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पुरी में अलग तरह का फ़िल्म महोत्सव | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उड़ीसा में आजकल एक अलग सा फ़िल्म महोत्सव हो रहा है जिसमें न कोई एंट्री फ़ॉर्म है, न दाख़िला की जटिल प्रक्रिया है और न ही कोई लालफीताशाही ही है. 'ब्रिंग यॉर ओन फ़िल्म फ़ेस्टिवल' यानि 'अपनी फ़िल्म लाएँ फ़िल्म महोत्सव' एक ऐसा अनोखा महोत्सव है जिसमें फ़िल्म दिखाने के लिए देश-विदेश के निर्माताओं की भीड़ लगी हुई है. उड़ीसा के पुरी शहर में समुद्र तट पर वर्ष 2004 से हर साल फ़रवरी महा में ये महोत्सव होता है और जिस किसी ने किसी भी तरह की फ़िल्म बनाई हो वह अपनी फ़िल्म दिखा सकता है. राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले फ़िल्म निर्माता कपिलास भूयान जो आयोजकों में से एक हैं, कहते हैं कि ये कुछ नए फ़िल्म निर्माताओं ने शुरु किया, और अब ये युवा और गंभीर फ़िल्म निर्माताओं के लिए प्रदर्शन करने का अच्छा मंच बन गया है. लेकिन एक सवाल ये है कि आयोजक फ़िल्म की गुणवत्ता किस तरह से सुनिश्चित करते हैं.
एक आयोजक का मानना है, "भारत में हल साल करीब 900 फ़िल्में बनती हैं और दो फ़िल्में भी कान फ़िल्म महोत्सव नहीं पहुँच पातीं. क्या इसका मतलब ये हैं कि बाकी की फ़िल्में बुरी होती हैं? ऐसा महोत्सव जिसमें कोई भी भाग ले सकता है, यदि उसमें कुछ बुरी बनाई फ़िल्में भी दिखाई जाएँ तो ये ऐसा जोखिम है जो उठाया जा सकता है." फ़िल्म निर्माता हिमांशु खातुआ कहते हैं, "पुरी महोत्सव में ऐसी प्रतिभा सामने आई है जो अन्य फ़िल्म महोत्सवों के कड़े नियमों के कारण छिपी रही है." फ़िल्में समुद्र तट पर एक बड़ा सा तंबू लगाकर खुले आसमान के नीचे दिखाई जाती हैं और इस बार 126 फ़िल्में दिखाई गईं और भारत और विदेश से 320 निर्माताओं ने महोत्सव में भाग लिया. दिलचस्प है कि जहाँ श्यामल गुप्ता की 94 मिनट की फ़िल्म 'काउँटडाउन' सबसे लंबी थी वहाँ रोहित रंजन की दो मिनट की फ़िल्म 'इन ए ट्रैंस' सबसे छोटी थी. पिछले साल राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित निर्माता सुप्रियो सेन की देश के विभाजन पर बनी डॉक्यूमेंट्री - 'वे बैक होम' दिखाई गई थी जिसे वर्ष 2003 में मैनचैस्टर में हुए राष्ट्रमंडल फ़िल्म महोत्सव में बीबीसी अवार्ड मिला था. कई जाने-माने भारतीय फ़िल्म निर्माता जैसे राकेश शर्मा, सनी जोज़फ़ और आनंद पटवर्धन वहाँ अपना काम दिखा चुके हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें हेमा ने फिर उठाया निर्देशन का बीड़ा03 फ़रवरी, 2006 | मनोरंजन सिर्फ़ बातें ही नहीं करते शत्रुघ्न21 अक्तूबर, 2005 | मनोरंजन बँटवारे का दर्द फिर महसूस किया गया17 फ़रवरी, 2005 | मनोरंजन दंगे की सादा मगर सशक्त कहानी23 फ़रवरी, 2005 | मनोरंजन हिंदू-सिख समुदाय को हैं शिकायतें बहुत06 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस सत्य साईंबाबा: भगवान या...?18 जून, 2004 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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