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गुरुवार, 05 अक्तूबर, 2006 को 12:05 GMT तक के समाचार
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तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है...

रेखांकन
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की पहली किताब 'नक्शे फ़रयादी' में एक नज़्म है, 'मुझ से पहली-सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग...' यह नज़्म जब किताब से निकल कर नूरजहाँ की आवाज़ में जगमगाई तो इसने बेपनाह शोहरत पाई.

इसमें एक पंक्ति है- 'तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है.' इस पंक्ति में आँखों की तारीफ़ ने फ़िल्म चिराग के निर्माता को वह आँखें याद दिला दीं जो उसने अपनी जवानी में कभी देखी थी और जिन्हें वह अबतक भूल नहीं पाया था.

इस फ़िल्म के गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी थे. वो ख़ुद एक अच्छे अदबी शायर थे. आज के बहुत से गीतकारों की तरह वह पेशे से ही गीतकार नहीं थे, अदब में भी बड़ा मुकाम रखते थे.

वह दूसरे की लाइन लेने से इनकार करते रहे और निर्माता इसी मिसरे पर इसरार करते रहे. मजरूह ने इस लाइन के बदले में कई लाइनें लिखीं लेकिन निर्माता के जेहन में जो आँखें छुपी थीं उसे मजरूह की कोई पंक्ति उन जैसी नहीं लगीं.

लगती भी कैसे, मजरूह उत्तरप्रदेश के सुल्तानपुर का मिज़ाज और मैयार थे और फ़िल्म के निर्माता पंजाब की हरियाली से झाँकती हुई आँखों के शिकार थे. मजबूरन उन्हें निर्माता की बात माननी पड़ी और अपनी अदबी इज्जत बचाने के लिए इस लाइन के लिए फ़ैज़ से इजाज़त लेनी पड़ी...और इसी लाइन के साथ उन्होंने मुखड़ा लिखा.

तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है
ये उठे सुबह चले, ये झुकें शाम ढले
मेरा मरना, मेरा जीना, इन्हीं पलकों के तले...

आँखों का जादू

फ़ैज़ साहब पंजाबी थे. जिन आँखों के हुस्न से उन्होंने अपनी नज़्म को सजाया था, वो आँखें लंदन की थी. उस खूबसूरत आँखों वाली का नाम था-एलिस कैथरीन जार्ज जो बाद में बेगम फ़ैज़ बनकर ऐलिस फ़ैज़ हो गईं.

इन्हीं आँखों को फ़ैज़ ने एक और अच्छी नज़्म का विषय बनाया है, पंक्तियाँ है.

यह धूप किनारा, शाम ढले
मिलते हैं दोनों वक़्त जहाँ
जब तेरी समंदर आँखों में
इस शाम का सूरज डूबेगा...
..और राही अपनी राह लेगा
.

रेखांकन

मैंने भी भारत से कई समंदर दूर इटली के एक शहर पालेरमू के म्यूज़ियम में दो आँखें देखी थी.

वो आँखें, जिन्हें मैंने कई साल पहले देखा था, उन्हें आज तक नहीं भूल पाया हूँ.

इन आँखों के दर्शन ने मेरे जीवन का दर्शन ही बदल दिया है. ये आँखें फ़ैज़ की नज़्म की आँखों की तरह किसी स्त्री के चेहरे की नहीं थी बल्कि एक प्राचीन ग्रीक देवता 'जेनस' की मूर्ति की थीं.

इस मूर्ति की दोनो आँखों में एक मुस्कुराई नज़र आती थी और दूसरी बिना आँसू के रोती हुई दिखाई देती थी.

एक ही चेहरे में, एक साथ रोती मुस्कुराती आँखों ने मुझे 2600 साल पहले के उस नौजवान राजकुमार की याद दिला दी जिसने एक दिन मीठी नींद सोई आँखों से किसी बूढ़े चेहरे की झुर्रियाँ देखकर, जीवन का सत्य जानने के लिए राजगद्दी को त्याग दिया था.

हर सोचने वाला ज़हन गौतम बुद्ध नहीं बन पाता.

मैं भी अपने घर में हूँ, अपने परिवार के साथ हूँ, जीवन की सुविधाओं का शिकार हूँ लेकिन देवता की प्रतिमा से झाँकती आँखों ने जो काँच मेरी सोच में चुभो दिया था, उसकी कसक बार-बार मेरे शब्दों से फूटती रहती है.

मशहूर गज़ल गायक जगजीत सिंह ने मेरा एक एलबम ‘इन साइट’ के नाम से बनाया है. उसमें गज़लों और दोहों के साथ एक गीत भी है

जीवन क्या है? चलता फिरता एक खिलौना है.
दो आँखों में एक से हँसना, एक से रोना है.
जो जी चाहे, वह हो जाए, कब ऐसा होता है?
हर जीवन, जीवन जीने का समझौता होता है
अब तक जो होता आया है वह ही होना है...

आँखें हमेशा से, हर युग के शायरों और कवियों का प्रिय विषय रही हैं. लिखनेवालों ने नए-नए अंदाज़ से इन्हें अपने शब्दों में सजाया है.

