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चौबीस घंटे के धरम का भरम

भारतीय चैनल
भारतीय मीडिया ने मालेगांव की घटना को फ़ैशन वीक की तुलना में काफ़ी कम जगह दी
मुंबई में लोकल ट्रेनों में हुए धमाकों को अभी दो महीने ही बीते थे कि मालेगांव में हुए विस्फोटों ने 32 और आम लोगों को निगल लिया. 100 से भी ज़्यादा घायल हो गए.

यहाँ एक बहस इस बात को भी लेकर होनी चाहिए कि क्या मालेगांव की घटना मुंबई की बरसात या फिर दिल्ली में फ़ैशन समारोह से कम गंभीर है या फिर इसे दो महीने पहले की घटना की पुनरावृत्ति समझते हुए बार-बार, लगातार टीवी पर दिखाना दिल्ली से चलने वाले भारतीय ख़बरिया चैनलों ने मुनासिब नहीं समझा.

भारत का नंबर वन चैनल घंटों तक दिल्ली के एक ऐसे व्यक्ति की कहानी दिखाता रहा जो ड्राइविंग सीट पर नहीं बल्कि उसकी बगल वाली सीट पर बैठकर गाड़ी चलाता है.

दूसरों की जान ख़तरे में डालने, ट्रैफ़िक के नियम का सरासर उल्लंघन करने और नौजवानों को ख़तरनाक स्टंट के लिए उकसाने वाले आदमी के करतब की अहमियत सैकड़ों लोगों की पीड़ा से कहीं अधिक बिकाऊ थी.

मालेगांव के लोगों के ज़ख़्मों को भरने में और इसकी वजहों के सामने आने में पता नहीं कितना वक्त लगे पर राष्ट्रीय राजधानी के चैनलों से ग़ायब होने में इस घटना को 24 घंटे से ज़्यादा वक्त नहीं लगा.

क्या मालेगांव की उपेक्षा इसलिए हो रही है क्योंकि न तो यह देश की राजधानी है और न ही आर्थिक केंद्र. यहाँ न तो फ़ैशन शो होते हैं और न ही यहाँ के घरों में टीआरपी का आँकड़ा रिकॉर्ड करने वाली मशीनें लगी हैं.

या फिर पिछड़ा होना और घटना में मुसलमानों का मारा जाना देश की स्वनामधन्य और राष्ट्रीय मीडिया को बड़ा मसला नहीं लगता.

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ज्यों-ज्यों डूबे श्याम रंग...

कबीर ने कहा था

दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोए
जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे को होए

कबीर के वचन उनके रहते न मालूम कितने लोगों ने अपनाए पर कलिकाल की इस 21वीं सदी में बहुतायत को इसका भान है.

मंदिर
आस्था और पर्यटन में भेद कम ही समझ आता है

यक़ीन न हो तो पार्कों से लेकर कार्पोरेट मंचों और सुबह-संध्या के प्रसारणों तक आप इसे देख सकते हैं.

कोई न कोई मनीषी, कथावाचक, वेदनिष्ठ, योगी, चूरन और पानी का वरदान देने वाले तपस्वी आपको लोगों को ज्ञान गंगा में गोते लगवाते दिख जाएंगे.

वो टीवी से लेकर जेब में रखे कलेंडर तक और स्कूटर की स्टेपनी से लेकर ड्राइंग रूम में रखे लेमिनेशन तक आपको नज़र आएंगे.

भक्त एक तेज़ी से विकसित होती अर्थव्यवस्था वाले देश के नागरिक हैं इसलिए सुख ही सुख है और कबीर बाबा समझा गए थे इसलिए सुख में सुमिरन भी है.

आज दिल्ली जैसे महानगरों में लोगों के पास तमाम तरह के आधुनिक साधन-संसाधन हैं और इन साधनों पर सवार होकर सुख और साधना, दोनों को हासिल करने में हमारा मध्यमवर्ग लगा हुआ है.

कई 'माँ', कई 'बापू' और कई 'बाबा जी महाराज'. इनके पीछे कई व्यापारी, कई आयोजक, कई कमेटियाँ और हज़ारों-लाखों धर्मभीरु भक्तों की भीड़. सुमिरन चल रहा है.

कबीर का कथन कल न सही, आज माना जा रहा है.

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कहाँ गए 'काग भुसुंडी'

कौवा
दिल्ली में अब कौवे कम नज़र आते हैं

प्रचलित पौराणिक कथाओं में काग भुसुंडी की कहानी भी है. ये एक ऋषि थे जिन्हें अमरत्व का वरदान मिला था और माना जाता है कि कौवे के रूप में से आज भी धरती पर ही हैं.

हिंदू धर्म में पुरखों के नाम पर तर्पण करने के पखवाड़े पितृपक्ष में उनकी अहमियत बहुत बढ़ जाती है.

दिल्ली के लोगों को इस बात की शिकायत है कि वो अपने पुरखों को मालपुए-पूरी नहीं खिला पा रहे हैं.

पितृपक्ष में पुरखों को याद करने और उन्हें भोग लगाने के लिए कौवे को आहार देना पड़ता है पर समस्या यह है कि कौवे दिल्ली में कम ही हैं.

चिंता की बात है पर सोचना तो तब चाहिए था जब पुरखों तक श्राद्ध सामग्री पहुँचाने वाले इस जीव के आशियानों को उजाड़कर कंक्रीट-सीमेंट के मकान बेहिसाब बनाए जा रहे थे.

आंगन की गौरैया तो कब की ग़ायब हो चुकी थीं और गिद्ध भी अधिकतर लोग किताबों में ही देखते हैं. अब बारी कौवों की है और कौवे संकट में हैं.

प्रभु ने काग भुसुंडी को अमरत्व का वरदान दिया था तब उन्हें पता नहीं था दिल्ली-मुंबई वाले सबसे चतुर पक्षी का भी जीना मुहाल कर देंगे.

(हमारी साप्ताहिक दिल्ली डायरी का यह अंक आपको कैसा लगा? लिखिए [email protected] पर)

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