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दोपहर

रेखांकन: डॉ लाल रत्नाकर

कहानी

किसी ने मुझे नहीं समझा. लेकिन समझा एक ने.
ओह, उसने भी मुझे ग़लत समझा.
-कनफ़्यूशियस

खिड़की के समीप बैठने से चेहरा किसी परछाईं की भाँति छोटा-बड़ा होने लगता था, जबकि काली आँखों की व्यथा मुझे रच रही होती.

चेहरा उसका था, आँखें भी.

मैंने पूछा ‘‘कुछ पीओगे?’’

उसने हाँ में अपना सिर ऐसे हिलाया जैसे कोई बच्चा अपनी ग़लती स्वीकार कर रहा हो. उसके गालों पर जंगली घास से बाल सीधे व नुकीले थे- एक आवारा अहम्, जिस पर लड़कियाँ फिदा हो बिछ जाती थीं. उसने शायद पिछले पाँच दिनों से शेव नहीं बनाई थी. अपनी आँखें मलकर उसने अपने सिर के घने बालों में हाथ फेरते, उन्हें बिखर जाने दिया.

पानी उबलने लगा था.

मैंने मगों को धोया, कॉफी तैयार कर मगों में डाली. एक मग उसके सामने रख दिया. उसकी ओर देखने पर मैं चौंकी, वह हँसा था-सफ़ेद चमकते दाँतों के दीखने के कारण उसके होठों के कुछ खुले होने का संकेत मिला था. मैंने गौर किया, वह काफ़ी देर से अपनी अधखुली आँखों से मेरी इस चालाकी को भाँप रहा था कि मैं उस पर अपनी नज़रें गड़ाए हूँ. इस बीच उसने अपने जूते उतारकर समीप ही दरवाजे के पास एक कोने में, रख दिए थे. जून का महीना था. दोपहर का अनमना समय.

हमारे माथे पर पसीने का बूंदे चमक रही थीं.

 अचानक सूझा कि यदि इसे सोते हुए अभी ही चाकू से गोद दूँ तो क्या वह यह जान पाएगा कि इसे गोदने वाली मैं थी?

जाता समय जानने लगा, यूँ ही दोपहर... समय ...गोया माफ़ी मौन की होनीदरारों से रिसता अनपेक्षित को पोसता.

बिना बोले वह आँखों को अधमुंदी रखे, सोफे के सिरहाने पर सिर टिकाए बैठा रहा. बाद में ऊँघने लगा, चेहरे पर थकान के बिंदु लहराते लग रहे थे.

मैं उसे अभी भी एकटक देख रही थी.

और यह बताने के लिए विकल थी कि हम उस सच को झुठलाना चाह रहे हैं जिसे हमने भोगा था कि हम अपने को धोखा दे रहे हैं...छलनाचाँप...बीते पर मिट्टी कैसे डाले...लगा था जैसे वह घटना मेरे सामने ऐसे रखी हो कि मैं उसे दोहरा रही होउँ...पर उस उम्रपाली में यह वर्जित था.

उसके बाल अब उसकी पलकों को चूम रहे थे, शांत माथा अनहोनी चमक लिए था. सहसा मुझे लगा-उसके तल्लीन चेहरे पर कसमसाहट-सी खरोंच थी. लेकिन तब मुझमें इतना साहस नहीं जगा कि उसके सर पर हाथ रखकर उसे हिम्मत दे सकूँ. अगर वह छोड़कर जाना चाहता था तो चले जाना था, इससे पहले कि अपने सारे अरमानों को दिल में ले चल बसे. ओह! कुछ भी छोड़ सकना कठिन है-एक तिनका तक. जगेगा तो कहूँगी,‘‘इस तरह ध्वस्त कौन होता है. अगर जाना ही चाहते हो तो उस रास्ते से मत जाओ जिस रास्ते से मैं आई हूँ.’’

हम दोनों अकेले थे, हम दोनों दोस्त थे.

उसे देखना क्या अपने में छिपने के मानिंद था? और यूँ इस दोपहर में बाहरी दुनिया से अलग अपने से बतियाना वह सब कुछ सुन लेना था, जो दरअसल मैं उसे सुनाना चाहती थी? लगातार उसे देखते रहने के कारण भी एक अलग जिज्ञासा ने मेरे भीतर जन्म लिया. मानों मैं उसके किसी पुराने और दफ़ना दिए गए गोपनीय रहस्य से सामना करने जा रही होउं...

रेखांकन - लाल रत्नाकर

हाँ, यह सच ही तो था.

हम अपनी आत्माओं को छीलने में लगे थे. और क्या यह एक सुखी दोपहर नहीं है. उस सुख से भरी जो एक वरदान की तरह हमारे बीच अचानक चली आती है जिसे हम अपने जीवन के टुकड़ों पर देखने लगते हैं-उन निगाहों से जो यह नहीं जानती कि वे हैं? मैं इसी गलफाँस में सोचने लगी. अब जब वह उठेगा तो आज शाम क्या होगी? और रात?

कमरे की चारदीवारी के भीतर शब्द यूँ खुलते जा रहे थे मानों मेरी देह की ढलानों से फ़िसल एक अदृश्य द्वार में बिला रहे हो. पर जल्द ही मैंने अपने ख़यालों को झटक दिया, अपनी विरह को अपराह्न के आत्म-अनजान आवरण में छिपा उस चेहरे को देखने लगी, गोया वह एक जादुई चेहरा हो जो मरे सारे प्रश्नों के हल जानता हो.

शायद मैं बूझ नहीं सकी- क्यों. वे अजनबी वीरान थी. मैं उसे देखती रही और देखती रही. बाहर दोपहर की हवा गर्म थी, बगीचा झुलस रहा था जबकि यह चारदीवारी एक हथेली सी खुली थी-हम जिसमें थे, चुपचाप.

अचानक सूझा कि यदि इसे सोते हुए अभी ही चाकू से गोद दूँ तो क्या वह यह जान पाएगा कि इसे गोदने वाली मैं थी?

ख़याल लौटते हुए ज्वार-सा नीरव व स्तब्ध था. जबकि मैं वहीं कमरे के एक काले कोने में बैठी अपने और उसके फासलों को समझते हुए हँसी-जैसे वह हँसा था.

और उसे वहीं सोता छोड़ लौट गई-फिर कभी न देखने के लिए.
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पीयूष दईया
मार्फत श्री संदीप मेहता
सिद्धार्थ लेबसेटी,रायसेन रोड
आनंद नगर, भोपाल, मध्यप्रदेश

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