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शुक्रवार, 11 अगस्त, 2006 को 08:43 GMT तक के समाचार
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बात इज़्ज़त की
बिंदास बाबू
(बिंदास बाबू की डायरी)

‘बात जब इज़्ज़त पर आ गई है तो दारा सिंह चोटों की परवाह नहीं करता. यह कभी पहलवान दारा सिंह का बयान हुआ करता था.

दिल्ली की दीवारों पर ‘फ्री स्टाइल’ कुश्ती के पोस्टर चिपकाए जाते. दारा सिंह को किसी राक्षसनुमा पहलवान से पिटता दिखाया जाता. तब दारा सिंह अगले दिन ललकार कर कहते,' बात जब इज़्ज़त पर आ गई है. दारासिंह चोटों की परवाह नहीं करता.'

यह नारा अपना काम करता. लोग फ्री स्टाइली कुश्ती देखने टूट पड़ते. टिकट बिकतीं. कुश्ती हिट होतीं. दारा सिंह अंततः कुश्ती जीतते. इज़्ज़त के लिए जान पर खेला जाना इसी को कहते हैं.

भारतीय संस्कृति तो इज़्ज़त पर मर मिटने वालों से अटी पड़ी है. सम्मान के लिए लोगों ने क्या नहीं किया? ‘विरुद’ के लिए कौन सी बाजी नहीं लगाई?

सब जानते हैं कि दुर्योधन का जब द्रौपदी ने यह कहकर मजाक उड़ाया कि अंधों के बेटे अंधे होते हैं तो सिर्फ़ आत्मसम्मान की खातिर ही उसने द्रौपदी का चीर हरण किया कराया.

अरे. शूर्पणखा की नाक काटने के बदले सीताहरण क्या शूपर्णखा के आत्मसम्मान की रक्षा नहीं कहलाएगा?

 इज़्ज़त के लिए मर मिटने की बीमारी शाश्वत है. जात, कुल की इज़्ज़त की रक्षा के लिए लोग किसी भी हद तक चले जाते हैं. रोज़ की बात है. घर घर का सीन है

अरे अपने यहां तो लोग जरा सी बात पर सब कुछ लुटाने वाले ठहरे. बस एक बात के लिए जिए इज़्ज़त. आत्मसम्मान. आत्मगौरव.

इज़्ज़त के लिए मर मिटने की बीमारी शाश्वत है. जब कभी किसी को आत्मसम्मान पर ‘चोट’ लगे तो समझिए कि वह अब सारे काम छोड़कर उसकी रक्षा पर उतारू है.

वह मूंछों की रक्षा के लिए कुछ भी कर गुजरेगा. जात, कुल की इज़्ज़त की रक्षा के लिए लोग किसी भी हद तक चले जाते हैं. रोज़ की बात है. घर घर का सीन है.

आप दिल्ली की ब्लू लाइन बसों में देखे. कंडक्टर कहेगा तूने टिकट ले लिया. टिकट न लेने वाला कहेगा नहीं लिया तू के करेगा?

कंडक्टर कहेगा ओए मुंह संभाल के बात कर. तू ने मुझे तू कह करके कैसे बोला? तेरी ये हिम्मत. तेरी तो...

टिकट न लेने वाला जवाब देगा. ओए तुने गाली कैसे दी. तेरी तो... और देखेंगे कि देखते-देखते फाइट शुरू हो गई है.

फाइट ‘तू’ कहने को लेकर हुई थी. फाइट इज़्ज़त की खातिर हुई थी. फाइट की खातिर दोनों पुलिस के हवाले हो जाएं. उनकी बला से.

बात इज़्ज़त की

बात इज़्ज़त पर बन आती है तो उसके लिए सब कुछ दांव पर लग जाता है.

तो भैया पिछले दिनों एक पुस्तक लेखक ने अपने ‘सम्मान की पुकार’ पर अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया.

कह दिया कि मोर के घर चोर है मोर वाले बोले कि चोर है तो रिर्पोट करो. वो बोला चोर के पांव नहीं होते.

 कहावत है सो इतना ही मालूम है कि चोर तो था. कहां था किसका था नहीं मालूम. अब सारा देश हँस रहा था मगर भाई साहब थे कि इज़्ज़त पर अड़े थे. नाम पता पहचान कुछ नहीं जानते थे बस ‘चोर चोर’ चिल्ला रहे थे

कहावत है सो इतना ही मालूम है कि चोर तो था. कहां था किसका था नहीं मालूम. अब सारा देश हँस रहा था मगर भाई साहब थे कि इज़्ज़त पर अड़े थे. नाम पता पहचान कुछ नहीं जानते थे बस ‘चोर चोर’ चिल्ला रहे थे.

हिंदी साहित्य के विद्यार्थी जानते हैं कि हिंदी कविता में छायावाद रहा है. इसमें सत्य नहीं होता था सत्य की ‘छाया’ रहती थी. सत्य तो हाथ आता नहीं. उसकी छाया से ही काम चलता था.

जब कोई पूछता भाई अपने सच की नाम बताओं तो कवि छाया में खड़े होकर कविता करने लगता.

‘तुम कौन अजे द्युति मान
जान मुझको अबोध अज्ञान
निमंत्रण देते मुझको मौन
बता दो तुम हो कौन.’

और भाई जी. जवाब कभी नहीं मिलता. इसे रहस्यवाद कहा गया.

इन दिनों हमारे नायकों के बीच इज़्ज़त की लड़ाई छायावादी रहस्यवादी अंदाज़ में चल रही है. छाया में खड़े होकर राजनीति की छायावादी कविता की जा रही है कि मालूम नहीं मगर इतना मालूम है कि कुछ तो था.चाहे गोलमोल से. मगर था.

ऐसे ही मौके के लिए कविवर गिरिधर राय ने कहा है

बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछताय
काम बिगारै आपनौ जग में होत हंसाय.
तो भाई जी मर कर हँसो.

(बिंदास बाबू की डायरी का यह पन्ना आपको कैसा लगा लिखिए [email protected] पर)

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पद का मतलब ही लाभ है. जो बिना पद हैं वह निर्गुण, निराकार हैं या शून्य हैं.
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