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कन्हैयालाल नंदन की ग़ज़लें | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक अपनी महफ़िल से ऐसे न टालो मुझे ज़िंदगी! सब तुम्हारे भरम जी लिए
मोतियों के सिवा कुछ नहीं पाओगे मैं तो एहसास की एक कंदील हूँ जिस्म तो ख़्वाब है, कल को मिट जाएगा फूल बन कर खिलूँगा, बिखर जाऊँगा दिल से गहरा न कोई समंदर मिला **** दो हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए मैंने माँगी दुआएँ, दुआएँ मिली जिसमें रहकर सुकूँ से गुज़ारा करूँ ज़िंदगी चाहिए मुझको मानी भरी लाख उसको अमल में न लाऊँ कभी जब मुसीबत पड़े और भारी पड़े (ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में डायलिसिस कराते हुए) ***** तीन जो कुछ तेरे नाम लिखा है, लिक्खा दाने-दाने में
तूने इक फ़रियाद लगाई उसने हफ्ता भर माँगा एक दिए की ज़िद है आँधी में भी जलते रहने की आँसू आए देख टूटता छप्पर दीवारो-दर को कुछ तो सोचो रोज़ वहीं क्यों जाकर मरना होता है जाकर तूफ़ानों से कह दो जितना चाहें तेज़ चलें कौन मुहब्बत के चक्कर में पड़े बुरी शै है यारो! ************************************** |
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