की भूमिका में नसीरुद्दीन शाह हैं, जबकि उनकी पत्नी की भूमिका सारिका ने निभाई है और परज़ान की भूमिका में हैं मास्टर फरज़ान दस्तूर. | इससे जुड़ी ख़बरें बयान10 नवंबर, 2006 | पत्रिका तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है...05 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका गुजरात दंगों के लिए 11 को सज़ा14 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस हादसों ने अहसास दिलाया ज़िम्मेदारी का23 सितंबर, 2005 | पत्रिका गांधी-नायडू के पत्र व्यवहार पर नाटक 17 अगस्त, 2005 | पत्रिका दंगे की सादा मगर सशक्त कहानी23 फ़रवरी, 2005 | पत्रिका अब भी नहीं उबर पाए हैं लोग | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||