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रविवार, 06 अगस्त, 2006 को 20:55 GMT तक के समाचार
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मुर्दे देखो, मुर्दों की चाल देखो!

वीपी सिंह से लंबे साक्षात्कार पर आधारित पुस्तक
वीपी सिंह ने कई पुराने विवादों से परतें हटाने की कोशिश की है
दिल्ली में पिछले कुछ बरसों से गड़े मुर्दे उखाड़ने का धंधा तेज़ी से चल निकला है.

किताब लिखने के बहाने हो रहे इस धंधे को पहले पश्चिमी देशों का ही फ़ितूर माना जाता था.

जब धंधा चल निकला है तो इसमें राजनीतिज्ञ भी शामिल हो गए हैं और पुराने नौकरशाह भी.

तरह-तरह के मुर्दे निकलकर सामने आ रहे हैं.

इन मुर्दों में कुछ इंदिरा गाँधी के ज़माने के हैं तो कुछ इतने ताज़ा कि क्रियाकर्म में भाग लेने वाले सब लोग अभी मौजूद हैं.

ज़्यादा पीछे न जाएँ तो पिछले एक दशक में इसकी शुरुआत की पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने, जिन्होंने अपने राजनीतिक अनुभवों पर एक आत्मकथात्मक उपन्यास लिखा.

फिर जोगिंदर सिंह, पीसी अलेक्ज़ेंडर, टीएसआर सुब्रमण्यन से लेकर चंद्रशेखर, वीपी सिंह और फिर जसवंत सिंह तक सब लोगों ने एक-एक करके वह ज़माना याद कर लिया जिसे इन सभी लोगों ने लगभग ख़ामोशी से जी लिया था.

पीसी अलेक्ज़ेंडर ने याद किया कि इंदिरा गाँधी के ज़माने में पीएमओ यानी प्रधानमंत्री कार्यालय किस तरह काम करता था तो जोगिंदर सिंह ने सीबीआई के दिनों को याद किया.

चंद्रशेखर ने सोनिया गाँधी और वाजपेयी को एक बता दिया और वीपी सिंह तो सोनिया गाँधी के प्रधानमंत्री न बनने का ताज़ा मामला लेकर हाज़िर हो गए.

सबसे ताज़ा क़िस्सा जसवंत सिंह जी की किताब 'ए कॉल टू ऑनर' का है.

इस किताब में नरसिंह राव से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल तक कई मुर्दे उखाड़े गए हैं.

दिलचस्प यह है कि इन मुर्दों में से एक सत्ताधारी कांग्रेस को रास नहीं आ रहा है और वो पूछ रही है कि भेदिया कौन था. तो उसी किताब से निकला दूसरा मुर्दा उसी कांग्रेस को मज़ा भी दे रहा है. इस मुर्दे का नाम कंधार है.

बोफ़ोर्स तोप
बोफ़ोर्स का भूत भारतीय राजनीति पर पिछले दो दशकों से मंडराता रहा है

किताबों के बहाने निकले ये मुर्दे मानों कम थे कि अचानक राजीव गाँधी के एक पुराने दोस्त अरुण सिंह एक टीवी इंटरव्यू के बहाने एक और मुर्दा लेकर सामने आ गए.

इन दिनों राजनीतिक बेरोज़गारी झेल रहे अरुण सिंह ने एकाएक बोफ़ोर्स के मुर्दे को सामने खड़ा कर दिया.

वैसे इन सब मुर्दों में सबसे बदक़िस्मत मुर्दा बोफ़ोर्स का ही है क्योंकि पिछले 20 सालों में सबसे ज़्यादा बार उसे ही उखाड़कर सामने लाया गया है.

बहरहाल मुर्दे देखिए, इन मुर्दों की चाल देखिए और अगले मुर्दे का इंतज़ार कीजिए.

ख़ुश हों या दुखी

अगर ये किताब सलमान रुश्दी की होती, या अरुंधती राय की या फिर विक्रम सेठ की तो वे ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे होते.

महीने-दो महीने में किसी किताब का चौथा संस्करण छापना पड़ जाए तो लेखक को ख़ुश ही होना चाहिए. आख़िर भारत में 15 हज़ार प्रतियों का हाथों-हाथ बिक जाना कोई छोटी बात नहीं है.

जसवंत सिंह
जसवंत सिंह की पुस्तक को लेकर अपनी पार्टी में ही अलग-थलग पड़ गए हैं

लेकिन 'ए कॉल टू ऑनर' के लेखक, पूर्व केंद्रीय मंत्री और राज्यसभा में विपक्ष के नेता जसवंत सिंह अपनी इस उपलब्धि पर ख़ुश हों या न हों वे ख़ुद समझ नहीं पा रहे होंगे.

एक ओर किताब हाथों-हाथ बिक रही है, दूसरी ओर राजनीतिक गलियारों में बड़ी किरकिरी हो गई है. और ये ख़बरें तक आने लगी हैं कि नेता प्रतिपक्ष की उनकी कुर्सी के हथियाने तक की दौड़ शुरु हो चुकी है.

वैसे यह असमंजस ग़लत भी नहीं. जो फ़ुलटाइम जॉब है उस पर ख़तरा मंडरा रहा है और जो काम पार्ट टाइम कर रहे थे उसका भरपूर मेहनताना मिल रहा है.

वैसे जसवंत सिंह जी का जीवन परिचय देखने का मौक़ा मिले तो पता चलता है कि यह उनकी पहली किताब नहीं है. वह सात किताबें पहले भी लिख चुके हैं.

विवाद का समय

लेकिन जसवंत सिंह जी की किताब को लेकर विवाद इस समय का अकेला विवाद नहीं है.

इसी समय कुछ और विवाद चल रहे हैं.

एक विवाद नटवर सिंह का है और इस समय तो वह इतना बढ़ा हुआ है कि जसवंत सिंह का विवाद एकबारगी पीछे छूटता हुआ दिख रहा है.

गायत्री देवी

तीसरा और इन दोनों के मुक़ाबले छोटा विवाद चल रहा है गायत्री देवी की संपत्ति के बँटवारे का.

हालांकि इन तीनों विवादों का कोई अंतरसंबंध नहीं है लेकिन एक बात फिर भी 'कॉमन' है.

और वो यह है कि तीनों विवादों का संबंध राजस्थान के राजधरानों के लोगों से जुड़ा है.

एक जयपुर राजघराने की गायत्री देवी की संपत्ति का विवाद है. दूसरा बाड़मेर राजधराने के जसवंत सिंह का और तीसरा भरतपुर राजधराने के नटवर सिंह का.

माना जाना चाहिए कि यह एक संयोग भर है और राजस्थान के बचे हुए राजवंशियों के लिए चिंता की कोई बात नहीं है.

सास की एक बहू

दिल्ली के एक पाँच सितारा अस्पताल में हर दोपहर एक महिला डॉक्टर दोपहर को किसी न किसी मरीज़ के कमरे में दस्तक देकर दाखिल होती हैं और विनम्रता से अनुमति लेकर टेलीविज़न पर एक सीरियल देखती हैं.

सीरियल का नाम है 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी'.

और ऐसा करने का कारण वह युवा डॉक्टर ख़ुद बता जाती हैं.

रात को घर पर पति देव यह कहकर सीरियल नहीं देखने देते कि 'यह सब बकवास देखने की कोई ज़रुरत नहीं', इसलिए दोपहर को रिपीट टेलीकास्ट में देखना पड़ता है.

गनीमत है कि इसमें सास की कोई भूमिका नहीं है.

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