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'सारे वन निजी हाथों में बर्बाद हुए हैं' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मैं मध्यप्रदेश के अपने अनुभवों से बता सकता हूँ कि वनों को निजी हाथों में देने का क्या हश्र हुआ. वहाँ 1951 में मालगुज़ारी ख़त्म की गई और जंगलों पर भी लोगों ने कब्ज़ा कर लिया और बाद में पता चला कि मालगुज़ारी से मुक्त किए गए 40 लाख हेक्टेयर जंगल नष्ट हो गए. इसी तरह बस्तर में (जो अब छत्तीसगढ़ का हिस्सा है) में राजनीतिक कारणों से लोगों को जंगलों में कब्ज़ा करवाया गया और अतिक्रमण के 28 लाख हेक्टेयर का जंगल नष्ट हो गया. इसका एक कारण तो यह है कि वन काटने के बाद खाली ज़मीन पर खेती नहीं हो सकती और दोबारा वहाँ नहीं उगाया जाता. और फिर अपने कब्ज़े की ज़मीन पर लोग पेड़ काटने से नहीं हिचकते. मालिक मकबूज़ा का मामला लें. यह निजी ज़मीन के जंगल का मामला है. निजी ज़मीन पर पेड़ों की कटाई रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट को कड़े निर्देश जारी किए गए. और यह आज की बात नहीं है. 1886 में फोरसाइट ने लिखा था कि अकबर और मुगल शासन से पहले ज़मीनें सार्वजनिक होती थीं और बाद में उस पर निजी कब्ज़ा शुरु हुआ. उन्होंने लिखा है कि इसके बाद ही वन नष्ट होने शुरु हुए. इसलिए तय है कि यदि एक एक परिवार को ढाई-ढाई एकड़ ज़मीन दे दी गई तो देश के वन नष्ट हो जाएँगे. निजीकरण से वन को नहीं बचाया जा सकता. वनों को बचाने का विकल्प तो एक ही है कि सहभागीदारी में वनों का संरक्षण हो. वन विभाग और लोग साथ मिलकर वनों को बचाएँ. लोग वन विभाग के साथ मिलकर तय करें कि वनों का दोहन कैसे होगा और उसकी सुरक्षा कैसी होगी. (केंद्र सरकार एक विधेयक लाने की तैयारी कर रही है जिसमें यह प्रावधान किया गया है कि वनों की सुरक्षा के लिए जंगलों में बसने वाले हर परिवार को ढाई हैक्टेयर ज़मीन आबंटित कर दी जाए. इस विधेयक के प्रारुप पर अभी लोग चर्चा कर रहे हैं और एक बहस छिड़ गई है कि क्या यही वनो, वन्य प्राणियों और आदिवासियों को बचाने का तरीक़ा है?) |
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