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आधुनिक समाज के समय का एक सच | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक अवधारणा है कि दुनिया एक छोटे गाँव में तब्दील होती जा रही है और बड़ी तरक्की हो गई है. समाज में जातिगत द्वेष और भेदभाव को अब बीते ज़माने की बात कहकर प्रचारित किया जाता है. कथा-कहानियों में जहाँ इसका ज़िक्र अक्सर नहीं होता कि वह सब प्रेमचंद के दिन थे. इस समय के महत्वपूर्ण कहानीकार उदय प्रकाश की कहानी 'मोहन दास' में इस अवधारणा और इस प्रचार को आईना दिखाने की सफल कोशिश की गई है. इस पखवाड़े पढ़िए, एक सामान्य गाँव में पिछड़ी जाति के एक युवक की व्यथा-कथा कहती इस पुस्तक 'मोहन दास' का एक अंश -
उस रोज़ आँगन में मोहन दास और कस्तूरी बाँस और छींदी की चटाई, खोंभरी और पकउथी बुनने में लगे थे. बाज़ार के मोहनलाल मारवाड़ी की दूकान ‘विंध्याचल हैंडीक्राफ्ट्स’ में इतना बड़ा ऑर्डर मिला था कि दो-तीन महीनों तक मोहन दास और कस्तूरी को दम मारने की फुरसत नहीं थी. काबा और पुतली बच्चों को संभालते रहते. पचास चटाई, पचास खोंभरी और तीस पकउथी बनाने थे. काबा बीच में अपनी खाट से उतर आता और जब तक खांसी उसे निढाल न कर देती, बाँस की पक्सियाँ छीलने में लगा रहता. पुराना हुनर और तर्जुबा था. कस्तूरी चटाई इस तरह बुन रही थी, जैसे उसकी उंगलियों को कोई मशीन चला रही हो. साढ़े चार साल का देव दास खोंभरी को सिर में लगा कर, हाथ में बाँस की लाठी लेकर ढाई साल की शारदा को बकरी की तरह ‘हुर्र...हुर्र...’ करता हुआ हाँक रहा था और नन्हीं-सी शारदा पंजों और घुटनों के बल रेंगती हुई, बकरी बनी हुई, आंगन के एक कोने से दूसरे कोने तक, गिरती-पड़ती रेंग रही थी. तभी दरवाज़े पर आहट हुई. मोहन दास का साढू गोपाल दास अपनी साइकिल दीवार से टिकाकर अंदर आया. वह बाज़ार के ‘नर्मदा टिंबर एंड फर्नीचर’ में आरा मशीन चलाता था और मालिक के कहने पर उगाही-वसूली के लिए साइकिल पर यहाँ-वहाँ जाता रहता था. गोपाल के आने पर कस्तूरी बहुत खुश हुई. बहुत दिनों बाद उसके माइके के पास के गाँव से कोई पहुना उसकी ससुराल आया था. पानी-तमाखू के बाद गोपाल ने मोहन दास को बताया कि अभी तीन रोज़ पहले वह ओरियंटल कोल माइंस किसी काम से गया था. वहाँ जाकर उसे पता चला कि बिछिया टोला का बिसनाथ वहाँ मोहन दास के नाम से पिछले चाल साल से डिपो सुपरवाइज़र की नौकरी कर रहा है और दस हज़ार से ऊपर हर महीने पगार ले रहा है. गोपाल दास ने कहा कि उसे पता चला है कि बिसनाथ के बाप नागेंद्र नाथ ने भर्ती दफ्तर के बाबू को पटाकर मोहन दास वाली नौकरी का लेटर अपने आवारा बेटे बिसनाथ को दे दिया. मोहन दास द्वारा साक्षात्कार के दिन जमा किए गए प्रमाणपत्रों और अंकसूचियों में मोहन दास के फोटो तो थे नहीं, इसका फायदा उठाकर बिसनाथ ने ख़ुद को मोहन दास के रूप में प्रस्तुत कर दिया और हर जगह मोहन दास की जगह अपना फोटो लगाकर अदालती हलफनामे से लेकर गजेटेड अफसर तक से उसे प्रमाणित करा लिया. इस तरह बिसनाथ ओरियंटल