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भारतीय फ़िल्मों की आवाज़ के 75 बरस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
75 वर्ष पहले 14 मार्च 1931 का दिन भारतीय फ़िल्म का ऐतिहासिक दिन था, क्योंकि उस दिन जागा था आवाज़ का जादू और बोल उठी थीं तस्वीरें. यह वह दिन था जब अर्देशर ईरानी की फ़िल्म 'आलम आरा' मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा हॉल में रिलीज़ हुई थी. यह भारत की पहली बोलती फ़िल्म थी जिसने मूक फ़िल्मों के दौर की समाप्ति का एलान किया था. दादा साहेब फ़ाल्के की फ़िल्म 'राजा हरिश्चंद्र' के 18 वर्ष बाद आने वाली फ़िल्म 'आलम आरा' ने हिट फ़िल्मों के लिए एक मापदंड स्थापित किया, क्योंकि यह भारतीय सिनेमा में इस संदर्भ में पहला क़दम था. हालाँकि दूसरे देशों में बोलती फ़िल्मों का निर्माण 1926 में 'डॉन जुआन' और 1928 में 'लाईट्स ऑफ़ न्यूयॉर्क' के निर्माण से हो गया था. लेकिन हिंदी-उर्दू भाषा में बनी इस फ़िल्म के प्रदर्शन के साथ ही शुरू हुआ भारतीय फ़िल्म जगत में प्लेबैक गायिकी और प्लेबैक संगीत का एक ऐसा दौर जो आज तक भारतीय फ़िल्म की जान और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी पहचान बना हुआ है. यादें हिंदी फ़िल्मों में चरित्र अभिनेता के तौर पर अपनी अलग जगह बनानेवाले वरिष्ठ अभिनेता ए के हंगल ने एक समाचार एजेंसी से कहा कि जब आलम आरा रिलीज़ हुई तो वे उस ज़माने में 18-20 वर्ष के थे और इस फ़िल्म को उन्होंने पेशावर में देखा था जो अब पाकिस्तान में पड़ता है. उन्होंने कहा,"आज की तुलना में उस फ़िल्म की आवाज़ और एडिटिंग बहुत ख़राब थी लेकिन फिर भी उस ज़माने में हम लोग इस फ़िल्म को देख कर दंग रह गए थे." फ़िल्म आलम आरा के निर्माता और निर्देशक अर्देशर ईरानी ने इस फ़िल्म के बनाने में आई कठिनाईंयों का उल्लेख करते हुए एक बार कहा था कि उस ज़माने में कोई साउंड-प्रूफ़ स्टेज नहीं था. उन्होंने कहा,"चूँकि हमारा स्टूडियो एक रेलवे लाईन के पास था इस लिए अधिकतर शूटिंग रात में करनी पड़ी जब रेल की आवा-जाही कम होती थी." अर्देशर ईरानी ने बताया था कि उनके पास एक ही रिकार्डिंग उपकरण 'तमर रिकॉर्डिंग सिस्टम' था जिससे रिकार्डिंग की गई थी. उन्होंने कहा था कि उनके पास कोइ बूम माइक भी नहीं था इस लिए माइक्रोफ़ोन को कैमरे के रेंज से अलग अजीब-अजीब जगह छुपा कर रखा गया था. नया युग
बहरहाल इन सारी कठिनाईयों के बीच बनी आलम आरा ने आने वाले ज़माने के लिए एक नए युग का द्वार खोल दिया और फिर भारतीय सिनेमा ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. 'आलम आरा' की क़ामयाबी को देखते हुए तीसरे ही सप्ताह में उर्दू फ़िल्म 'शीरी-फ़रहाद' आई. इस फ़िल्म में आलम आरा के मुक़ाबले तीन गुना गीत थे जो जहाँआरा कज्जन और मास्टर निसार की आवाजों में गाए गए थे. गाने आर.सी.ए फ़ोटोफ़ोन पर रिकॉर्ड किए गए थे. फ़िल्म को ज़बरदस्त क़ामयाबी मिली. इसके बाद और भी भाषाओं में बोलती फ़िल्में आईं. 1931 में ही बंगाली फ़िल्म जमाई षष्ठी, तमिल में कालीदास और तेलुगू में भक्त प्रह्लाद रिलीज़ हुई. पूना स्थित राष्ट्रीय फ़िल्म संग्रहालय के एक अधिकारी के अनुसार आलम आरा के बाद से अभी तक 30 से 35 हज़ार बोलती फ़िल्में बन चुकी हैं. आज भारत में हर वर्ष औसतन 1000 छोटी-बड़ी फ़िल्मों का निर्माण हो रहा है जोकि अमेरिका में बनने वाली फ़िल्मों की संख्या के हिसाब से दुगुना है. एक अनुमान के मुताबिक़ 60 ख़रब रुपए का सालाना कारोबार होता है और जिससे लगभग 60 लाख लोग जुड़े हुए हैं. |
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