अंदाज़ अपने-अपने

आँखों को नैन भी कहते हैं, 13वीं शताब्दी के पंजाब में बाबा फ़रीद हुए जिनके दोहों को पंजाबी जुबान में बड़ा मरतब हासिल है. सिख धर्म के संस्थापक गुरूनानक उनके अध्यात्मिक मूल्यों से इतने प्रभावित हुए कि गुरूग्रंथ साहब में उनके दोहों की बड़ी संख्या शामिल की.

नैनों के संबंध में उनका एक दोहा पिछली कई सदियों से पूरे देश में मुहावरे की तरह इस्तेमाल होता है-

कागा सब तन खाइयो, चुन-चुन खइयो मांस
दो नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस

कवि बिहारी शाहजहाँ के काल में जयपुर के राजा जयसिंह मिर्ज़ा के दरबारी कवि थे. बिहारी सतसई का भारतीय साहित्य में ऐतिहासिक महत्व है. कहा जाता है कि राजा उनके हर नए दोहे को एक अशरफी से सम्मानित करते थे. रीतिकाल के इस महाकवि ने भी किसी की आँखों के आकर्षण को अपने एक दोहे का विषय बनाया है.

कहत-पटत, रीझत-खिझत, मिलत-खिलत-लजियात
भरे भवन में करत हैं, नैन ही सो बात

आँखों की भाषा का यह सुंदर बयान हमारी बोलचाल की ज़ुबान की शान है. इसमें आँखों की विभिन्न बोलियों को जिस रागात्मकता के साथ अभिव्यक्त किया गया है उसे सुनकर उसको वह आँखें याद आने लगती है जो हमेशा हर दिल में जगमगाती है.

अली सरदार जाफ़री, मुल्कराज आनंद और सज्जाद ज़हीर के साथियों में थे. वो शायर होने के साथ बड़े आलोचक भी थे. वो उत्तरप्रदेश की एक छोटी नगरी बलरामपुर में जन्मे थे, वहीं जवान हुए, वहीं किसी की आँखों के बीमार हुए.

वक़्त के साथ वह बलरामपुर से लखनऊ गए, वहाँ से बंबई आए, घर बसा, अपनी पसंद की शादी की, दो बेटों के पिता बन गए मगर अतीत में देखी हुई उन दो आँखों की याद कभी उनसे दूर नहीं हुई, वो जब भी तन्हा होते थे, अपने ज्ञानपीठ पुरस्कार, इक़बाल सम्मान, संत ज्ञानेश्वर अवार्ड की ट्राफ़ियों से निकलकर, वे उन्हें घेर लेती थीं.

कुतुबुद्दीन अंसारी
गुजरात दंगों की साक्षी ये वो आँखें हैं जो निदा साहेब को आज भी नहीं भूलतीं

उनकी नज़्म की पंक्तियाँ हैं-

मैं लिख रहा हूँ
तुम्हारी आँखें
सफेद कागज़ पे
अपनी पलकों से चल रही है

हर शायर के कवि जीवन में कभी ऐसा समय भी आता है जब अंग्रेज़ी शायर शैले को कहे हुए शब्द, ‘लेंग्वेज फ़ेल्स मी’(भाषा साथ नहीं देती) हू-ब-हू सच्चे लगते हैं.

वो आँखें...

फ़ैज़ से लेकर सरदार तक ने अपनी देखी हुई आँखों को निहायत सुंदर और मुनासिब शब्द दिए हैं. मैंने भी एक देवता की आँखों से गीत बनाया था लेकिन दो आँखें मैंने ऐसी भी देखी हैं जिन्हें चार साल की लगातार कोशिशों के बावजूद मैं अब तक काव्य रूप नहीं दे सका.

कविताएं तो कई बार लिखी लेकिन उनमें से किसी में भी वो असर और प्रभाव नहीं पैदा हो सका जो उनको देखकर मैंने महसूस किया था.

वे आँखें एक तस्वीर की थी, जो 2002 में किसी कैमरे ने अहमदाबाद में उतारी थीं. वो आँखें अहमदाबाद के किसी मोहल्ले के एक मामूली दर्ज़ी की थीं.

गुजरात में, गोधरा में 52 रामसेवकों के ज़िंदा जलाए जाने के बाद, सांप्रदायिक दंगे भड़के थे. किसी के अपराध की किसी को सज़ा देना वोट बैंक की राजनीति का पुराना उसूल है.

इन आँखों का नाम कुतुबुद्दीन अंसारी था. वह उस तस्वीर में दंगाइयों से अपनी ज़िंदगी की भीख माँगता नज़र आ रहा है.

उसकी आँखें बिना आँसुओं के इस तरह रोती नज़र आ रही थीं कि मैं देखकर दहल गया था. इस तस्वीर की इतनी शोहरत हुई कि अंसारी का अहमदाबाद में रहना मुश्किल हो गया. वह वहाँ से निकलकर कोलकाता में अजनबी बनकर मशीनें चला रहा है.

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