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गुरुवार, 26 अक्तूबर, 2006 को 16:53 GMT तक के समाचार
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शबाना गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित
शबाना आज़मी
शबाना आज़मी ने भारतीय उच्चायोग में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया
जानीमानी अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता शबाना आज़मी को लंदन में प्रतिष्ठित गांधी अंतरराष्ट्रीय शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.

ब्रितानी संसद के ऊपरी सदन हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में उन्हें ब्रिटेन की प्रसिद्ध अभिनेत्री वेनेसा रेडग्रेव ने यह पुरस्कार दिया. इस अवसर पर ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त कमलेश शर्मा और सांसद और अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर भीखू पारेख भी मौजूद थे.

यह पुरस्कार शबाना को भारत की वंचित और मजबूर महिलाओं के उत्थान के लिए काम करने पर दिया गया है.

इस मौके पर शबाना आज़मी ने कहा, "आतंकवाद को इस्लाम के बराबर माना जा रहा है - ये अनुचित भी है और असत्य भी. धर्म के नाम पर कहानियों को बढ़ावा दिया जा रहा है."

उनका कहना था, "इस्लाम दुनिया के 50 से ज़्यादा देशों में फैला हुआ है और जिस भी देश में है उसी की संस्कृति को अपना लेता है. इसलिए कुछ देशों में वह सहनशील है, कुछ में उदारवादी है और कुछ में उग्र रूप है."

 आज लड़ाई ईसाई और मुसलमान के बीच नहीं, हिंदू और मुसलमान के बीच नहीं हो सकती. लड़ाई तो विचारधाराओं के बीच होनी चाहिए - उदारवादी और उग्रवादी विचारधाराओं के बीच
शबाना आज़मी

लंबे समय से अपने अभिनय के लिए लोकप्रिय शबाना ने कहा, "आज लड़ाई ईसाई और मुसलमान के बीच नहीं, हिंदू और मुसलमान के बीच नहीं, लड़ाई विचारधाराओं के बीच होनी चाहिए - उदारवादी और उग्रवादी विचारधाराओं के बीच."

'अहिंसा का रास्ता सार्थक'

समारोह से पहले एक संवाददाता सम्मेलन में शबाना ने इस पुरस्कार के लिए आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस पुरस्कार से सम्मानित होने वाले नेल्सन मंडेला, आर्चबिशप डेस्मंड टूटू और दलाई लामा जैसे सम्मानित व्यक्तियों की सूची में जुड़ कर वह विनम्रता महसूस कर रही हैं.

पत्रकारों के सवालों के जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि गांधी का दिखाया अहिंसा का रास्ता आज भी उतना ही सार्थक है जितना उनके जीवनकाल में हुआ करता था.

 हिंसा का त्याग होना चाहिए, सिर्फ़ इसलिए नहीं क्योंकि वह एक बुराई है, बल्कि इसलिए भी क्योंकि हिंसा से आजतक कुछ हासिल नहीं हुआ है.
शबाना आज़मी

उनका कहना था, "हिंसा का त्याग होना चाहिए, सिर्फ़ इसलिए नहीं क्योंकि वह एक बुराई है, बल्कि इसलिए भी क्योंकि हिंसा से आजतक कुछ हासिल नहीं हुआ है".

अपने सामाजिक कामों की शुरुआत का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अपनी फ़िल्म पार की शूटिंग के दौरान उन्होंने सफ़ाई करने वाली एक महिला का गहराई से अध्ययन किया और फिर वह उनकी अच्छी दोस्त बन गई.

शबाना कहती हैं कि उन्हें लगा कि इस फ़िल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार पा लेने से ज़रूरी है उस तबक़े को कुछ लौटाना जिससे उन्हें इतना कुछ सीखने को मिला.

शबाना गांधी फ़ाउंडेशन का यह पुरस्कार पाने वाली पहली भारतीय महिला हैं.

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शबाना आज़मी और माइकेल डगलस संयुक्त रूप से अंतरराष्ट्रीय सम्मान पाएँगे.
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