|
आख़िर मिल ही गया कबीर सम्मान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हिंदी के प्रसिद्ध कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी को मंगलवार शाम भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम में ‘आख़िरकार’ राष्ट्रीय कबीर सम्मान से नवाज़ा गया. पिछले 50 साल से कविता सृजन कर रहे अशोक वाजपेयी को इस सम्मान के लिए निर्णायक मंडल ने सर्वसम्मति से चुना था. लेकिन सूत्रों के अनुसार मध्यप्रदेश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकार कांग्रेस के क़रीबी समझे जाने वाले इस हिंदी कवि को अलंकृत करने में आनाकानी करती रही. भाजपा चाह रही थी कि निर्णायक मंडल की बैठक दोबारा बुलाई जाए. सांस्कृतिक केंद्र ‘भारत भवन’ में आयोजित अलंकरण समारोह में मुख्य अतिथि होने के बावजूद राज्य के संस्कृति मंत्री अंत समय में गैरहाज़िर हो गए. व्यंग्य से भरे अपने धन्यवाद भाषण में अशोक वाजपेयी ने आभार प्रकट किया कविता का ‘‘जिसने यश और सम्मान दिया, फिर जूरी का जिन्होंने उन्हें ही चुना और मध्यप्रेदश शासन का जिसने इस सिफ़ारिश को स्वीकार किया.’’ व्यंग विचारों की विभिन्नता को ही भारतीय संस्कृति की विशिष्टता बताते हुए उन्होंने कहा कि यह याद दिला देना ज़रूरी है कि पहला कबीर सम्मान भारतीय जनसंघ के क़रीबी समझे जाने वाले गोपाल कृष्ण अडिग को दिया गया था. तीन बार यह वामपंथी विचारधारा से जुड़े कवियों को गया है जिनका उस समय की सरकारों से कोई संबंध नहीं थी. उनका लहजा व्यंग्यात्मक रहा. उन्होंने कहा, ‘‘और अब पुरस्कार पाने वाला मैं स्वयं वर्तमान शासन का वैचारिक और राजनीतिक रूप से विरोधी हूँ और आपने मेरा नाम स्वीकार कर प्रजातंत्र का सबूत दिया है.’’ कटाक्ष का यह सिलसिला तब रुका जब चाय-नाश्ते का ब्रेक हुआ जिसके बाद अशोक वाजपेयी ने अपनी चंद कविताओं का पाठ किया. शुरूआत की उन्होंने 1964 में अपनी आईएएस परीक्षा के दिनों में लिखी कविता से. ‘‘लौट कर जब आऊंगा इसी क्रम में उन्होंने सुनाया- हमारी दुनिया जिसमें कवि कहता है कि हमारी बनाई दुनिया हमारे बाद नहीं बल्कि हमारे साथ ही नष्ट होती रहती है. हमारे सामने, हमारे द्वारा... भूलने से शुरूआत होती है नष्ट होने की | इससे जुड़ी ख़बरें असग़र वजाहत को इंदु शर्मा सम्मान06 मई, 2006 | मनोरंजन पत्र-पत्रिकाओं का एक अनूठा संग्रहालय23 फ़रवरी, 2006 | मनोरंजन 'प्रेमचंद की प्रासंगिकता बनी रहेगी'29 जुलाई, 2005 | मनोरंजन 'साहित्य में ही है मूल्यों की राजनीति'13 जून, 2005 | मनोरंजन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||