कोल माइंस में मोहन दास बल्द काबा दास, जात कबीरपंथी विश्वकर्मा बन कर इत्मीनान से डिपो सुपरवाइज़र की नौकरी करने लगा और दस हज़ार की माहवारी पगार लेने लगा. गोपाल दास ने बताया कि उसने बिसनाथ को कालरी के पास के एक होटल में चाय पीते देखा था. उसके गले में जो प्लास्टिक का आईकार्ड टंगा था, उसमें नाम तो मोहन दास का लिखा हुआ था, लेकिन फोटो बिसनाथ का था. इतना ही नहीं उसके साथ उस समय जितने भी लोग थे, वे सब उसे ‘मोहन दास’ ही कह रहे थे. वहाँ यह भी पता चला कि बिसनाथ ने अपने गाँव बिछिया टोला में रहना चार साल से छोड़ दिया है और अब ओरियंटल कोल माइंस की वर्कर्स कालोनी ‘लेनिन नगर’ में बाल-बच्चों समेत रहने लगा है, जहाँ उसकी पत्नी ब्याज पर रुपया उठाने का धंधा करती है और चिट फंड चलाती है. मज़े की बात यह है कि लेनिन नगर में रहने वाले सभी लोग बिसनाथ को ‘मोहन दास’ और उसकी पत्नी अमिता को ‘कस्तूरी मैडम’ के नाम से ही जानते हैं. बिसनाथ मोहन दास की तरह बी ए तो है नहीं, दसवीं फेल है इसलिए कालरी में काम करने की बजाय अफसरों की चापलूसी, कोयले की तस्करी और यूनियनबाज़ी में लगा रहता है. अपने साढू गोपाल दास की बात सुनकर मोहन दास का माथ घूम गया. ऐसा कैसे हो सकता है? कोई भी आदमी आख़िर कोई दूसरा आदमी कैसे बन सकता है? वह भी दिनदहाड़े, खुले आम, इस तरह? एकाध दिन के लिए नहीं, पूरे चार साल से? लेकिन मोहन दास ने अपनी गरीबी और लाचारी में जिस तरह के दिन देखे थे और अपने बाप काबा से उसने उसकी ज़िंदगी के जो पुराने किस्से सुने थे, उससे उसे लगने लगा कि अफसर-हाकिम, अमीर-उमरा और पार्टी वाले लोग इतने ताकतवर होते हैं कि वे कुछ भी कर सकते हैं. वे कूकुर को बैल, सुअर को शेर, खाई को पहाड़, चोर को साहु-किसी को भी कुछ बना सकते हैं. मोहन दास को अपनी सांसें रुकती हुई-सी लगीं. हे सत्गुरु, कैसा समय है, क्या चार सालों में यहाँ एक भी आदमी ऐसा नहीं हुआ, जो कह सके कि ओरियंटल कोल माइंस में जो आदमी मोहन दास के नाम पर हर महीने दस हज़ार की पगार ले रहा है, वह मोहन दास नहीं, बिसनाथ है, जिसके बाप का नाम काबा नहीं, नगेंद्र नाथ है, जिसकी पत्नी का नाम कस्तूरी बाई नहीं अमिता भारद्वाज है और जिसकी माँ पुतली बाई नहीं, रेनुका देवी है?...जो पुरबनरा गाँव का नहीं, बिछिया टोला का निवासी है? जो बी ए पास नहीं, दसवीं फेल है...?
उस रोज़ चटाई बुनते-बुनते मोहन दास बार-बार रुक जाता था. उसकी आँखें कहीं खो जाती थीं और वह कुछ सोचते-सोचते गुम हो जाता था. बाँस की कमटियाँ बनाते-बनाते उसके हाथ बहक जाते थे. एक बातो हंसिया उसके अंगूठे को काटते-काटते बची. कस्तूरी सब देख रही थी और अपने पति के भीतर चल रहे उथल-पुथल और बेचैनी को अच्छी तरह समझ रही थी. उसने मोहन दास के हाथ से हंसिया ले लिया और कहा,‘‘आज त घाम कुछ जादै चांड़ हबै...