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शुक्रवार, 29 दिसंबर, 2006 को 02:28 GMT तक के समाचार
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इंदु जैन की कविताएँ
रेखांकन- लाल रत्नाकर
वे लोग

वे लोग कहाँ मिलेंगे
जो अपने जैसे हैं
जो हाथ पकड़ कहेंगे-हम साथ हैं
फोन करेंगे-हम हैं न!

वे लोग कब आएँगे
जिन्हें इंतज़ारते
आखिरकार एक दिन
देख ही लेंगे हम.
दुधियाए जंगल के बीच स्याह सड़क पर
जुगनू पास आ रहे हैं
घोड़े, ऊँट, बैल, मोटरों के पैर
धूल उड़ा रहे हैं
छावनी डालेंगे
बस्ती से सटकर
उनमें से कुछ दूर के सफ़र से लौटे
घरों में दिखेंगे
साथ रोटी तोड़ें, अपनी कहें-सुनें
फिर बोरिया बाँध चलेंगे
जो अपना बहुत कुछ छोड़ जाएँगे
पाथ बहुत-सा ले जाएँगे.

उसके बाद

वे लोग कहाँ रुकेंगे
छाती पर खूंटे गाड़
तंबू तानेंगे रहेंगे
डफर कुछ लेंगे, कुछ देंगे
रस्सियाँ लपेट चल देंगे.

वे लोग आसपास नहीं हैं
आसपास
अपना ही अपना है
वैसा नहीं
जो अपना-सा हो
जैसा अंदर है
बाहर नहीं
जैसी नदी है
चुल्लू नहीं

वे लोग क्या यहीं मिलेंगे
ठहरे-ठहरे
प्रतीक्षा करते-करते
या उन्हें भेंटने
कभी हम सब के सब आगे बढ़ेंगे.

********************************
वसीयत

एक दिन बेटे ने तुतलाकर कहा-
ये सूरज मुझे मिल जाए
तो निचोड़ कर बल्ब में भर लूँ
फिर रात दिन अपने घर में
रोशनी ही रोशनी रहे.
मैंने हुलसकर उसे छाती से लगा लिया.

रेखांकन- लाल रत्नाकर

बेटी ने कहा एक दिन-
चाँद हाथ आ जाए तो
गले में पहन लूँ
या दो पा जाऊँ तो
कानों में झुमके बनवा लूँ-
मैंने उसके जन्मदिन पर चाँदी की बालियाँ दीं
जिनमें दूज के चाँद पिरे थे
और वैसा ही पेंडेंट

फिर एक दिन
चिड़िया की चीख़ सुन दौड़ी गई
देखा
बेटे ने पिंजरे से चिड़िया निकाल
गर्दन मरोड़ डाली थी-
‘गाती नहीं थी मेरे कहने से-’
गुस्से से तमतमा रहे थे उसके गाल
मैंने डॉटा बेटे को
शाम को बहलाकर दूध पिलाया
और रात चुपचाप पति को बताया-
अपनी मनवा के रहता है
बड़ा जी-ज़ोर है.
पिता ने हँसकर करवट बदल ली.

बेटी कॉलेज से आई
तो बेग में सहेज-सहेज कर
बेल-पौधे जड़ समेत लाई थी-
‘कॉलेज की नर्सरी से हैं
अम्मा, फूलों की चोरी तो चोरी नहीं होती
मैंने कोई पौधा बिगाड़ा नहीं’
-चोरी चोरी है-
कहा मैंने
लेकिन पौधे जतन से बगीचे में रोप दिए
उसके बालों में बहुत प्यारा गुलाब था
सुंदर लग रही थी वो!

फिर एक दिन बेटे ने कहा-
ये दो टिकट हैं बनारस के
तुम जाना चाह रही थीं न!
मैंने धर्मशाला में एक कमरे का सेट
बनवा दिया है
तुम और बाबूजी आराम से रहना
हम लोग भी छुट्टियों में
आते-जाते रहेंगे
बच्चों के इम्तहान सिर पर हैं
तुम्हारे इस कमरे में पढ़-पढ़ा लेंगे
क्या करें
बड़े हो रहे हैं
उन्हें भी अपनी जगह चाहिए
हमारी तरह शोर शराबे में
इनका काम ही नहीं चलता-
कुछ ज़्यादा ही बोल रहा था बेटा.

दो दिन बाद बेटी आई
सामान बंधवाने.
दामाद बैठक में चाय पीने गए
तो बरस पड़ी-
चल दिए तुम और बाबूजी तो
सारा घर भैया भाभी को सौंप के
अब तो क़ानून बदल गए हैं
हमारा कोई हक़ नहीं क्या मकान पर?
मैंने शॉल तो तह लगाते लगाते कहा-
थक गए हैं तेरे बाबूजी
तू कोई अच्छा वकील कर ले.

अब गंगा के किनारे
जब शाम को सूरज
लाल कर देता है पानी
और ऊब जाता है मन
करकने लगती हैं आँखे पढ़ते-पढ़ते
चश्मा उतारकर
ग़ायब कर देती हूँ आज को
धुंधला विगत ठोस हो आता है
मैं बेटे-बेटी से कहती हूँ
चाँद-सूरज आसमान पर रहने दो
जो जहाँ का है, वहीं भला है
चिड़िया और फूल डाल पर
बच्चे, माँ-बाप के साथ घर में
माँ-बाप के माँ-बाप काशी में...

सोचते सोचते
ठिठकती हूँ
किसने लिखा था ये
किस किताब में?
ढूंढ़ने चश्मा उठाती हूँ
समय घड़ी में बंद रहता
तो हर चीज़ की
अपनी जगह जान पाती
और काशी में
आत्मा के अमरत्व की
जय जयकार उठने पर
हर बार
यो कॉप-कॉप न आती.

********************************
इंदु जैन
सी-400, सरिता विहार, नई दिल्ली.

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