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सोमवार, 27 फ़रवरी, 2006 को 09:07 GMT तक के समाचार
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आदिवासी कला के कलाकार ग़ैर आदिवासी

बस्तर के कलाकार
इन कलाकारों को कच्चा माल ख़रीदने के लिए सरकार से कोई छूट नहीं मिल पाती
ये अपने आपमें दिलचस्प तथ्य है कि बस्तर की जिन कलाकृतियों को पूरी दुनिया में आदिवासियों की कला के नाम से बेचा जाता है उन्हें गढ़ने वाले कलाकार ख़ुद आदिवासी नहीं हैं.

न उन्हें आदिवासियों के लिए लागू सरकारी योजनाओं का लाभ मिलता है और न कोई अतिरिक्त संरक्षण.

लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि सरकारी सूची में कलाकारों के आदिवासी होने न होने से आदिवासी कला का दर्जा नहीं बदलता और वह 'आदिवासी कला' ही रहती है.

चाहे वो बेल मेटल की अनुपम कृतियाँ हों या मिट्टी यानी टेराकोटा से बनी कलाकृतियाँ या फिर बाँस से बनी वस्तुएँ, बस्तर में बनी हर कलाकृति का जानकार लोगों के लिए एक अलग महत्व है और इन वस्तुओं का एक अलग बाज़ार है.

लेकिन सरकारी दस्तावेज़ों में जो तकनीकी चूक हुई है उसने इन कलाकृतियों को गढ़ने वाले कलाकारों के साथ बड़ा अन्याय किया है.

अन्याय

ये सारे कलाकार पीढ़ियों से बस्तर के जंगलों में रहते आए हैं लेकिन वे आदिवासी नहीं माने गए.

उदाहरण के तौर पर देखें तो बेल मेटल यानी पीतल की मूर्तियाँ बनाने वाले कलाकार रहते तो बस्तर के जंगलों में ही हैं लेकिन वे गढ़वा जाति के हैं जो सरकारी आँकड़ों में आदिवासी जाति नहीं हैं.

बस्तर के कलाकार
बस्तर की कलाकृतियाँ देश विदेश में बिकती हैं

मिट्टी या टेराकोटा का काम करने वाले कलाकार अपने पूरे आदिवासीपन के बावजूद कुम्हार हैं. लकड़ी का शिल्प बढ़ई बना रहे हैं और लौहशिल्प लोहरा जाति के लोग.

कपड़ों पर कलात्मक काम करने वाले पनका जाति के लोग हैं तो बाँस का काम करने वाले बँसोड़.

चाहे वो गढ़वा हों, कुम्हार, लोहरा या पनका वे बस्तर के सुदूर इलाक़ों में रहने वाले लोग हैं और अपने रहने सहन में वे किसी आदिवासी से बिल्कुल भी अलग नहीं हैं लेकिन अपने आदिवासीपन के बावजूद सरकारी आँकड़ों में ये सब पिछड़ी जाति में हैं.

यक़ीनन उनके आदिवासी होने न होने से उनकी कला प्रभावित नहीं होती लेकिन कलाकार इससे बहुत प्रभावित हो रहे हैं.

दरअसल सरकार की नीति है कि आदिवासियों कलाकारों को कच्चा माल रियायती दरों पर उपलब्ध करवाया जाए.

लेकिन चूंकि बस्तर के ज़्यादातर कलाकार आदिवासी यानी अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल नहीं हैं उन्हें यह सुविधा नहीं मिलती.

हेमंत कश्यप
हेमंत कश्यप मानते हैं कि सरकार की ग़लत नीति का खामियाजा आदिवासी भुगत रहे हैं

बस्तर से प्रकाशित होने वाले एक अख़बार के संपादक हेमंत कश्यप कहते हैं, "सरकार से हुई इस चूक का खामियाजा कलाकारों की पीढ़ियाँ भुगत रही हैं और उन्हें कच्चामाल बाज़ार भाव से और कई बार अधिक क़ीमत पर ख़रीदना पड़ता है."

वे कहते हैं कि बिचौलियों और व्यापारियों के शोषण से पहले से ही परेशान इन कलाकारों को जी-तोड़ मेहनत के बावजूद अपना पेट भरने लायक पैसा भी ले देकर मिल पाता है.

यदि इन कलाकारों को सरकार कच्चा माल रियायती दरों पर उपलब्ध करवाती है, जैसा कि कई दूसरों प्रदेशों में होता है, तो उनको वाजिब मुनाफ़ा मिल सकता है. लेकिन उन कलाकारों की गुहार कोई सुन नहीं रहा है.

आदिवासी कला

इस कड़वी सच्चाई से जुड़ा है एक कड़वा विवाद यह है कि ग़ैर आदिवासियों के हाथों गढ़ी ये कलाकृतियाँ कितनी आदिवासी हैं?

कुछ मानव विज्ञानियों और विशेषज्ञों का कहना है कि इन कलाकृतियों को आदिवासी कला नहीं माना जा सकता.

लेकिन आदिवासी कलाकृतियों पर कई दशकों से काम कर रहे और उनके बड़े संग्राहक निरंजन महावर इस विवाद को बेवजह मानते हैं.

निरंजन महावर
निरंजन महावर का कहना है कि आदिवासी कला का विवाद की बेमानी है

वे बताते हैं, "दुनिया भर के मानव वैज्ञानिकों और कलाविदों ने मान लिया है जो कला आदिवासियों के लिए है और जो कलाकृतियाँ उनके जीवन शैली से पनपी है वह आदिवासी कला है."

वे कहते हैं कि अब इस निर्णय को ज़माना बीत गया लेकिन अगर लोग इसे अनजान हैं और ऐसे सवाल उठा रहे हैं तो इसे दुर्भाग्यजनक ही माना जाना चाहिए.

इसे पत्रकार हेमंत कश्यप भी ग़लत मानते हैं लेकिन वे मानते हैं कि सरकार की ओर से कलाकारों को संरक्षण देने की बजाय अभी भी उदासीन बनी हुई है.

वे मानते हैं कि आदिवासियों को यदि इन कलाओं से परिचित करवाया जा सके तो उनके सामने रोज़गार का संकट ख़त्म होगा.

 कला बचे इसके लिए ज़रुरी है कि कलाकारों को बचाया जाए
हरिलाल भारद्वाज, संचालक, साथी

ऐसा नहीं है कि सरकार ऐसा नहीं कर रही है. लेकिन जैसा कि हेमंत कश्यप कहते हैं, "हर साल जितने आदिवासी बच्चे इस कला को सीख रहे हैं उससे कहीं अधिक विदेशी आकर इसे सीख रहे हैं. पिछले साल ही 45 विदेशियों का एक दल आकर महीने भर रहकर यहाँ से सबकुछ सीख गया."

वे मानते हैं कि इससे आदिवासी कला को भी ख़तरा हो सकता है.

लेकिन आदिवासी कला को संरक्षण दे रही संस्था 'साथी' के संचालक हरिलाल भारद्वाज कहते हैं "कला बचे इसके लिए ज़रुरी है कि कलाकारों को बचाया जाए."

वे कलाकारों को बचा रहे हैं लेकिन इस बात पर अफ़सोस जताते हैं कि सरकार कोई प्रयास कर नहीं रही और ये मानने को भी तैयार नहीं है कि वो कुछ नहीं कर रही है.

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