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नाज़ुक कंधों पर बंदूकों का बोझ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
" नाम जान कर क्या करेंगे? नाम तो कुछ भी हो सकता है- पिंटू, गुड्डू, छोटू, मोटू... नाम में क्या धरा है?" शरीर पर हरे रंग की वर्दी और कंधे पर देसी स्टेनगन लटकाए लगभग 10 साल के उस बच्चे ने सवाल के जवाब में यह सवाल किया तो लगा कि यह महज़ मुंबइया फ़िल्मों का असर है. लेकिन जल्दी ही समझ में आया कि मैं ग़लत था. असल में ये सारे नाम उसी बच्चे के थे. यह एक नक्सली कैंप था, जहां 10 से 16 साल की उम्र के लगभग 2 दर्जन हथियारबंद बाल नक्सली अभ्यास में व्यस्त थे. जिस बच्चे ने हमें अपने नाम को लेकर यह टका-सा जवाब दिया था, उसी ने हमें बताया कि उसका नाम पप्पू है. पिछले एक साल से पप्पू नक्सली संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के सोन गंगा ज़ोनल क्षेत्र का सदस्य है. पिता नक्सली संगठन पार्टी यूनिटी में थे और एक पुलिस मुठभेड़ में उनकी मौत के बाद वह नक्सली दस्ते में शामिल हो गया. तब से वह गांव और जंगलों की खाक़ छान रहा है. उसके ज़िम्मे कई काम हैं- वरिष्ठ नक्सली साथियों के हथियार ढोना, भोजन सामग्री लाना-ले जाना, सूचनाओं का आदान-प्रदान... और कभी-कभी नक्सली कार्रवाइयों में शामिल हो कर हथियार चलाना. प्रशिक्षण 14 नवंबर को जब सारा देश बाल दिवस मना रहा होगा, उस दिन भी सैकड़ों छोटे-छोटे बच्चे हाथो में हथियार थामे झारखंड के जंगलों में भटक रहे होंगे. पुलिस अधिकारियों की मानें तो आज की तारीख़ में झारखंड के कई ज़िलों में आधे से अधिक नक्सली ऐसे हैं, जिनकी उम्र 16 साल से कम है. कुछ इलाकों में तो 9-10 साल के बच्चों ने हथियार थाम लिए हैं. नक्सली संगठनों में छोटे बच्चों के शामिल होने की यह कोई पहली घटना नहीं है. शुरुवाती दौर में नक्सली संगठनों द्वारा इन बच्चों का इस्तेमाल केवल सूचना के आदान-प्रदान के लिए किया जाता था. इसके अलावा नक्सली संगठनों की खुली सभा या जन अदालत में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने का काम बच्चे करते थे. लेकिन अब दृश्य बदला हुआ है. बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ में सक्रिय नक्सली संगठन भाकपा माओवादी द्वारा इन दिनों सैकड़ों की संख्या में 10 से 16 साल की उम्र के बच्चों को हथियार चलाने और बारूदी सुरंग बिछाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. जिस उम्र में बच्चों के हाथों में क़लम और किताब होने चाहिए थे, इन बच्चों के हाथों में घातक हथियार हैं. झारखंड के लगभग हर ज़िले में नक्सलियों का ऐसा बाल दस्ता है, जिनमें 18-20 बच्चे शामिल हैं. कुछ इलाके में तो ऐसे बाल नक्सली दस्ते की संख्या दर्ज़नों में है. नक्सली दस्ते में शामिल अधिकांश बच्चे दलित, पिछड़े और आदिवासी वर्ग के हैं. इन में से कुछ बच्चों के अभिभावक अपने-अपने गांवों में हैं तो कुछ के इन नक्सली संगठनों में ही. ये बच्चे इन दस्तों में पूरा दिन या दो-चार दिन रहने के बाद अपने घर लौट जाते हैं. लेकिन कुछ बच्चे ऐसे भी हैं, जिनके परिवार वाले पुलिस या भूपतियों की सेना के हाथों मारे गए और जिनके पास लौटने के लिए कोई घर ही नहीं बचा. आदर्श नागरिक? नक्सलियों के हथियारबंद दस्तों में बच्चों की कोई तयशुदा दिनचर्या नहीं है. अलग-अलग दस्ते के अपने-अपने नियम-क़ायदे हैं. लेकिन रुखा-सूखा खाना और कठिन परिस्थितियों में दिन गुज़ारना इन बच्चों की जीवन शैली बन चुका है. दिनचर्या चाहे जैसी भी हो, लेकिन हर वक़्त इन के सर पर मौत का साया मंडराता रहता है. हालांकि नक्सली संगठन मानते हैं कि वो इन बच्चों को आदर्श नागरिक बना रहे हैं. चतरा इलाके में सक्रिय सब ज़ोनल कमांडर आकाश कहते हैं- "अशिक्षा, ग़रीबी और शोषण की मार सहने वाले इन बच्चों को हम संगठन में शिक्षा देने का भी काम कर रहे हैं. आम तौर पर इन्हें हथियारबंद दस्ते में सक्रिय भूमिका नहीं दी जाती. लेकिन ज़रुरत के हिसाब से इन्हें हथियारों का प्रशिक्षण देना ही पड़ता है."
आकाश का दावा है कि इन बच्चों को नक्सली संगठन में शामिल करके वो एक ऐसी क्रांतिकारी फ़ौज़ का निर्माण कर रहे हैं, जो आने वाले दिनों में शारीरिक और मानसिक रुप से हर ख़तरे का सामना कर पाने में सक्षम होगा. पुलिस अधिकारी नक्सली संगठनों में बच्चों के इस्तेमाल को अमानवीय मानते हैं. उनकी राय में नक्सली इन बच्चों को मोहरा बना रहे हैं. रांची ज़ोन के आइजी डी के पांडेय कहते हैं कि नक्सलवाद अब केवल 'मनी गेम' है यानी पैसे का खेल. वे कहते हैं, "नक्सलियों के लिए नीति और सिद्धांत जैसे शब्द अब बेमानी हो गए हैं." लेकिन इन नक्सली संगठनों में शामिल बच्चों की राय कुछ अलग ही है. अपने घर में रह कर पढ़ने-लिखने की सलाह देने पर बाल नक्सली विशाल मुस्कराता है. 10-11 साल का विशाल कहता है, "घर में रहते तो भूखों मर जाते. ज़िंदा रहते भी तो जानवरों की तरह. यहां कम से कम खाना तो मिल रहा है. समाज और सरकार हम ग़रीबों के लिए क्या कर रही है, यह गांवों में जा कर क्यों नहीं देखते?" गहरे आक्रोश से भरे इन शब्दों को सुनने के बाद यह तय करना आसान था कि ये महज़ मुंबइया फ़िल्मों का असर नहीं है. लेकिन क्या विकास के आंकड़ों को बेलने और खेलने वाले राजनेता विशाल की आवाज़ सुन रहे हैं? | इससे जुड़ी ख़बरें 'नक्सलवाद के पीछे व्यवस्था की विफलता'23 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस छत्तीसगढ़ में नक्सलियों पर प्रतिबंध05 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस आंध्र में नक्सली गुटों पर फिर पाबंदी17 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस बस्तर के जंगलों में नक्सलियों से साथ कुछ दिन22 जून, 2005 | भारत और पड़ोस नक्सलवादी आंदोलन से दुखी हैं कानू सान्याल24 नवंबर, 2004 | भारत और पड़ोस बदल गया है नक्सलबाड़ी का चेहरा26 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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