|
'एक निर्मल वर्मा तो आज भी जीवित हैं' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
"हर साहित्यकार अपनी दो ज़िंदगी जीता है. एक लोगों के बीच मौजूद रहकर और दूसरी उसके जाने के बाद उसके काम और स्मृतियों के रूप में. निर्मल आज भी उस रूप में हमारे बीच ज़िंदा हैं." यह कहना था जानी-मानी साहित्यकार कृष्णा सोबती का जो दिल्ली में सोमवार की शाम निर्मल वर्मा की स्मृति में आयोजित एक समारोह की अध्यक्षता कर रही थीं. एक बरस पहले 25 अक्टूबर को हिंदी साहित्य के इस महान साहित्यकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया था. उन्हीं की स्मृति में कुछ साहित्यकारों की ओर से एक स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया. निर्मल के पीछे, निर्मल के बहाने कई तरह की बातें, कई तरह की टिप्पणियाँ सुनने को मिलीं. शायद वो सब भी जो उनके जीते-जी कई लोगों ने स्वीकार नहीं किया था. इस मौके पर निर्मल वर्मा के कुछ साक्षात्कारों, निबंधों और अन्य रचनाओं के संकलनों का लोकार्पण भी किया गया जिनका संपादक कुछ वरिष्ठ पत्रकारों-साहित्यकारों ने किया है. इनमें से एक संग्रह निर्मल माया का संपादन किया है लोकमत के प्रधान संपादक मधुकर उपाध्याय ने. कार्यक्रम में कई वरिष्ठ साहित्यकारों, पत्रकारों और जानी-मानी हस्तियों ने शिरकत की. इनमें कृष्णा सोबती, राजेंद्र यादव, कुंवर नारायण, मधुकर उपाध्याय, अशोक वाजपेयी, सुरेंद्र मोहन, एलएम सिंघवी जैसे कई नाम हैं. सरहद पार से सलाम
पर सबसे ख़ास बात थी पाकिस्तानी साहित्यकार इंतिज़ार हुसैन की इस कार्यक्रम में मौजूदगी. निर्मल वर्मा की स्मृति में आयोजित व्याख्यान के लिए इंतिज़ार को ख़ासतौर पर पाकिस्तान से बुलाया गया था और यह अदबी तहज़ीब ही है जो ईद में पाकिस्तान छोड़कर निर्मल के लिए भारत आ पहुँची. निर्मल वर्मा की पत्नी गगन गिल बताती हैं कि इस स्मृति व्याख्यान के लिए कई लोगों के नाम प्रस्तावित थे पर आखिर में लगा कि निर्मल की स्मृति पर इंतिज़ार ही कुछ कहें, यह सबसे मुनासिब रहेगा. पर इंतिज़ार हुसैन ही क्यों, इस सवाल का जवाब उनके व्याख्यान के विषय और फिर कही गई बातों से मिल गया. इंतिज़ार का विषय था- संप्रेषण (कम्यूनिकेशन) की समस्या. इंतिज़ार मंच पर आए और बातचीत की शुरुआत ऋग्वेद की एक कहानी से की. इसके बाद कथा सरित सागर, पंचतंत्र, अलिफ़ लैला से लेकर परी कथाओं तक और महाभारत से लेकर ईरान, अरब तक फैले कथा संसार में संप्रेषण की स्थितियों के बारे में इंतिज़ार अपने श्रोताओं को गोते लगवाते रहे. बस, यहीं से साफ़ हो गया कि इंतिज़ार का आना क्यों बेहतर रहा. निर्मल और इंतिज़ार
दरअसल, अपने पूरे लेखन में कुछ ऐसी बातों को कहने का जोखिम निर्मल वर्मा ने उठाया जिनके लिए वो कभी अलग-थलग पड़े तो कभी विचारधारा और सोच की सीमाओं में बाँधे गए, उनके साथ इस बर्ताव को कुछ जानकार संप्रेषण की ही एक समस्या के तौर पर देखते हैं. कल्पना कीजिए कि अगर ऋग्वेद की कहानी से भारतीय हिंदी साहित्य का कोई पंडित अपनी बात शुरू करता तो उसे तुरंत एक विचारधारात्मक साँचे में बाँध दिया जाता पर इंतिज़ार ने उस सीमा और संकट को तोड़ा. कार्यक्रम का संचालन कर रहे प्रोफ़ेसर गिरीश त्रिवेदी ने कहा, "हिंदुस्तान और पाकिस्तान तो कल की बात है. निर्मल को परंपरा और परंपरा समीक्षा की जितनी चिंता थी, उसी तरह की बातें इंतिज़ार के साहित्य में देखने को मिलती हैं. वो तो लोगों को परंपराओं, प्रकृति और परिवेश के और क़रीब ले जाते हैं." सुनने वाले अपने जेहनी चश्मे से इस व्याख्यान को अपनी-अपनी तरह देखते-समझते चले गए पर इतना तो साफ़ था कि निर्मल के सामने जो स्वीकारने में साहित्य जगत हिचकिचाता रहा, उनके पीछे लोग उसे ही समझते-समझाते नज़र आ रहे हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें साहित्यकार निर्मल वर्मा का निधन26 अक्तूबर, 2005 | पत्रिका 'स्वस्थ साहित्य किसी की नक़ल नहीं करता'29 जुलाई, 2005 | पत्रिका साहित्य का सांस्कृतिक करिश्मा22 जून, 2006 | पत्रिका 'मजाज़ रूमानी और प्रगतिशील दोनों थे'04 दिसंबर, 2005 | पत्रिका 'मैंने अमृता को जी लिया, अमृता ने मुझे'01 नवंबर, 2005 | पत्रिका साहित्यकार अमृता प्रीतम नहीं रहीं31 अक्तूबर, 2005 | पत्रिका 'मंटो से बड़ा लेखक अभी दुनिया को नहीं मिला'10 मई, 2005 | पत्रिका सार्क देशों के लेखकों का सम्मेलन07 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||