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गुरुवार, 29 जून, 2006 को 06:37 GMT तक के समाचार
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ट्रेन में गाने वाला वो लड़का...

सलीम
सलीम सड़क पर खड़े होकर गाने सुनता है और ऐसे ही सीखता है
दिल्ली के हज़रत निज़ामुद्दीन स्टेशन से मथुरा तक ट्रेन से यात्रा करते हुए यह बच्चा अक्सर दिख जाता है.

मगन होकर गाने गाता हुआ.

हाथों में एस्बेस्टस शीट के दो छोटे टुकड़े लिए हुए, जिसे वह गाने के साथ संगत के लिए वाद्य की तरह बजाता है.

और बदले में उम्मीद करता है रुपए-दो रुपए की.

नाम है सलीम और वह अपनी उम्र बताता है 12 साल.

सलीम से पूछा कि कहाँ रहते हो, तो उसने एक ही साँस में बताया, "कमालगंज नई बस्ती शास्त्री नगर ज़िला फ़र्रुख़ाबाद डाकखाना कमालगंज."

वह बताता है कि उसने गाना अपने पिता से सीखा जो बैंड में गाना गाते थे लेकिन इन दिनों वे गाना छोड़ चुके हैं और अब 'साइकिल का काम' करते हैं.

सलीम 'कब तक याद करुँ मैं उसको, कब तक अश्क बहाऊँ.....' से लेकर 'दिल का आलम मैं क्या बताऊँ तुझे....' बारह-तेरह गाने सुना सकता है.

लेकिन उसे सबसे अच्छा गाना कौन सा लगता है, पूछने पर गाने लगता है, 'बेदर्दी से प्यार का सहारा न मिला, ऐसा बिछड़ा वह मुझसे न दोबारा मिला...' और पूरा गाकर ही रुकता है.

ट्रेन की आवाज़ के बीच लोगों को गाना सुना-सुनाकर वह मानो सध गया है. जितनी देर गाता रहता है अच्छा लगता है.

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का पोता

बताता है कि एक दिन में वह कोई पचास साठ रुपए आसानी से कमा लेता है और ज़्यादातर पैसे खर्च भी कर देता है.

 मेरे दादा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे. उनके पास बहुत जायदाद थी, लेकिन वह मर गए...
सलीम

एकाध महीने में कभी घर लौटता है तो अपनी माँ को दो-तीन सौ रुपए देता है.

घर पर माँ-बाप के अलावा एक भाई है और एक बहन.

जैसा वह बताता है, "भाई मुझसे छोटा है लेकिन दिखता बड़ा है, बहन मुझसे बड़ी है लेकिन दिखती छोटी है."

उसके घर पर कढ़ाई का छोटा मोटा काम होता है और उसी से घर का खर्च चलता है.

सलीम को वह काम पसंद नहीं, गाना पसंद है, इसलिए घर से भाग आता है.

लेकिन सलीम के पिता को सलीम का गाना गाना बिलकुल पसंद नहीं. वह इस बात पर सलीम की पिटाई कर देते हैं कि वह ट्रेन में गाना गाकर भीख माँगता है.

हालांकि सलीम इसे भीख माँगना नहीं मानता, लेकिन वह कहता है, "मेरा बाप बहुत ख़राब है ना."

सलीम का वाद्य
इस वाद्य पर संगत भी सलीम ख़ुद ही करता है

उसके पिता चाहते हैं कि सलीम अपने परिवार के अमरूद के बाग़ों की देखभाल करे. वह बताता है कि उनके अमरूद के पाँच बाग़ हैं.

और आख़िर में वह धीरे से बताता है, "मेरे दादा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे. उनके पास बहुत जायदाद थी, लेकिन वह मर गए..."

एक क्षण की चुप्पी के बाद थोड़ी ज़ोर से दोहराता है, "लेकिन अब तो वह मर गए..." मानों ख़ुद को भरोसा दिला रहा हो.

उस मालूम है कि दादा जी थे तो पैसा मिलता था और जब वह मरे थे तब भी पैसा मिला था. वह बताता है, "छह हज़ार सात सौ रुपए."

उसके पिता के चार भाई हैं और सबके सब जुआ खेलने के आदी हैं और इसलिए सलीम उन जैसा नहीं बनना चाहता.

ट्रेन में गाना इसलिए गाता रहता है क्योंकि किसी ने उससे कहा है कि 'पिरेक्टिस करते रहोगे तो गाना सीख जाओगे.'

वह गाता रहता है. ट्रेन की धड़धड़-खड़खड़ के बीच भी. हिकारत की नज़रे झेलकर भी और दुत्कार सहकर भी.

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