ज तै हाथ-मुँह धो के थोरी ल सूत ले! ’’ (आज धूप कुछ ज़्यादा ही तेज है. जाओ, तुम हाथ-मुँह धो कर थोड़ी देर सो लो.) अगली सुबह सात बजे की बस पकड़ कर मोहन दास ओरिएंटल कोल माइंस के लिए रवाना हो गया. रात भर उसे ठीक से नींद नहीं आई थी. ठीक साढ़े दस बजे वह कोलियरी पहुँच गया. समस्या यह थी कि वह यहाँ किससे बात करे? किसी को तो वह जानता नहीं था. ऊपर से उसका हुलिया ऐसा था कि किसी को भी यह मानने में दिक्कत होती कि असली मोहन दास वही है, जो एम जी कॉलेज से बी ए फर्स्ट डिवीज़न है और आज से कुछ साल पहले जिसके फोटो अख़बारों में छपे थे. समस्या यह भी थी कि उसके पास वे अख़बार भी नहीं बचे थे, जिनमें छपे अपने फोटो दिखाकर वह बता सकता कि,‘‘देखो मैं ही हूँ-मोहन दास, बल्द काबा दास, साकिन पुरबनरा, ज़िला अनूपपुर, मध्य प्रदेश, जिसने एम जी शासकीय डिग्री कॉलेज से, बी ए की परीक्षा में, बस कुछ ही साल पहले, फर्स्ट डिवीज़न के साथ मेरिट में दूसरा स्थान हासिल किया था. चेहरे का मिलान करके देख लो. मैं ही हूँ असली मोहन दास.’’ बड़ी मुश्किल से मोहन दास को फाटक के अंदर जाने दिया गया. उसकी नीली पैंट घुटनों के पास फट चुकी थी. पीछे भी घिस कर वह तार-तार थी लेकिन कस्तूरी ने उन जगहों पर मेल खाते रंग के पैबंद टाँक दिए थे, जो या तो उसकी पुरानी ब्लाउज में से निकाले गए थे, या पुरानी चादरों में से. धूप, चाप, ठंड, कड़ी मेहनत और इतने दिनों के भूख-प्यास ने मोहन दास के चेहरे और त्वचा का रंग स्याह-तांबई कर डाला था. दुखों और विपत्तियों ने उसके चेहरे पर इतनी लकीरें खींच दी थी, कि लगता ही नहीं था कि उसकी उम्र अभी चालीस के पेटे तक भी नहीं पहुँची है. जितनी बार अपने अभावों के बोझ से वह कराहता या अपमान की आग में चुपचाप झुलसता, उसकी भावों और हाथ-छाती के रोयें सफेद होते जाते. 30-35 की उम्र में वह 50-55 का दिखता था. मोहन दास उसी दफ़्तर के सामने खड़ा था, जहाँ चार साल पहले वह अपने सारे सर्टिफिकेट और कागज़ात जमा कर गया था और जहाँ काम करने वाले बाबू ने उसे दिलासा दिया था कि तुम्हारा नाम तो कभी कट ही नहीं सकता, क्योंकि लिखित और शारीरिक परीक्षा में वह सूची में सबसे ऊपर है. मोहन दास ने देखा कि वही बाबू उस कमरे में बैठा हुआ था, जिससे वह पहले मिला था. उसकी कुर्सी बड़ी हो गई थी और सामने वाली मेज़ भी. उनकी पीठ के पीछे ठंडी हवा फेंकने वाला एसी लगा हुआ था. मोहन दास दरवाजे के पास खड़ा हुआ देख रहा था कि वह बाबू बिस्कुट खाने और चाय पानी में व्यस्त था और उसके सामने की कुर्सी में दो लोग बैठे हुए धीरे-धीरे उससे बात कर रहे थे. अचानक बाबू ने उसकी ओर देखा तो मोहन दास ने हाथ जोड़ कर नमस्कार किया और पुरानी स्मृति को जगाने के उद्देश्य से उसकी ओर देखकर मुस्कुराया. बाबू के माथे पर बल पड़े. शायद वह उसे पहचान नहीं पाया. मोहन दास ने उसे दुबारा हाथ जोड़कर नमस्कार किया और बोला,‘‘साहब मैं मोहन दास...!’’ लेकिन तब तक बाबू ने अपनी मेज के नीचे लगी घंटी का स्विच दबा दिया था. बड़ी तेज कर्कश खरखराती आवाज़ पैदा हुई और एक चपरासी दौड़ता हुआ अंदर आया. बाबू ने उससे कुछ डाँटते हुए कहा, जो मोहन दास को सुनाई नहीं पड़ा. चपरासी ने आकर कमरे का पर्दा खींच दिया और मोहन दास को सिर से पाँव तक घूरते हुए कहा, ‘‘क्या काम है? चलो उधर बैठो, बारामदे की उस बेंच पर...!’ इधर कैसे आ गए?’’ मोहन दास ने उसे बताना चाहा कि उसका नाम मोहन दास है और आज से साढ़े चार साल पहले वह कोलियरी में नौकरी के लिए सेलेक्ट हुआ था और अपने सारे कागज़ात इसी ऑफिस में जमा कर गया था लेकिन उसकी जगह पर कोई और आदमी, उसी के नाम से नौकरी पर लग गया...’’ वगैरह. उसकी आवाज़ इतनी कमज़ोर थी ऊपर से चपरासी उसे जिस तरह खींचता हुआ बारामदे के कोने में रखी बेंच की तरफ ले जा रहा था, उससे जल्दी-जल्दी बोले गए उसके वाक्यों में कोई तारतम्य नहीं रह गई थी. गले में कुछ फँस सा रहा था और वह हकला रहा था. मोहन दास चपरासी से अपनी बाँह छुड़ाते हुए गिड़गिड़ाया,‘‘दादा, एक बार उस बाबू से मिला भर दो. मुझे अपने प्रमाणपत्र और मार्कशीट वापस लेने हैं.’’ चपरासी ने उसे लगभग धकियाते हुए दीवार से सटी लकड़ी की बेंच पर बैठा दिया और वापस जाने लगा. मोहन दास ने जान लिया कि अब उसका दुबारा यहाँ तक आ पाना असंभव होगा. यही आख़िरी मौका है. उसने ज़ोरों से चपरासी को आवाज़ लगाई, जो भर्ती कार्यालय के दरवाज़े से अंदर घुसकर अदृश्य ही होने वाला था. ‘‘ए...ए...! जा के उस बाबू से बोलो कि मोहन दास बीए आया है और 18 अगस्त 1997 को जमा किए गए अपने सारे कागजात वापस माँगता है...! तमाशा बना रखा है! कोठरी और कुर्सी में बैठ गए तो अंधेर मचाओगे?...लाओ पर्ची लाओ, मैं अपना नाम लिखता हूँ...! बाबू को दे देना!’’ चपरासी एक बार तो सन्न ही रह गया. किसी बूढ़े भिखमंगे की तरह चीथड़ों में लिपटे इस आदमी के गले से बहुत साफ-सुथरी भाषा निकल रही थी. ऐसी भाषा और लहज़ा तो पढ़े-लिखे बाबुओं और अफसरों का होता है. चपरासी दरवाज़े पर कुछ देर ठिठका हुआ मोहन दास को घूरता रहा. फटी हुई बेरंग हो चुकी, जगह-जगह पैबंद लगी पैंट, तार-तार हो चुकी मैली, चौखानेदार बुश्शर्ट. गंजे होते सिर पर सूखे बिखरे खिचड़ी अधपके बाल. झुर्रियों और बेतरतीब आड़ी-तिरछी लकीरों से भरा तांबई मुरझाया चेहरा. गड्ढ़ों में धँसी, धीरे-धीरे बुझतीं, जैसे अपने आपको देखती हुईं, हताश कमज़ोर आँखें. नीचे पैरों से अंगूठों में किसी तरह फंसाई गई रबर की बहुत पुरानी, सस्ती-सी चप्पल, जिसे लंबी बेरोजगारी, अभाव, दुख और हताशा ने रबड़ का भी नहीं रहने दिया था, मिट्टी, काठ या कागज का बना डाला था. ‘‘फटीचर...! साला पगलैट...! ...कौन-सी पार्टी और अफ़सर इस ससुर भुक्खड़ की मदद को आएगा?’’ यही वह बुदबुदाहट थी, जो चपरासी के होठों में गुस्से की कंपकंपी पैदा कर रही थी. मोहन दास को लगा कि चपरासी को उसकी बातों पर विश्वास नही हो रहा था, इसीलिए वह बेंच से उठा और आत्मविश्वास से भरा हुआ, सधे कदमों से उसकी ओर बढ़ा. उसके मन में था कि वह जाकर उसे समझाने की कोशिश करेगा कि बिसनाथ ने उसके साथ ही नहीं बल्कि ओरियंटल कोल माइंस के साथ भी जालसाजी और धोखाधड़ी की है. मोहन दास जिस व्यग्रता और ज़ल्दबाज़ी से चपरासी की ओर बढ़ रहा था और उसके चेहरे पर उसके दिमाग़ में चल रही उथल-पुथल की वज़ह से जैसी आड़ी-तिरछी लकीरें बन रहीं थीं, गड्ढों में धंसी आँखों में जो एक खास तरह की बेचैन चमक आ गई थी और अपनी सारी बात एक साथ कह देने की उग्र व्याकुलता में उसके सूखे-पपड़ियाए होठ जिस तरह कांप रहे थे, उससे चपरासी सचमुच डर गया. वह मोहन दास की ओर देखता हुआ ज़ोरों से चिल्लाया. ‘‘ए...