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सोमवार, 04 सितंबर, 2006 को 03:54 GMT तक के समाचार
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कारों में टायलेट भर की कमी रह गई है

ट्रैफ़िक जाम लोगों को चिड़चिड़ा बना रहा है
दिल्ली की सड़कों पर रेंगती या रूकी हुई गाड़ियों की क़तार दिनोंदिन लंबी होती जा रही है.

गाड़ियाँ अब पहले के मुक़ाबले शानदार और चमकदार हैं लेकिन उन्हें सड़क पर फ़र्राटे से दौड़ने का मौक़ा शायद ही कभी मिलता है, अगर साल में दस-बीस नए फ्लाइओवर बनाकर दिल्ली सरकार ख़ुश होती है तो हज़ारों-हज़ार नई गाड़ियाँ आ जाती हैं बम्पर-टू-बम्पर चलने के लिए.

हर रोज़ होने वाले ट्रैफ़िक जाम की वजह से दिल्ली के लोगों की आदतों में कई बदलाव दिखाई देने लगे हैं, मैंने देखा कि लाल बत्ती पर पहले गुब्बारे और खिलौने बेचने वाले कई बच्चे अब धंधा बदलकर पत्र-पत्रिकाएँ बेच रहे हैं.

पिछली सीट पर बैठे लोग अब उकताहट मिटाने के लिए अक्सर कुछ पढ़ते नज़र आते हैं, एफ़एम रेडियो पहले से अधिक बजने लगे हैं.

ये तो समझदार लोगों की बात हुई, ट्रैफ़िक जाम की वजह से लोगों की खीझ इतनी बढ़ गई है कि छोटी सी बात पर मारपीट शुरू हो जाती है, ऐसे नज़ारे देखने के आदी हो चुके दिल्ली के लोग इसे 'रोड रेज' कहते है.

और तो और, मैंने ट्रैफ़िक में फँसे ड्राइविंग सीट पर बैठे लोगों को भी पढ़ते देखा, बीच-बीच में नज़र उठाकर देख लेते हैं कि अगर गाड़ी एक-दो मीटर सरक सकती हो तो सरका लें.

लोग अब गाड़ियों में बैठने से पहले पानी की बोतल साथ रखना नहीं भूलते, पता नहीं घर या दफ़्तर पहुँचने में कितनी देर लगे और प्यास से दम निकल जाए.

कुछ रोज़ पहले मैं अपने एक दोस्त की नई गाड़ी में दफ़्तर से घर तक के आधे घंटे के सफ़र पर चला, गाड़ी निज़ामुद्दीन पुल पर एक घंटे तक रेंगती रही और मेरे दोस्त गाड़ी की सेंट्रल लॉकिंग, रैपिड कूल एसी, पावर विंडो वग़ैरह के बारे में बताते रहे.

माइलेज़ और दूसरी गाड़ियों के साथ तुलना सहित तक़रीबन सवा घंटे का डेमो ख़त्म करते हुए उन्होंने कहा, 'सब कुछ है, और क्या चाहिए?'

मैंने कहा, 'अगर एक छोटा सा टॉयलेट भी होता तो अच्छा रहता.'

मोबाइल दिल्ली

दिल्ली में गाड़ियाँ भले ही बहुत मोबाइल न हों लेकिन मोबाइल क्रांति के दर्शन क़दम-क़दम पर होते हैं.

तक़रीबन डेढ़ करोड़ की आबादी वाला राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र जल्द ही एक करोड़ मोबाइल फ़ोन वाला महानगर बनने जा रहा है, ऐसे शहर पूरी दुनिया में दस के क़रीब हैं.

मोबाइल फ़ोन के ग्राहक हर आय वर्ग से आते हैं

ग्यारह साल पहले स्टेटस सिंबल बनकर अमीरों के हाथ में आया मोबाइल फ़ोन अब सामाजिक-आर्थिक विषमता की खाइयाँ लाँघ चुका है, जो लोग स्टेटस कॉन्शस हैं उनके पास हर साल मॉडल बदलने के और कोई विकल्प नहीं रह गया है.

मेरे एक मित्र यहाँ घरेलू काम करने वाली बाई के मोबाइल फ़ोन पर बीप बजी, उसने कहा, 'बिटवे का एसएमएस आवा है, भइया पढ़ दियो जरा.' वह एसएमएस करना सीखना चाहती है ताकि जिस दिन काम पर न आना हो मालकिन को मैसेज भेज दे.

तरह-तरह के रिंगटोन बिक रहे हैं, बाँटे जा रहे हैं, ज़्यादातर ग्राहकों की उम्र और उनके व्यक्तित्व के अनुरूप लेकिन कई बार हास्यास्पद ढंग से अटपटे.

मेरे साथ बैठे एक भाई ने अपनी सासजी को फ़ोन किया, स्पीकर ऑन था, कॉलर ट्यून बजी--'चढ़ती जवानी मेरी चाल मस्तानी....' उन्होंने झेंपते हुए फ़ौरन फ़ोन बंद किया और कहा कि पोते ने दादी के फ़ोन पर वह कॉलर ट्यून लगाई होगी.

नए-नए मुहावरे भी बन रहे हैं, 500 मिली लीटर वाली कोक या पेप्सी की बोतल को मोबाइल पेप्सी या मोबाइल कोक कहा जाता है.

एक दफ़्तर के बाहर खड़े दो छोकरे मोटरसाइकिल पर एक लड़के के साथ बैठ रही लड़की को देखकर कहते हैं, 'यार, आजकल की जेनरेशन तो बड़ी मोबाइल हो गई है.'

ठेके से फ्लाइओवर तक

राजधानी में इन दिनों अदालत के आदेश पर रिहाइशी इलाक़ों में चलने वाली दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की सीलिंग का अभियान चल रहा है.

इस अभियान की ज़द में हर तरह की दुकानें हैं, शराब के सरकारी ठेके भी हैं लेकिन उन्हें बंद नहीं किया जा रहा है. ऐसा नहीं है कि सरकार शराब का शौक़ रखने वालों की सुविधा का ध्यान रख रही है.

अगर ये ठेके बंद हुए तो दिल्ली सरकार को सैकड़ों करोड़ रूपए का घाटा होगा, दिलचस्प बात ये है कि दिल्ली के ज़्यादातर फ्लाइओवर शराब के शौक़ीनों की बदौलत ही बने हैं.

सीलिंग की चपेट में आने वाले स्कूलों और अस्पतालों के मालिक इस पर ख़ासा शोर भी मचा रहे हैं लेकिन उनकी कोई सुनने वाला नहीं है.

कुछ साल पहले एक साहब शराब पीकर गाड़ी चलाते हुए पकड़े गए, पुलिसवालों ने बताया कि वे क़ानून तोड़ रहे हैं.

उन्हें फ़ौरन जवाब मिला, 'शराब अपने पैसे की पी है, गाड़ी अपनी है, पेट्रोल अपना है, यह फ्लाइओवर मेरे ही पैसों से बना है...किस क़ानून की बात कर रहे हैं आप.'

(हमारी साप्ताहिक दिल्ली डायरी का यह अंक आपको कैसा लगा? लिखिए hindi.letters@bbc.co.uk पर).

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