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'हम अभी भी डरते हैं..भागते हैं...' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
"हम अभी भी डरते हैं, भागते हैं, ऊपर की तरफ़ जहाँ पत्थर नहीं हैं. समतल जगह हो जहाँ पर. जब भी झटका लगता है, हम भागते हैं..." नौ वर्ष के सादिक के दिमाग पर कुछ ऐसा ही असर छोड़ा है भूकंप ने. स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या शायद सिर पर छत के बाद सबसे बड़ी दिक्कत है. पर एक और समस्या जिसे अभी तवज्जो नहीं दिया जा रहा है, वह है यहाँ बचे लोगों पर मानसिक तनाव. सादिक जैसी मानसिक स्थिति यहाँ कई बच्चों की है जिन्हें आज भी भूकंप के बारे में सोचने भर से डर लगता है. सादिक के पड़ोस में ही रहनेवाली एक महिला बताती हैं, "बच्चों के मन में ज़लज़ले को लेकर डर बैठ गया है. पिछले रोज़ ही सवेरे क़रीब सवा चार बजे फिर एक तेज़ झटका महसूस किया था. अब तो हम समझ गए हैं पर बच्चे डर जाते हैं." इस क्षेत्र में लोग अभी भी भूकंप के झटके महसूस कर रहे हैं और शायद इसीलिए यहाँ सरकार ने फ़ैसला लिया है कि भले ही स्कूल का काम कर रहे कामचलाऊ शेड्स में पढ़ाई इत्यादि न हो सके पर स्कूल ज़रूर खुलेंगे. दिल है छोटा-सा एक स्थानीय अध्यापिका बताती हैं, "हम बच्चों से उनके घर के बारे में पूछते हैं. उनके घर के लोगों के हालचाल का बारे में बात करते हैं. यह भी पूछा कि उस वक्त ये लोग कैसे निकले." परेशानी स्वाभाविक है. घरों का अचानक ढह जाना, सारा सामान-जीवन सबकुछ पूरा बिखर-सा गया है. जब बड़े लोग ही अपनेआप को लाचार और असहाय पा रहे हों तो बच्चे, ज़ाहिर-सी बात है कि और घबरा गए होंगे. दिल्ली में एक जानी-मानी मनोवैज्ञानिक डॉ. अरुणा ब्रूटा कहती हैं, "जब इस तरह के हादसे होते हैं तो लोगों को दवाइयां देने के लिए कई चिकित्सक जाते हैं ताकि रोग न फैल जाए लेकिन कोई मनोवैज्ञानिक उस टीम में नहीं होता जो उन लोगों से बातचीत कर सके कि वो क्या महसूस कर रहे हैं." मनोवैज्ञानिक इलाज उन्होंने बताया कि मनोवैज्ञानिक लोगों से बार-बार उस हादसे के बारे में पूछते हैं जिससे पहले तो लोगों की पीड़ा बढ़ती है पर धीरे-धीरे उन्हें हल्कापन महसूस होने लगता है और इससे उनके दिलोदिमाग को काफ़ी राहत मिलती है. एक समाजसेवी चिकना दवे, गुजरात से यहाँ विशेष रूप से बच्चों के साथ काम करने आईं हैं. उनका कहना है कि इस बार मरने वालों में बच्चों की संख्या ज़्यादा है. दवे बताती हैं, "बच्चों के लिए भूकंप एक नए तरह का हादसा था. इसका उनके दिमाग पर काफ़ी असर पड़ा है. हम बच्चों के साथ खेल रहे हैं, उस हादसे पर भी चर्चा कर रहे हैं ताक़ि वह उनके दिमाग़ से निकल सके." इस समय राज्य में ऐसी कई ग़ैर-सरकारी संस्थाएं हैं जो वहाँ लंबे समय तक काम करने के उद्देश्य से हैं लेकिन बर्फ़ से बचाना, ग़रम कपड़े दिलवाना और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना इतनी बड़ी प्राथमिकताएं हैं कि इन प्राथमिकताओं के सामने बेचैनी, घबराहट, ख़ौफ़ जैसे सवाल छोटे लगने लगते हैं. हाँ मगर इन तमाम बड़ी सुविधाओं और सेवाओं के बीच इन छोटे बच्चों की मानसिक स्थिति को लेकर जो सवाल उठते हैं और जो चुनौतियां पैदा होती हैं, वे इतनी छोटी भी नहीं हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें 'चार हफ़्ते में सब कुछ नहीं सुधर सकता'06 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस लेकिन हौसले हैं अब भी बुलंद08 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस लोगों को एक आशियाने की तलाश 08 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस कुपोषण से बच्चों की बढ़ती मौत07 जुलाई, 2004 | भारत और पड़ोस सिखों का दल मदद करने पहुँचा 26 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस टीकाकरण अभियान तेज़ हुआ12 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस राहत कार्यों पर पैसे की कमी की मार28 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस नियंत्रण रेखा के पास राहत शिविर तैयार24 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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