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सार्क देशों के लेखकों का सम्मेलन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली में दक्षिण एशिया के सार्क देशों के साहित्यकारों का तीन दिनों का सम्मेलन गुरुवार को शुरू हुआ. अपने व्याख्यानों और चाय की चुस्कियों के बीच साहित्यकार आपस में साहित्य, संस्कृतियों और सभ्यताओं की स्थिति पर अपने-अपने विश्लेषण रख रहे हैं. कभी टिप्पणियों और चुहलबाजियों पर ठहाके लगते तो कभी गंभीर विमर्श पर आँखें भर आती हैं. सार्क देशों के साहित्यकारों का यह 11वाँ सम्मेलन है. सम्मेलन में सार्क देशों के 200 से अधिक संख्या में साहित्यकार और लेखक इकट्ठा हुए हैं. सम्मेलन का आयोजन ‘सार्क साहित्य फ़ाउन्डेशन’ ने किया है. सम्मेलन का उदघाटन करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने कहा,“साहित्यकार मौसम को बसंत जैसा बना देता है, फूल ख़ुद-ब-ख़ुद खिल जाते हैं.” वीपी सिंह आयोजक संस्था के प्रमुख सलाहकार हैं. कलम के सिपाही सम्मेलन के आयोजन के बारे में बोलते हुए वरिष्ठ साहित्यकार कमलेश्वर ने कहा, “सार्क देशों के अदीबों का यह सम्मेलन बहुत अहम है, पर सार्क ही क्यों, बल्कि पूरे एशिया, यूरोप, लैटिन अमरीका, अफ़्रीका के लोगों को भी इसमें शामिल करना चाहिए.” कमलेश्वर कहते हैं, “यह साहित्य ही है, जिसकी वजह से पड़ोसी देशों के लोगों के बीच एक संवाद और संवेदनाओं के स्तर पर समझ बनी हुई है.” पाकिस्तान के जाने-माने साहित्यकार इंतज़ार हुसैन दोनों ओर की सरकारों को आड़े हाथों लेते हुए कहते हैं, "ऐसी फ़िज़ा पैदा करें कि हम आपस में मिलते रहें, अच्छा अदब ख़ुद-ब-ख़ुद पैदा होगा." प्रासंगिकता आयोजन की प्रासंगिकता पर वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने कहा, “इस उपमहाद्वीप की नियति केवल राजनीति ही तय नहीं कर सकती. सदियों से साहित्य और संस्कृति इसकी नियति को तय करते रहे हैं.” “यह विडम्बना ही है कि वो हक छीनकर राजनीति ने हथिया लिया है. राजनीति को चाहिए कि वो साहित्य की आवाज़ को बुलंद करे. यह आयोजन इसी दिशा में एक प्रयास है.” भारत के सूचना- प्रसारण मंत्री जयपाल रेड्डी ने कहा, “संबंधों को मज़बूत करने की दिशा में राजनेता वो करते हैं जो उनसे संभव होता है, पर साहित्यकार वो कर देते हैं जो किसी के लिए संभव नहीं रहता.” सात सहेलियों का झुमका पाकिस्तान की ही एक अन्य लेखिका ज़ाहिदा हिना कहती हैं, “इस सम्मेलन को मैं सात सहेलियों का झुमका कहती हूँ.” “मुद्दा कश्मीर नहीं, अमन और दोस्ती है. हम इसी के बीज बोते हैं.” सम्मेलन में पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान, नेपाल, मालदीव, सूडान, थाइलैंड के साथ ही भारत के लगभग सभी राज्यों के लेखक हिस्सा ले रहे हैं. इन देशों के साहित्यकारों का यह तीन दिनों का सम्मेलन नौ अक्टूबर तक चलेगा. |
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