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गुरुवार, 05 मई, 2005 को 12:26 GMT तक के समाचार
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'वन की देखभाल लोग ही कर सकते हैं'

जंगल
जंगलों में बड़ी संख्या में लोग रह रहे हैं
जंगलों को लेकर सरकार के जो आंकड़े हैं वे कभी भी विश्वसनीय नहीं रहे हैं क्योंकि वे वास्तविकता से कभी मेल नहीं खाते.

कहीं बर्फ़ से ढँकी चोटी जंगल दर्ज है तो कहीं घास के मैदान को जंगल बताया जाता है.

इसके उदाहरण भी कम नहीं हैं. महाराष्ट्र में चार ज़िलों में तीन लाख हेक्टेयर की जो ज़मीन आदिवासियों को भूमि सुधार के नाम पर दी गई थी और वह सरकारी आँकड़ों में जंगल थी.

इसी तरह मध्य प्रदेश में 14 लाख हेक्टेयर ज़मीन जहां कई बीस पच्चीस बरसों से किसान खेती कर रहे हैं उसे वन विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में जंगल बता दिया.

तो क्या वन विभाग के आँकड़ों पर इस तरह भरोसा किया जा सकता है? और फिर देखना होगा कि जो जंगल है वह गाँव का जंगल है या राष्ट्रीय वन का हिस्सा है.

आज़ादी के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पालन के नाम पर वन विभाग ने लाखों लोगों को बेघर कर दिया और वन कटकटवाकर अधिकृत नीति के तहत लुटवा दिया.

वन विभाग ने ही आज़ादी के बाद से 35 लाख हेक्टेयर वनों को काटा है. वन संरक्षण अधिनियम तो ख़ैर 1980 के बाद आया लेकिन इससे पहले 1976 में कृषि आयोग ने क्या अनुशंसा की थी कि प्राकृतिक वनों को काटो और व्यावसायिक फ़ायदे वाली फसलें लगाओ.

आख़िर झारखंड का आंदोलन क्यों शुरु हुआ, बस्तर में सागौन के जंगल उजाड़ने का आदेश किसने दिया था और उत्तरांचल में लोगों को चिपको आंदोलन चलाने की ज़रुरत क्यों पड़ी? और ये आंदोलन किसने खड़े किए? लोगों ने ही न. और अब तर्क दिया जा रहा है कि लोग जंगल संभाल नहीं पाएँगे.

उत्तरांचल में सात हज़ार वन पंचायतें हैं और 25-30 सालों से बिना किसी सरकारी सहायता के वे वनों की रक्षा कर रहे हैं और जैसा कि सैटेलाइट की तस्वीर बताती है वो वन उतने ही अच्छे हैं जितने कि लाखों खर्च करके बचाए हुए संरक्षित वन.

तो जब लोग बिना खर्च के वनों की रक्षा कर रहे हैं तो फिर क्यों इसके लिए वन विभाग के ज़रिए लाखों खर्च करके वनों को बचाया जाए.

इसलिए जंगल तो लोगों को ही दे देने चाहिए ताकि वे बचे रह सकें.

(केंद्र सरकार एक विधेयक लाने की तैयारी कर रही है जिसमें यह प्रावधान किया गया है कि वनों की सुरक्षा के लिए जंगलों में बसने वाले हर परिवार को ढाई हैक्टेयर ज़मीन आबंटित कर दी जाए. इस विधेयक के प्रारुप पर अभी लोग चर्चा कर रहे हैं और एक बहस छिड़ गई है कि क्या यही वनों, वन्य प्राणियों और आदिवासियों को बचाने का तरीक़ा है?)

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