ए...! एक डग आगे झै धरना, समझे. ठहर जाओ ओही ठे ससुर...हम बोले, ठहर जाओ...ओही ठे...!’’ ‘‘ए...ए...भाई! मेरी बात तो सुनो...!’’ मोहन दास बिगड़ती हुई बात को संभालने के लिए कुछ ज़ोर से बोला. लेकिन उसकी बात में विनम्रता कम और बेचैनी शायद ज़्यादा थी, जिससे बिगड़ गई. चपरासी तन कर खड़ा हो गया और ज़ोरों से चिल्लाया ‘बहिर हो क्या! ठहर जाओ ओही जगह, नहीं तो खन के गाड़ देंगे ससुर! एक डग आगै झै धरना!’’ दरवाज़े पर चीख पुकार सुनकर दफ़्तर के अंदर से चार-पाँच लोग बाहर निकल आए. वे अफसरों जैसे कपड़ों में थे और घूर कर मोहन दास को सिर से पाँव तक देख रहे थे. ‘‘कौन है?...यहाँ अंदर तक कैसे चला आया?’’ ‘‘सिक्योरिटी ऑफिसर पांडे को बुलाओ!...ये गार्ड खैनी रगड़ कर कुर्सी पर सोते रहते हैं!’’ ‘‘आज मेन गेट पर ड्यूटी किस-किस की थी? ड्यूटी रजिस्टर लाओ?’’ ‘‘अरे, भगाओ इसे!’’ ‘‘ये तो हद्दै हो गई...! कोई भी इस तरह अंदर घुस आए...! किसी को ठाँय-ठाँय गोली मार जाए...! अरे कुछ नहीं तो बमै फोड़ जाए...!’’ ‘‘पुलिस में दे दो! शर्मी जी, मिलाइए अपना मोबाइल...वो सौ नंबर!’’ मोहन दास की बात कोई नहीं सुन रहा था. उसे धकियाया जा रहा था. सिर, पीठ, कंधे और चेहरे पर पंजों, घूंसों और कुहनियों की चोटें बरस रही थीं. मोहन दास दोनों हाथों से अपना चेहरा ढंक कर अपनी आँखें बचा रहा था. हमारी बात तो सुन लीजिए!...ए...मारिए नहीं...! इतने में ही तीन-चार गार्ड दौड़ते हुए आए. इनमें से एक के हाथ में बारह बोर की दुनाली थी, जैसी बैंक के चौकीदारों के पास होती है. बाकी के हाथ में डंडे थे. मोहन दास की पीठ उधड़ गई. उसकी आँखों के सामने कठिना नदी में अमावस की रात देखे गए सारे नक्षत्र चीखते-कराहते हुए, उल्काओं की तरह टूट-टूच कर गिरने लगे. कोई ऐसी गुम्म चोट कहीं पड़ी कि उसके गले से ठीक वैसी ही चीख निकली, जैसी उस सुअर के गले से निकलती है, जिसकी टांगों को बाँध कर उसके गले को रेता जाता है. वह ऐसी चीख थी कि कोलया खदान के तमाम कामगार बाहर निकल आए और घेरा बनाकर उस तमाशे को देखने लगे. मोहन दास ओरियंटल कोल माइंस के मुख्य गेट के बाहर सड़क पर खड़ा था. एकदम बीचोंबीच. उसके दिमाग़ ने कुछ भी सोचना छोड़ दिया था. एक डरावना-सा सन्नाटा था, जो पूरे वातावरण में सायं-सायं करता हुआ बज रहा था. उसे यह भी होश नहीं था कि वह सड़क के ठीक बीच में खड़ा है और उसके दोनों तरफ से ट्रक, मेटाडोर, टेंपो और दूसरी गाड़ियाँ हॉर्न बजाती, उसे किसी तरह कुचलने से बचाती हुईं, तेज रफ़्तार से लगातार गुज़र रही हैं. (पृष्ठ 30 से 37) **************************** मोहन दास |
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